Wednesday, 14 November 2018

कुछ भी समझ नहीं आता ( उलझन मन की ) डॉ लोक सेतिया

     कुछ भी समझ नहीं आता ( उलझन मन की ) डॉ लोक सेतिया 

    जब किसी से कोई गिला रखना , सामने अपने आईना रखना। शुरुआत अपने आप से करता हूं। लागा चुनरी पे दाग़ छुपाऊं कैसे , घर जाऊं कैसे। यकीन करें तो ये सत्ययुग ही है सभी भली भली बातें करने हैं ज्ञान की बातें करते हैं कितने सुंदर लगते हैं लिबास भी सज धज भी और आपस में बातें भी अच्छी अच्छी। मगर पल भर में भली बातें मुहज़्ज़ब लहज़े का रंग पहली बारिश में उतर जाते हैं। अब देखो अपनी बात कहने को किस किस की ग़ज़ल के शेर बिना पूछे उठा लिए हैं मगर मैं सच लिखता हूं ये भी दावा है जबकि सच लिखता उतना जितना साहूलियत है सुविधाजनक है। कल किसी ने कहा आप तो बहुत अच्छे व्यक्ति हैं मैं आपका काम तो बिना शुल्क लिए ही कर सकता हूं। सच सुन कर बेचैनी महसूस हुई क्या मैं भला आदमी हूं , अपने आप पर हंसी आई मुझे। लोग परेशान हैं मुझसे बचते हैं घबराते हैं जाने किस बारे क्या लिख देगा ये पागल आदमी। सोचते हैं मन ही मन खुद क्या दूध का धुला है। सच है ये हम सभी लोग ऐसे ही हैं जो होते हैं सामने दिखाई नहीं देता और जो समझते हैं वास्तव में बन पाते नहीं हैं। सोचता हूं अगर वास्तव में भगवान है और इक दिन जाना है किसी और दुनिया में और जाकर सामना करना है बाबुल का तो कैसे नज़रें मिला सकूंगा। अपनी बात लिख दी है अब बाकी दुनिया की कहनी है मुझे कुछ भी समझ नहीं आता ये दुनिया कैसी है। चलो सामने है आपको दिखलाता हूं। 
                                     सच के झंडाबरदार होने का दम भरने वाले कल खामोश नज़र आये और हर ऐरेगैरे के जन्म दिन की बात पर विस्तार से चर्चा करने वाले बालदिवस पर नेहरू जी को भूले भी नहीं मगर याद करने से बचते रहे। मौजूदा निज़ाम नहीं चाहता उसका कोई नाम भी लब पर लाये , चार साल पहले तक देश के दिलों की धड़कन बनकर राजनीति में सबसे लोकप्रिय होने वाले नेता को आज नायक से खलनायक घोषित करने की कोशिश कर खुद नया इतिहास रचने की जगह पुराना इतिहास मिटाना और बदलना चाहते हैं। क्या आपको आज के काल में जीना है और भविष्य की आधारशिला रखनी है या कुछ नहीं करना केवल पुराने इतिहास को दोहराना है गड़े हुए मुर्दे उखाड़ने की ओछी राजनीति करनी है। किसी को छोटा साबित करने से आप बड़े नहीं बन सकते हैं। जिसे आप समझ नहीं पाये जिस की सोच तक आपकी समझ जाती नहीं उस से मुकाबला करोगे उसके मर जाने के पचास साल बाद। भूत से डरते हैं लोग और इनको आज भी नेहरू जी भूत बनकर सताते हैं मगर गांधी जी का नाम और गोडसे की आरती एक साथ इनको भयमुक्त नहीं कर पाती है। राजनीति को इतना निचले स्तर तक ले आना देश को किधर ले जाएगा। मगर इनको ख़ुदपरस्ती की आदत हो गई है अपनी सूरत को सजाने में लगे हैं असली शक्ल कोई देखे तो कैसे।
                            बाबा जी हैं कहते हैं योग से सभी को निरोग कर दिया है कोई विश्व स्वास्थ्य संगठन से पता करे हुआ क्या है रोगी कम तो नहीं हुए अभी। कुछ बातें शोर बहुत होता है उनका मगर असलियत कोई नहीं समझता। विज्ञान अनुसंधान करती है तो सौ लोगों को कोई चीज़ अपनाने को और सौ को उसके बिना रहने को सामने रखते हैं और साल दो साल बाद देखते हैं उन दोनों में कितना अंतर है। और अगर अनुसंधान में कोई फर्क नहीं तो उसे उस काम के लिए उपयोगी नहीं मानते हैं। मगर जब बिना कोई अनुसंधान आपको झूठे दावे करने की सुविधा है इस देश में कोई जांच नहीं करने वाला आपके दावे की सच्चाई तो आप उल्लू बनाकर जो मर्ज़ी बेच सकते हैं। रोगी नहीं होने की बात भी और बिना डॉक्टर बने हर रोग की दवा बताने की बात भी एक साथ करना इतने कम समय में देखकर लगता है गीता के भगवान कृष्ण की तरह विराट स्वरूप होगा हज़ारों हाथ और मुंह खोलते ही सभी लोग अपने भीतर समाते हुए इक डरावनी सी मूरत। मगर इनकी हर वस्तु असली भी है और इनका मुनाफा भी समाज कल्याण पर खर्च किया जाता है। भाई पहले कमाई फिर भलाई में मिठाई खाने की बात समझ नहीं आई। समाज कल्याण करना है तो मुनाफा लेते ही क्यों हैं। ये धंधा सबको आता तो लोग गरीब रहते ही नहीं , मगर फिल्म वाले समझ नहीं पाए कि अमिताभ बच्चन और आमिर खान के रहते ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान कमाई क्यों नहीं कर पाई। अमिताभ जी वही हैं जो आपको खाने का स्वाद मसाले से होता है मां सबकी एक है का उपदेश देते हैं और चिंता मुक्त होने को तेल मालिश से शहद बेचने और आपके हाथ से आपका फोन लेकर आपकी डाउनलोड की एप्प्स को हटा इधर उधर क्यों जाते हैं जब उनकी बताई ऐप्प है। जनाब आप इधर उधर जिधर मन चाहे चले जाते हो वहीं टिके रहिये अभिनय करिये कितना पैसा चाहिए इस महानयक सदी के तथाकथित भगवान को। चलो छोड़ देते हैं आखिर तो इंसान ही हैं लोभ मोह अधिक की चाहत मिटती नहीं साधु संतों की भी।
       किस किस की बात की जाये , समाजसेवा वाले या न्याय वाले या कारोबार की लूट वाले सब हैं कुछ नज़र आते कुछ और हैं। मगर सरकार की और भगवान की बात किये बिना बात खत्म नहीं की जा सकती है। सरकार का काम क्या होता है उस चुनी हुई सरकार का जिसे जनता ने बनाया हो अपनी बदहाली का अंत करने का अच्छे दिन लाने का वादा करने पर। आप उसे कहोगे जाओ भगवान की शरण में अपनी समस्याओं को लेकर। उसके लिए पंडित मौलवी ज्ञानी साधु पहले से हैं आपको अपना काम करना था मौज मनाने को नहीं मिली थी सत्ता। अपने तो हद ही कर दी खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना , ये कोई किशोर कुमार की कॉमेडी है गरीबों से भद्दा मज़ाक किया है। नाम बदलने से सीरत नहीं बदलती और आपने देश की बुनियाद को उखाड़ने की सोच बना ली है जिस इमारत पर आज खुद को गुंबद की तरह देखते हो उसकी आधारशिला वो लोग हैं जिनकी आप उपेक्षा और अनादर करना चाहते हो। उन्होंने किया या नहीं किया कुछ भी इसका हिसाब लोग समझते हैं आपको अपना हिसाब देना है किया क्या है। झूठ का व्यौपार और खुद अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना ये करने लायक बात तो नहीं है। जिनको अपने खराब बताया उन्होंने कभी औरों को अपने आधीन गुलाम बनाने की सोच नहीं रखी मगर आपने जो आपको नहीं भाता उसे ध्वस्त करने का काम किया है। तोड़ना आसान है निर्माण करना कठिन है अपने जोड़ने की नहीं तोड़ने की बात की है। नफरत की गंदी राजनीति से कभी देश का भला नहीं हो सकता है।
              आखिर में भगवान की बात वो भी बिना किसी डर के साफ साफ। भगवान क्या यही धर्म है कि तेरे लिए मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे शानदार महल और सोना चांदी हीरे जवाहारात के भंडार जमा हों जबकि तेरे ही बंदे भूखे बेघर और बदहाल हों। ये किन लोगों का कारोबार है जो पढ़ाते हैं संचय मत करो दीन दुखियों की सहायता करो मगर आचरण में ऐसा नहीं करते हैं। जिनको खुद धर्म का पालन नहीं करना आता वही हम लोगों को धर्म की बात समझाते हैं। जितनी नफरत धर्म के नाम पर दिखाई देती है उस से लगता है धर्म की बात कहीं चालबाज़ लोगों का कोई जाल तो नहीं जो खुद भगवान से नहीं डरते बाकी लोगों को उसका भय दिखाकर अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं। सोशल मीडिया पर लगता है सब लोग धार्मिक हैं देवता समान हैं मगर वही लोग वास्तविक दुनिया में किसी राक्षस से कम नहीं लगते हैं। भगवान का नाम लेने से क्या होगा जब हर किसी से छल कपट धोखा और फरेब पल पल हर दिन करते हैं। जो दिखाना चाहते हैं सत्ययुग जैसा है पर जो वास्तव में दिखाई देता है कलयुग से भी खराब है। कुछ भी समझ नहीं आता कुछ भी नहीं।

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