Tuesday, 19 September 2017

अपराधी भी आप , अदालत भी आपकी ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

       अपराधी भी आप , अदालत भी आपकी ( आठवां सुर ) 

                          डॉ लोक सेतिया

            खुद को समझदार समझने वालों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। उधर नहीं जाना इधर नहीं आना ऐसे नहीं करना उस तरह नहीं इस तरह करना , हर कदम पर बेड़ियां डाली हैं मेरे पैरों में। मैं देश की जनता की तरह हर औरत की तरह बेबस खड़ी हुई। मगर मैं आज़ाद हूं , ये जाने किस तरह की आज़ादी है जिस में सांस भी अपनी मर्ज़ी से नहीं ले सकते हम। अपराधी कौन है , जो न्यायधीश बन अदालत लगाए बैठे हैं , वो क्या फैसला करेंगे। सरकार ने फैसला किया और लाख करोड़ का क़र्ज़ विदेश से ले लिया और बताया गया ये उनकी मेहरबानी है आपको पचास साल में चुकाना है ये क़र्ज़। आज जो बच्चा जन्म लेगा उस पर ये क़र्ज़ होगा , लिया जिस ने उसको नहीं भावी संतानों को क़र्ज़ भरना है। बाप दादा का क़र्ज़ चुकाना आपका धर्म है। ये भी इक धंधा है बाप दादा के नाम पर किसी को देते रहो और बच्चों को भूखा मरने दो। मेरे ताया जी इक कहावत सुनाते थे , आप मरी ढंड से बेटी के नाम रज़ाई कर गई। देश और जनता की भलाई और विकास की बात कौन करते हैं , वो जो हर दिन खुद अपने पर लाखों रूपये खर्च करवाते हैं सुख सुविधा , आडंबर और झूठी शान की सुरक्षा के नाम पर। अकेले आप पर गरीब देश के खज़ाने से लाखों रूपये रोज़ खर्च किये जाते हैं , आपको बड़े बड़े बंगले रहने को और शाही ठाठ बाठ चाहिएं। आप क्या ख़ाक समझोगे गरीबी का दर्द। देश का राष्ट्रपति आया भले गरीब परिवार से हो , रहता राजा की तरह सैंकड़ों कमरों वाले भवन में है जिस पर हर दिन कई लाख और हर महीने कई करोड़ या सालाना सैंकड़ों करोड़ खर्च किये जाते हैं। इन सब के मुंह से गरीबी और गरीब की बात किसी उपहास जैसी लगती है। 
                  धर्म की किताब में देव और दानव दोनों की बात लिखी है।  देवता वो हैं जो अपने पास कुछ नहीं रखते , जो भी हो बांटते हैं औरों को अर्थात जो देता है वही देवता है। भगवान दाता है किसी से कुछ लेता नहीं है , जो भगवान को भी सोचते हैं हम खुश कर सकते चढ़ावा चढ़ाकर उनको कुछ नहीं पता। भगवान हमारी तरह नहीं है जो अपना गुणगान सुन या और किसी तरह लालच से खुश हो जाये। धर्म को समझे बिना आप आस्तिक नहीं बन सकते। और दानव कौन हैं , जो औरों से सब छीन लेना चाहते हैं , दानवों की भूख कभी नहीं मिटती है। ये मेरा नहीं हर धर्म की किताब का कहना है। आज जितने भी लोग औरों से छीन कर अपना पेट भरते हैं उनको आप राक्षस ही समझना। और इस सूचि में नेता अधिकारी ही नहीं , लूट का ठगी का कारोबार करने वाले व्यौपारी , मीडिया वाले , डॉक्टर , शिक्षक जो अपने पेशे को केवल मुनाफे का कारोबार समझते हैं उन से लेकर तथाकथित समाज सेवक भी शामिल हैं। जिन पांच फीसदी लोगों के पास नब्बे फीसदी दौलत है वो सब ईश्वर की अदालत में गुनहगार कहलायेंगे।  भगवान ने सब को सब बराबर दिया है , जिन्होंने अपनी चालाकी से या किसी भी तरह ज़रूरत से अधिक हासिल किया हुआ है और किसी को बांटते नहीं हैं वो सब मानवता के अपराधी हैं। इक बात लिखी हुई है सभी धर्मोँ में , जिस के पास सब कुछ है तब भी और अधिक जमा करने की चाहत रखते हैं वही सब से दरिद्र हैं। जो आपको धरती पर भगवान लगते हैं और जिनकी आप महिमा का गुणगान करते हैं वो वास्तव में गरीब ही हैं। सत्ता की हवस जिन नेताओं की मिटती ही नहीं उनको भी आप गरीबों से गरीब ही समझना क्योंकि हर गरीब की थाली से कुछ जाता है उनके पेट भरने को। वास्तविक देश और जनता के सेवक कभी खुद राजसी ठाठ से शान से नहीं रहा करते। इन से कोई आशा मत रखो जिनकी खुद की चाहत की कोई सीमा ही नहीं है।

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