Saturday, 11 August 2018

मेरा सुंदर सपना टूट गया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      मेरा सुंदर सपना टूट गया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

         कुछ लोग समझते हैं हम जैसे लिखने वाले आलोचना करने के आदी हैं और हमें हर नेता हर सरकार की आलोचना कर कोई सुकून मिलता है। मगर वास्तविकता इस के विपरीत है। दुष्यंत कुमार की पीड़ा आप नहीं समझ सकते अगर आपको उस में केवल शायरी अच्छी लगती है और आप तालियां बजाते हैं भले उनके शेर बोलने वाला खुद कोई नेता अधिकारी या दूसरा कोई ऐसा हो जो देश की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार हो। हम इक ऐसे समाज का सपना देखते हैं जिस में कोई छोटा बड़ा न हो , अमीर गरीब न हो , किसी तरह का भेदभाव नहीं हो। सब लोग एक समान हों कब ऐसा समाज बनेगा। आज़ादी के बाद से देश की जनता कई नेताओं पर भरोसा करती आई है कि शायद ये कोई सार्थक बदलाव लाएगा। वादे तो बहुत लोगों ने किये मगर वादे निभाए नहीं किसी ने भी। कुछ लोग आये जो बदलना चाहते थे वास्तव में देश और जनता की हालत को मगर वो दुर्भाग्य से कम समय ही रह पाए। लाल बहादुर शास्त्री जी का नाम सबसे पहले आता है , रेल दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी समझ पद से हट जाना और जब प्रधानमंत्री बने तो देश के खोये स्वाभिमान को जगाना। ऐसे भी जननायक हुए जो किसी पद पर नहीं रहे मगर उनका योगदान कम नहीं था। पिछली बातों की नहीं आज की बात करते हैं। शायद राजनीति अब उस स्तर तक नैतिक रूप से नीचे गिर चुकी है कि लाज शर्म रही ही नहीं है। 
                पिछले चुनाव में देश की जनता को काफी समय बाद किसी की बातों से लगा कि अब कोई हमारा सपना सच कर दिखाना चाहता है और इसी कारण उसे उम्मीद से बढ़कर जनता का समर्थन मिला। ये वास्तव में एक ज़िम्मेदारी समझने और देश की जनता की उम्मीद पर खरे उतरने का इम्तिहान भी था। मगर बेहद खेद से कहना पड़ता है कि मोदी जी ने चार साल में कोई कोशिश ही नहीं की देश और जनता की भलाई पर ध्यान देने की। ये कहना अनुचित नहीं होगा कि अपार बहुमत मिलने से कर्तव्यबोध होने की जगह उनको अहंकार हो गया और समझने लगे कि उनसे अच्छा कोई पहले न था न आगे कोई हो सकता है। उनका सारा ध्यान अपनी छवि किसी मसीहा की बनाने और पहले जितने भी नेता सत्ता पर रहे उनको बुरा और खलनायक साबित करने पर रहा। ये नकारात्मकता कोई सार्थक कार्य कर सकती भी नहीं थी। जिस हद तक मोदी जी ने अपना रहन सहन पहनावा और तौर तरीके बनाये और राजा महाराजा की तरह से शानो शौकत दर्शाने का कार्य किया उसे भारत जैसे गरीब देश की जनता के साथ मज़ाक ही समझ सकते हैं। जिस भारतीय संस्कृति का दम भरते है आज के ये सत्ताधारी उस में सादगी से जीना और खुद पर नहीं देश के धन सुविधाओं को उन पर खर्च करना जो आज़ादी के बाद भी नर्क सा जीवन जीने को विवश हैं।
                       देश की जनता गरीबों की समस्याओं की अनदेखी कर अपने अघोषित अजेंडे पर चल कर राजनीति को और भी घटिया स्तर पर ले आये हैं। धार्मिक उन्माद फैला कर सत्ता की रोटियां सेकना लोगों को गुमराह करना विकास की बात छोड़ टकराव और विनाश की निति पर चलना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा की परवाह नहीं करना। सब से बढ़कर खुद को सर्वस्व समझना और टीवी चैनलों को लाखों करोड़ का फायदा बेकार के झूठे विज्ञापनों की आड़ में पहुंचाकर उनको अपने गुणगान को चाटुकार बनाना जैसे कार्य संविधान और लोकतंत्र के विपरीत हैं। अपने विरोध की आवाज़ को बंद करवाने को हर सीमा को लांघना किस बात को दर्शाता है। अगर सत्ता हासिल करना ही एक मात्र मकसद होता है तो देश सेवा की बात मत कहो और इसे देशभक्ति तो कदापि नहीं। सत्ता की खातिर क्या क्या नहीं किया अपने , क्या देश में किसी एक दल की ही सरकार होना महान कार्य है। सत्ता के मोह में इस कदर अंधा होना कोई अच्छी निशानी नहीं है। हर तरफ दंगे फसाद और भीड़ बनकर अराजकता पर सर्वोच्च न्यायालय भी चिंतित है। धर्मं की आड़ में जो फसाद करते हैं आपकी सरकार उनका अभिनंदन करती है फूल बरसाती है घर बुलाकर सम्मानित करते हैं। नहीं ये देश की बात नहीं है जनता को बांटने की बात है और लाशों पर राजनीत्ती करना है।
