Saturday, 22 December 2018

सपना जो वास्तविकता नहीं बन पाया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 सपना जो वास्तविकता नहीं बन पाया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    इधर आजकल शायद लोगों का दिल बहलाने से अधिक फेसबुक से जोड़े रखने के लिए कई लिंक दिये जाते हैं जिनमें तमाम बातें होती हैं जैसे आप कैसे लगते हैं किस ख़ास व्यक्ति की तरह अथवा किस सवभाव के हैं किस काम को करना चाहते थे। अब आप देश के बड़े पद पर होने की बात कई लोगों की टाइम लाइन पर देख सकते हैं। जाने क्यों मुझे याद आया कि बचपन में स्कूल में सभी को लिखने को इक विषय दिया जाता था कि अगर आप देश के प्रधानमंत्री होंगे तो क्या करना चाहेंगे। तब कोई छल कपट चालाकी की बात नहीं आती थी और अधिकतर बच्चे दिल से वही चाहते थे जो लिखा करते थे। अंक हासिल करना उतना महत्वपूर्ण नहीं लगता था। शायद अब भी उस तरह का लेख लिखने को सरकारी स्कूलों और हिंदी भाषी शिक्षा देने वाले स्कूलों में कहा जाता हो मगर अंग्रेजी भाषा के पब्लिक स्कूल इसे किसी और ढंग से लिखवाने की बात करते होंगे अगर उनको लगता हो ज़रूरी तब भी। बचपन की बात को नहीं लिखता और शायद उसे लेकर मैंने पहले लिखा भी था इक व्यंग्य रचना बनाकर , जिसमें प्रधानमंत्री बने व्यक्ति के बचपन के अध्यापक उनका लिखा पुराना लेख लेकर उनके पास मिलने आते हैं। मैं आज इस समय वरिष्ठ नागरिक होते हुए महसूस करता हूं कि अगर साधारण गरीब परिवार से कोई उच्च पद पर आसीन होता है और जैसा कि अधिकांश ऐसे लोग जब भी इस ऊंचाई पर पहुंच जाने पर ब्यान देते हैं कि मैं गरीब परिवार से आया हूं और गरीबी का दर्द समझता हूं , उनसे आम नागरिक और निचली पायदान पर खड़े लोग उम्मीद करेंगे इस तरह से काम करने की जिस से गरीबी अमीरी की खाई कम होते होते बराबरी तक संभव हो। मगर वास्तविकता इस के बिल्कुल उल्ट है। कैसे इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं। 
                 अब देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों बड़े पद पर जो लोग हैं उन्होंने भी अपनी गरीबी की नुमाइश की जब वास्तव में उनको गरीबी का अर्थ भी याद नहीं रहा था शायद। अन्यथा अगर उनको ज़रा भी सहानुभूति गरीबों से होती तो सबसे पहले खुद किसी महल नुमा घर में शाही ढंग से रहने की बजाय सादगी से रहते और तमाम अनावश्यक खर्चों को बंद कर उसी धन से लाखों गरीबों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा कर सकते थे। आपको विश्वास नहीं होगा कि इस गरीब देश के राष्ट्रपति को 150 एकड़ ज़मीन पर बने भवन जिस में न केवल दो सौ से अधिक कमरे हैं बल्कि इक पूरी दुनिया है और उस के रखरखाव पर हर दिन लाखों रूपये खर्च किये जाते हैं जिन से देश के लाख भूखे लोग पेट भर सकते थे या हैं। अभी बहुत कुछ और है जिनका अगर विचार किया जाये तो लगेगा जैसे देश और जनता के साथ भद्दा मज़ाक किया जा रहा है। प्रधानमंत्री जी को भी 15 एकड़ में 6 बंगलों को मिलाकर घर दिया जाता है और उसके रखरखाव पर भी बेतहाशा खर्च किया जाता है जिस को काफी कम किया जा सकता है। ऐसे खर्चों की कोई सीमा नहीं है मगर जिस को लेकर कभी आलोचना करते थे खुद उससे भी बढ़कर धन बर्बाद करते हैं। निजि खर्चों को एक बार छोड़ भी देते हैं जबकि ऐसा देश के साथ आपराधिक हद तक अनुचित समझा जाना चाहिए। मगर जो बाकी हैं उसको आप कभी छोड़ नहीं सकते हैं। सरकार किसी की भी रही हो आज तक का सबसे बड़ा घोटला सभी करते हैं ,  सरकारी विज्ञापन देने पर हर दिन करोड़ों रूपये बर्बाद करना। हासिल कुछ भी नहीं इनसे होता , केवल अपनी महिमा का झूठा गुणगान और टीवी अख़बार वालों को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करना  क्या क्या आगे चर्चा करते हैं। 
             सत्ता मिलते आपकी दोस्ती अमीर खानदान और धन्नासेठ कारोबारी लोगों से बढ़ती है और आप उनको और अमीर बनने में हर तरह से सहयोग करते हैं। अर्थशास्त्र का नियम है अमीर और अमीर बनते हैं तभी जब गरीब से छीन कर उसे और गरीब बनाते हैं। आप दोनों तरफ नहीं रह सकते हैं गरीबों की चिंता है तो अमीरों पर अंकुश लगाना होगा उनकी तमाम अनावश्यक मुनाफखोरी को बंद करवा कर। सत्ता मिलते ही अपने दल को मिलने वाला चंदा खुद अपनी कहानी समझाता है क्योंकि कोई भी राजनैतिक दलों को चंदा किसी विचारधारा को देखकर नहीं देता है अपितु अपने व्यौपार के हित को लेकर देते हैं। धन और बाहुबल वाले नेता जो किया करते हैं अगर गरीब परिवार से आकर सत्ता पर बैठे लोग भी वही करेंगे तो फिर बदलाव होगा कैसे। गरीब सपना देख सकते हैं कि जब कोई उन्हीं में से सरकार चलाएगा तो उनके दुःख दर्द को समझेगा मगर खेद है कि कितनी बार राज्यों में और अब देश की सरकार में भी उनका सपना वास्तविकता नहीं बन पाया क्योंकि ऊपर पहुंच कर किसी को नीचे के लोग नज़र आते ही नहीं हैं। मुझे इक बोध कथा याद आई है और किसी शायर का एक लाजवाब शेर याद है उन दोनों से बात अधिक साफ समझ आती है।
      बोध कथा सन्यासी बनने को लेकर है और असली नकली देश सेवक बनने की भी बात है। कहानियां सुनते रहे हैं कोई राजा या धनवान धन दौलत महल छोड़ जंगल को चला गया। इक राजा का दरबार का कवि राज्य में विचरण करते गांव में गरीबों की बस्तियों में चला गया और देखा लोग नंगे बदन हैं कपड़ा खरीदने को पैसे नहीं हैं भूखे हैं बदहाल हैं तो उसने राजा से मिली कीमती पोशाक जिस पर महंगी कढ़ाई की हुई थी बेच डाली और उनके बनाये मोटी खादी लेकर उसकी पोशाक पहन ली। जब वापस दरबार आया उस पोशाक को पहने तो राजा ने कारण पूछा। कवि ने बताया कि मैं शासक का गुणगान करने लगा था और इनाम पुरुस्कार पाकर भटक गया था जबकि मुझे आपको समाज की लोगों की दुःख दर्द की सच्ची कविताएं सुनानी थी। जब मैंने राज्य में जाकर देखा तो अफ़सोस हुआ राजधानी और महल से अलग राज्य में भूख है लोग नंगे बदन हैं और खुले आसमान में सर्द रातें तपती लू में बरसात में बिताते हैं। तब उस पोशाक को बेचकर उनकी सहायता की और मोटी खादी को पहन लिया। आजकल जो नेता महात्मा गांधी को आदर्श बताते हैं उन्होंने भी ऐसा किया था जब लोगों को नंगे बदन देखा तो एक धोती पहनने की शपथ ली थी। अंतिम व्यक्ति के आंसू पौंछने की बात किस को याद है। अब उस शेर की बात और फिर आजकल की राजनीति का सच भी।