          कोई भी वादा नहीं पूरा किया आपने और आप को मिले जनमत की रत्ती भर भी लाज नहीं रखी है। फिर भी आपको एहसास ही नहीं है कि कैसे झूठी उम्मीदें जगाकर आपने भोली भाली जनता की भावनाओं से खिलवाड़ किया है। झूठ बोलने की कोई सीमा बची नहीं है। आपको पता ही नहीं है आपने जनता को किस हद तक निराश किया है , इतना कि अब लोग दूध के जले छाछ को भी फूंककर पिया करेंगे। अपने एक ही बात साबित की है कि दल कोई भी हो नेता कोई भी हो विश्वास किसी की बात का नहीं है। जनता को आपने दिया कुछ भी नहीं है उनकी उम्मीदों को भी छीन लिया है। क्या किया है आपने आप नहीं समझ सकते। हम भी चाहते थे कोई नेता वास्तविक रूप से ऐसा हो जो खुद अपनी शानो शौकत से बढ़कर देश की जनता की भलाई की बात सोचता हो।  शायद हमारी सबसे बड़ी समस्या हमारी गुलामी की मानसिकता है जो किसी न किसी को अपना खुदा या मसीहा समझने लगती है। जब कोई खुद को खुदा समझने लगता है तो उसे लगता है वो जो चाहे कर सकता है और उस पर सही गलत का सवाल कोई नहीं उठा सकता है। हमारे देश का मीडिया हमेशा किसी न किसी को भगवान बनाकर अपना उल्लू सीधा करता आया है और खुद को खुद ही सच का झंडाबरदार घोषित कर सच को बेचता आया है। उनका सच सच बाकी सब झूठ और उनके विशेषाधिकार की बात , क्यों कैसे विशेषाधिकार आपको या किसी को। खबर क्या है कोई कसौटी नहीं कोई निष्पक्षता की बात नहीं और सच कहने का साहस तो है ही नहीं। अपने आप पर फ़िदा होना अच्छी बात नहीं है।
      ऐसे ही लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर या खुद को बेचकर लोगों की महानता की छवि घड़ने का काम किया है जो अपने आप में किसी अपराध की तरह है। धर्म और आस्था के नाम पर मनमर्ज़ी की छूट देने का अंजाम सामने है तथाकथित साधु सन्यासी जेल में बंद हैं। उनको भी लोग भगवान मानते थे और नहीं चाहते थे उन पर कोई शक या सवाल करे। इस सरकार ने भी अपने को किसी के प्रति जवाबदेह नहीं माना है। ये कैसी देश की सेवा है कि आप चयन नहीं मनोनयन से अपने ख़ास लोगों को पदों पर बिठाते चलें। जिस देश में लोग बदहाल हों उसकी सरकार जश्न मनाती रहे बात बात पर। आज विश्व भर की संस्थाओं की सूचि में हमारा देश भ्र्ष्टाचार भूख स्वास्थ्य शिक्षा और मानवाधिकार में निचले पायदानों पर है पहले से और खराब हालत है। सौ से अधिक योजनाएं घोषित की गई और सफल कोई भी नहीं , जिस गांव को गोद लिया जिस जिस नेता ने उस गांव की ही खबर नहीं ली तो देश की क्या लेंगे आप। लाखों करोड़ बर्बाद किये और स्वच्छ भारत अभियान की हक़ीक़त बताती है कोई बदलाव नहीं हुआ केवल सरकारी ऐप्स और झूठे विज्ञापनों से कुछ नहीं किया जा सकता है। स्किल इंडिया मेक इन इंडिया को इक धोखा बना दिया है जब हर चीज़ विदेश से बनवाते हैं। अपने हमेशा घोषणा की कि आपसे पहले किसी ने कुछ नहीं किया मगर आज आपके चार साल के काम को देखा जाये और 63 साल में देश में जितना काम हुआ उस से तुलना की जाये तो उस रफ्तार से उसका सोलहवां भाग काम तो दिखाई देता मगर उसका एक प्रतिशत भी नहीं हुआ देश और जनता का विकास का काम। जो हुआ या किया वो भी सामने है छुपा नहीं है सत्ताधारी दल के आलीशान भवन दफ्तर हर राज्य हर शहर में और सत्ताधारी नेताओं पर महिलाओं से बदसलूकी से गंदे आपराधिक कार्य तक सामने आये हैं। हरियाणा में तो सरकार ने बलात्कार के आरोपी को वोटों की खातिर बचाने का भरसक प्रयास किया और अदालत के आदेशों की धज्जियां उड़ाने का काम किया , यहां तक कि इसी सरकार ने उसके कितने साल से अवैध घोषित निर्माण को वैध करने को ही कानून बनाकर उसे इक शहर से गांव घोषित कर दिया। क्या यही स्मार्ट शहर बनाने का ढंग है , हर चुनाव में आपराधिक छवि के नेताओं को शामिल किया अपने दल में। आपने कहा कुछ किया कुछ और , आज अपने चार साल का हिसाब बताने की जगह देश को धर्म आदि के नाम पर उलझाने को लगे हैं। नहीं कोई भी इसे देश सेवा या देशभक्ति नहीं मान सकता है।
        
      

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