      वतन से इश्क़ गरीबी से बैर अमन से प्यार , सभी ने पहन रखे हैं नकाब जितने हैं।

  बहुत लोग जब खुद गरीब होते हैं तो अपने आस पास उसी तरह के लोगों को देख उनसे अपनापन का लगाव महसूस करते हैं और जब मुमकिन हो इक दूजे की सहायता भी करते रहते हैं। घर से कोई एक बाहर जाकर पैसा कमाने लगता है तो बाकी सदस्यों को भी अपने साथ बराबर बनाने का काम करता है। लेकिन कुछ लोग जो खुदगर्ज़ होते हैं कमाने लगते हैं तो घर परिवार को छोड़ अपनी चिंता किया करते हैं ताकि और भी धनवान बन सकें। ये जो आजकल लोग राजनीति में आना चाहते हैं उनको देश की समाज की नहीं केवल खुद की चिंता होती है कि कैसे आम नागरिक की जगह वीआईपी बन सकते हैं। उनको अपना आम होना खलता है अपने आप से नफरत करते हैं और किसी भी तरह ऊपर पहुंचना चाहते हैं। मानवता की बात उनको नहीं समझ आती और सब की नहीं बस खुद की ज़रूरत पर ध्यान देते हैं। देश से प्यार गरीबी मिटाने और अमन की बात ये सब उनका मुखौटा होते हैं और वास्तव में सत्ता के लिए सही गलत कुछ भी कर सकते हैं। जब शासक बनते हैं तो गरीबी क्या गरीब इंसान को करीब से नहीं देखना चाहते हैं। इनकी कथनी और करनी अलग होती है।
                               

No comments: