Tuesday, 19 September 2017

अपराधी भी आप , अदालत भी आपकी ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

       अपराधी भी आप , अदालत भी आपकी ( आठवां सुर ) 

                          डॉ लोक सेतिया

            खुद को समझदार समझने वालों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। उधर नहीं जाना इधर नहीं आना ऐसे नहीं करना उस तरह नहीं इस तरह करना , हर कदम पर बेड़ियां डाली हैं मेरे पैरों में। मैं देश की जनता की तरह हर औरत की तरह बेबस खड़ी हुई। मगर मैं आज़ाद हूं , ये जाने किस तरह की आज़ादी है जिस में सांस भी अपनी मर्ज़ी से नहीं ले सकते हम। अपराधी कौन है , जो न्यायधीश बन अदालत लगाए बैठे हैं , वो क्या फैसला करेंगे। सरकार ने फैसला किया और लाख करोड़ का क़र्ज़ विदेश से ले लिया और बताया गया ये उनकी मेहरबानी है आपको पचास साल में चुकाना है ये क़र्ज़। आज जो बच्चा जन्म लेगा उस पर ये क़र्ज़ होगा , लिया जिस ने उसको नहीं भावी संतानों को क़र्ज़ भरना है। बाप दादा का क़र्ज़ चुकाना आपका धर्म है। ये भी इक धंधा है बाप दादा के नाम पर किसी को देते रहो और बच्चों को भूखा मरने दो। मेरे ताया जी इक कहावत सुनाते थे , आप मरी ढंड से बेटी के नाम रज़ाई कर गई। देश और जनता की भलाई और विकास की बात कौन करते हैं , वो जो हर दिन खुद अपने पर लाखों रूपये खर्च करवाते हैं सुख सुविधा , आडंबर और झूठी शान की सुरक्षा के नाम पर। अकेले आप पर गरीब देश के खज़ाने से लाखों रूपये रोज़ खर्च किये जाते हैं , आपको बड़े बड़े बंगले रहने को और शाही ठाठ बाठ चाहिएं। आप क्या ख़ाक समझोगे गरीबी का दर्द। देश का राष्ट्रपति आया भले गरीब परिवार से हो , रहता राजा की तरह सैंकड़ों कमरों वाले भवन में है जिस पर हर दिन कई लाख और हर महीने कई करोड़ या सालाना सैंकड़ों करोड़ खर्च किये जाते हैं। इन सब के मुंह से गरीबी और गरीब की बात किसी उपहास जैसी लगती है। 
                  धर्म की किताब में देव और दानव दोनों की बात लिखी है।  देवता वो हैं जो अपने पास कुछ नहीं रखते , जो भी हो बांटते हैं औरों को अर्थात जो देता है वही देवता है। भगवान दाता है किसी से कुछ लेता नहीं है , जो भगवान को भी सोचते हैं हम खुश कर सकते चढ़ावा चढ़ाकर उनको कुछ नहीं पता। भगवान हमारी तरह नहीं है जो अपना गुणगान सुन या और किसी तरह लालच से खुश हो जाये। धर्म को समझे बिना आप आस्तिक नहीं बन सकते। और दानव कौन हैं , जो औरों से सब छीन लेना चाहते हैं , दानवों की भूख कभी नहीं मिटती है। ये मेरा नहीं हर धर्म की किताब का कहना है। आज जितने भी लोग औरों से छीन कर अपना पेट भरते हैं उनको आप राक्षस ही समझना। और इस सूचि में नेता अधिकारी ही नहीं , लूट का ठगी का कारोबार करने वाले व्यौपारी , मीडिया वाले , डॉक्टर , शिक्षक जो अपने पेशे को केवल मुनाफे का कारोबार समझते हैं उन से लेकर तथाकथित समाज सेवक भी शामिल हैं। जिन पांच फीसदी लोगों के पास नब्बे फीसदी दौलत है वो सब ईश्वर की अदालत में गुनहगार कहलायेंगे।  भगवान ने सब को सब बराबर दिया है , जिन्होंने अपनी चालाकी से या किसी भी तरह ज़रूरत से अधिक हासिल किया हुआ है और किसी को बांटते नहीं हैं वो सब मानवता के अपराधी हैं। इक बात लिखी हुई है सभी धर्मोँ में , जिस के पास सब कुछ है तब भी और अधिक जमा करने की चाहत रखते हैं वही सब से दरिद्र हैं। जो आपको धरती पर भगवान लगते हैं और जिनकी आप महिमा का गुणगान करते हैं वो वास्तव में गरीब ही हैं। सत्ता की हवस जिन नेताओं की मिटती ही नहीं उनको भी आप गरीबों से गरीब ही समझना क्योंकि हर गरीब की थाली से कुछ जाता है उनके पेट भरने को। वास्तविक देश और जनता के सेवक कभी खुद राजसी ठाठ से शान से नहीं रहा करते। इन से कोई आशा मत रखो जिनकी खुद की चाहत की कोई सीमा ही नहीं है।

Monday, 18 September 2017

उचित राह चलना कठिन , अनुचित की आज़ादी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     उचित राह चलना कठिन , अनुचित की आज़ादी ( आलेख ) 

                           डॉ लोक सेतिया

                  सरकार क्या अख़बार क्या टीवी के खबरी चैनल क्या , सब इंतज़ार किया करते हैं किसी अनहोनी को घटने की। फिर कुछ दिन तक उसी बात का शोर मगर बेहद असंवेदनशील ढंग से। लगता ही नहीं किसी को दूसरों का दर्द समझना आता है। बयान बाज़ी और हादसों का भी उपयोग करना अपने मकसद को आम बात है। मानवता तो जैसे बची ही नहीं , आदर्श और नैतिक मूल्य केवल किताबी अक्षर बन गए हैं। काश किसी अनहोनी से देश की सरकार राज्यों की सरकारें और हम सभी सबक सीख लें और अपनी मदहोशी से जागकर कुछ सोचें विचार करें और कहीं भी ऐसी घटनाएं नहीं हों ऐसा उपाय करें। रायन स्कूल की बात यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए , शायद यहीं से कुछ शुरुआत की जा सकती है। बहुत बातें हैं जो सामने हैं मगर हम सभी अनदेखा करते हैं। सब से पहले तो सरकारी सभी विभाग खुद अपने आप अपना फ़र्ज़ निभाना जानते ही नहीं , उनको खुद अपने काम करने होंगे बिना किसी की शिकायत या सिफारिश के। पुलिस को अपराध रोकना , नहीं होने देना कब ज़रूरी लगेगा। बहुत विभाग तो ऐसे हैं जो खुद अपराध करवाते हैं ताकि ऊपर की कमाई की जा सके। खुद ही अपनी ज़मीन पर कब्ज़ा कराना और महीना वसूलना , जिस विभाग को लोगों को घर प्लॉट्स उपलब्ध कराने हैं , वही खुद किसी नियम कानून का पालन नहीं करता है। केवल अपनी गलत आमदनी के लिए ये विभाग खुद ही अपराधी की तरह काम करता है। देश में सब से अधिक कदाचार इसी आवास से जुड़े विभाग में होता है और नेता भी शामिल होते हैं। किस राज्य में नेता अधिकारी ये अपराध नहीं करते देखे गए।
                              शिक्षा और स्वास्थ्य सब से ज़रूरी हैं मगर किसी सरकार को चिंता ही नहीं इस में कितनी बदहाली है। आपको दवा नकली मिलती है , खुद डॉक्टर्स घटिया दवा लिखते हैं कमीशन की खातिर। अगर आपको फल और सब्ज़ियां भी तेज़ाब से चमकी हुई मिलें तब आपको ज़हर ही खिला रहे हैं। खाने पीने का सामान कितनी घटिया सब्ज़ियों और तेल से कितनी गंदी जगह बनाकर गंदगी की जगह परोसा जाता है , जिस से कितने रोग बढ़ रहे है कोई नहीं देखता। सस्ता नहीं बेहद महंगा है ये सब जो आपको स्वादिष्ट लगता है। अगर कभी सरकार जाकर देखे तो हमारे अधिकतर होटल  , रेस्टॉरेंट ही नहीं , हॉस्पिटल और नर्सिंग होम तक स्तरहीन सेवाएं और तमाम तरह से खिलवाड़ स्वास्थ्य के साथ करते मिलेंगे। क्योंकि कोई देखने वाला नहीं कि कहां क्या हो रहा है। स्कूल हॉस्पिटल और खाने पीने का सामान बेचने वाले ही अगर किसी नियम गुणवत्ता के मापदंड पर खरे नहीं हैं तो फिर देश में सरकार क्या है। सब विभाग और नेता भाईचारा निभाने में जनता के जीवन से खिलवाड़ करते हैं।
          ऐसा शायद ही किसी सभ्य देश में होता है कि उचित ढंग से कोई काम नहीं हो सकता और अनुचित ढंग से कोई कुछ भी करता रहे कोई नहीं देखता , रोकता टोकता। ज़हर देना ही अपराध नहीं होता , समय पर दवा नहीं देना भी जानलेवा होता है और सभी विभाग अपना अपना कर्तव्य खुद समय पर नहीं निभा कर वही ही करते हैं। गुनहगार कौन नहीं है।

Sunday, 17 September 2017

हंसिये चाहे रोयिए - डॉ लोक सेतिया

खबर वाले ( हास्य कविता )

अब हर दिन सुना रहे ,
फिर फिर उसकी कहानी ,
पहले खबर ढूंढते क्या ,
मर जाती थी इनकी नानी। 
रखवाली क्या करोगे ,
घर की बन चौकीदार ,
बिक चुके ज़मीर वाले ,
झूठे हो सभी इश्तिहार। 
अपनी गली में शेर हो ,
कहते हो सेर बाकी सब ,
तुम सब पे सवा सेर हो ,
पेट भर लिया हुए ढेर हो। 

दाता हैं भिखारी ( व्यंग्य कविता )

किसने किसे क्या दिया है ,
ये कैसा अजब माजरा है ,
मालिक तुम हो भिखारी ,
सेवक दाता बन कह रहा है। 
खाली हाथ आया था जो ,
आया था हाथ जोड़ कर ,
कहता है सब का मालिक मैं ,
खुद बन गया सेवक खुदा है।
खोटा सिक्का इस तरह चला ,
करना था जिसे सब का भला ,
सब बुरे पुराने लगते हैं भले ,
जब देखा सभी ने सभी से बुरा।
 

Saturday, 16 September 2017

कौन सही है अटल बिहारी वाजपेयी जी या मोदी जी - डॉ लोक सेतिया

कौन सही है अटल बिहारी वाजपेयी जी या मोदी जी- डॉ लोक सेतिया

       अभी अभी मैंने वाजपेयी जी का भाषण का विडिओ देखा सुना , जिस में वो आज़ादी के पचास साल पूरे होने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव में विरोध करने को हम बाकी जो भी कहें , मैं मानता हूं कि कोई भी ये नहीं कह सकता कि देश में विकास नहीं हुआ है। देश ने बहुत कुछ हासिल किया है और अगर कोई इसको नहीं मानता तो वह देश के किसानों मज़दूरों और तमाम आम लोगों की मेहनत और लगन को अपमानित करता है। आज मोदी जी को अपने जन्म दिन पर अपने दल के सब से महान नेता की बात सुन कर देश से क्षमा मांगनी चाहिए अपने तीन साल के झूठे प्रचार और तमाम अनुचित कामों के लिए। आपने तीन साल में क्या किया है आज मैं समझाता हूं। आपने देश के प्रधानमंत्री के पद को उपहास का पात्र बना दिया है। झूठ कपट और अपनी हर बात से मुकरना कभी इस पद पर किसी ने नहीं किया पहले। वंशवाद की बात क्या आपने तो चुनाव और संविधान को अपने पसंद के चाटुकारों को मनोनित करने ही नहीं उनके अपराधियों के साथ देने तक पर खामोश रहकर बचाव किया है। हरियाणा की बदहाली आपके कारण ही है क्योंकि सत्ता उसी को मिली जो आपके लिए निष्ठा रखते न कि देश समाज के लिए। इक चुटकुला बेहद मशहूर रहा है , जो आप पर लागू होता है , सुनाता हूं। 
           कई देशों के विज्ञानिक जमा हुए अपना अपना कौशल दिखाने को। एक देश वाले ने बाल जितनी बारीक स्टील की तार बनाकर दिखाई। दूसरे देश वाले ने और अधिक अच्छा कर दिखाया , उस तार में सुराख बना दिया। तीसरे की बारी आने पर उस ने उसी में बांसुरी की तरह छेद करने का कौशल दिखाया। जब भारत की बारी आई तो उस भारतीय ने उस पर मेड इन इंडिया की मोहर लगा दी। 
       तीन साल से आप भी सब पुरानी सरकारों को बदनाम करते आये हैं और उन्हीं की बनाई सभी चीज़ों पर अपने नाम की मोहर लगाते आये हैं। जो अपने से पहले वालों का आदर नहीं करता और खुद को ही महान बतलाता है भविष्य में उसको यही लौटना भी होता है इतिहास में। आदर चाहते हैं तो आदर देना सीखो।


Friday, 15 September 2017

बेखबर को क्या खबर ( शिक्षा की बात ) डॉ लोक सेतिया

    बेखबर को क्या खबर ( शिक्षा की बात ) डॉ लोक सेतिया 

               मैं न तो अमिताभ बच्चन को भगवान मानने वालों में हूं , न ही कौन बनेगा करोड़पति जैसे टीवी शो को उचित ही समझता ही हूं। मुझे मालूम है इस का ज्ञान का भंडार होने और लोगों के सपने सच करने के दावे के पीछे का मकसद क्या है। कभी कभी सोचता हूं कोई एक एपीसोड ऐसा भी हो जिस में इसी शो के बारे सवाल हों और उनके जवाब इन्हीं से मांगे जाएं। तब इक खेल का सच सब को पता चलेगा , मगर ऐसा वो कभी नहीं करेंगे। कौन खुद को कटघरे में खड़ा करना चाहता है। सब किसी भी तरह धनवान बनना चाहते हैं और महान उद्देश्य की बात से लोगों को बहलाना भी चाहते हैं। कल ही इक वैद जी का संदेश व्हाट्सएप पर आया जिस में इक चूरण की कीमत 40 रूपये से 100 रूपये करने की बात कहकर सवाल किया कैसे आप मुनाफाखोरी नहीं करते हैं , इक और ने मल्टीग्रैन आटे की कीमत का सच समझाया था कि जिन अनाजों की कीमत मिलाकर बीस रूपये भी नहीं बनती आप पचास रूपये दाम वसूलते हैं। फिर भी मैं दो कारणों से के बी सी का शो देखता हूं , एक क्योंकि उस में शामिल होने वालों में बहुत लोगों की बातों से बहुत नया जानने को मिलता है , दूसरा उस समय के टीवी सीरियल और समाचार चैनल के अत्याचार से बचने का ये बेहतर विकल्प है। 
                      कल 15 सितंबर को दो लोग आये थे इस खेल में। इक महिला जो अध्यापिका हैं , सरकारी स्कूल में पढ़ाती हैं इक ऐसी योजना में जिस में उनको कोई वेतन नहीं मिलता है। उन्हें बस से कई किलोमीटर दूर खुद सौ रूपये आने जाने का किराया खर्च कर जाना होता है। पांच साल से बिना वेतन वो शिक्षा देने का धर्म निभा रही हैं इस उम्मीद पर कि कभी उनका चयन होगा और तब उनको वेतन मिलेगा और जितने साल तक बिना वेतन काम किया उसका भी हर साल कुछ फीसदी मिलेगा। उन के पति भी दस साल तक इसी तरह शिक्षक का काम करते रहे। मुझे बहुत हैरानी हुई , जबकि होनी नहीं चाहिए , क्योंकि खुद मैं भी कुछ हद तक ऐसा ही तो कर रहा हूं। कितने अख़बार पत्रिकाओं में रचनाएं छपती हैं मगर मिलता कुछ भी नहीं , जेब से ही टाइपिंग डाक खर्च करता हूं। बहुत थोड़े हैं जो कहने भर को कुछ देते हैं। मगर मुझे अपनी बात नहीं करनी है , उस अध्यापिका जैसे शिक्षकों की करनी है। सरकार के पास बजट नहीं है खाली स्थान नहीं हैं मगर ज़रूरत है शिक्षकों की। जिनकी मज़बूरी है बेरोज़गार हैं खाली बैठने से काम करना बेहतर समझते हैं उनकी विवशता का उपयोग करती है सरकार। इसे शोषण भी नहीं कह सकते , कोई विवश नहीं करता है , मगर शिक्षक दिवस को कोई इसकी बात क्यों नहीं करता। हिंदी दिवस पर कोई हिंदी लेखकों के दर्द की बात भी क्यों नहीं करता है। दोनों दिन अभी अभी आये और बीत गए बिना कुछ भी बदले। ये अच्छा हुआ वो अध्यापिका इस से कुछ लाख की राशि जीत कर ले गईं जिस से कम से कम उस के ब्याज से उनके स्कूल आने जाने का बस का किराया तो मिल ही सकता है। मगर क्या राज्य की सरकार को इतनी भी संवेदना नहीं दिखलानी चाहिए कि ऐसे शिक्षक को सरकारी बस में टिकट तो नहीं लेना पड़े। 
                  इक और समाजिक कार्य करने वाले भी कल आमंत्रित किये गए थे। वो कई राज्यों में गूंज नाम की संस्था द्वारा बहुत अच्छे काम कर रहे हैं। मगर उनकी इस तरफ आने की शुरुआत की बात किसी भी संवेदनशील को भीतर तक झकझोर सकती है। इक रिक्शा वाले से जिस के रिक्शा पर लिखा हुआ था लावारिस लाशों को ले जाने को रिक्शा है। पता चला उसे लावारिस लाश , देश की राजधानी दिल्ली में , सड़क पर फुटपाथ पर , दुर्घटना से , या सर्दी में ठंड से मौत होने पर कहीं ले जाने के बीस रूपये और दो मीटर कपड़ा मिलता है जिस से उसका गुज़र होता है। सब से अधिक विचलित करने वाली बात थी जो उसकी पांच साल की बच्ची ने कही। जब खुले आसमान तले रात को उसको ढंड लगती है तो वो उस लाश से लिपट कर सो जाती है और उस को गर्मी भी मिलती है और लाश करवट भी नहीं बदलती है। उस से उनको लगा केवल कपड़े नहीं होने से कितने लोग सर्दी से मौत का शिकार हो जाते हैं। अमिताभ बच्चन जी ने जो कपड़े उनको के बी सी वाले देते हैं पहनने को और जिनको बाद में वो उपयोग करते नहीं उनकी संस्था को दान में देने की बात की। मुझे महात्मा गांधी की बात याद आई कि उन्होंने लोगों को नंगे बदन देखकर खुद केवल एक धोती पहनने की बात की। आज के नेता उन्हीं की राह पर चलने और उनके नाम पर योजनाएं घोषित करते हैं , गाँधीवादी होने का आडंबर किया करते हैं , मगर अपने शानदार कपड़ों पर कितना धन खर्च करते हैं कोई नहीं जानता। गरीबों के लिए दिखावे की सहानुभूति नहीं वास्तविक संवेदना होनी चाहिए। खुद को मसीहा बताने वालों में मुझे तो नहीं नज़र आई कभी। हम लोग भी कहां ये सब सुनकर विचलित होते हैं।

Thursday, 14 September 2017

आप कहलाते भगवान , किसलिये परेशान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

आप कहलाते भगवान , किसलिये परेशान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

           मुझे रात भर नींद नहीं आई , उनकी ही चिंता सताती रही। आप तो सब को करोड़पति बनाने में लगे हैं आशावादी सपने बेचते हैं और आप ने कहा आपको इस इत्तर की बहुत ज़रूरत है अपनी नकारात्मकता को मिटाने के लिए। इक साधु ने इक राजा से कहा आपसे क्या मांगना आप तो खुद खुदा के सामने झोली फैलाये खड़े थे। मुझे इक ग़ज़ल याद आ गई। आप क्यों रोये जो हमने दास्तां अपनी सुनाई , तबाही तो हमारे दिल पे आई , आप क्यों रोये। न ये आंसू रुके तो देखिये फिर हम भी रो देंगे , हम अपने आंसुओं में चांद तारों को डुबो देंगे। फ़ना हो जाएगी सारी खुदाई , आप क्यों रोये। हुआ ये कि हमारे हरियाणा से एक शख्स गया था भाग लेने और उपहार ले गया था इत्तर का जिस से उनके कहे अनुसार नकारात्मकता नहीं रहती घर में। ये इत्तेफाक है कि कल हिंदी दिवस था और अमिताभ जी ने बच्चन जी की मधुशाला की पंक्तियां सुनाई थी। बच्चन जी की कविता जीवन भर संघर्ष की बात समझाती है उसे भूल गए , कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती से भी बात नहीं बनी जो अब नकली उपाय करने को सोचने लगे। हिंदी दिवस कल मनाया गया और सभी हिंदी को चाहने वाले हिंदी का गुणगान करते रहे और सोचते रहे कि इस दिन तो हिंदी की बदहाली की बात नहीं की जाये। चलो आज तो कर सकते हैं , तो यही विचार किया जाये हर साल हिंदी दिवस मनाने से क्या हुआ है। महिला दिवस मनाकर क्या मिला , बाल दिवस , शिक्षक दिवस और मज़दूर दिवस ही नहीं , गणतंत्र दिवस मनाने से क्या मिला जनता को। अमिताभ जी को तो सब से पहले लोगों ने बाबू मोशाय के रूप में पसंद किया था जो मानता है कि मौत तू इक कविता है। अब तो आप शिखर पर हैं फिर भी घबरा रहे हैं। ये जो डियो बेचने वाले हैं दुर्गन्ध को छुपाते हैं सुगंध नहीं फैलाते। कुछ समझे क्या। खुशबू चाहते हैं तो चंदन बनिये और सांपों के लिपटने से नकारात्मक नहीं होईये। आपके घर में सब है बाहर क्या तलाश रहे हैं। इक गीत रफ़ी जी का बाज़ार में नहीं आया किसी कारण आपको पता होगा फिर भी याद दिलाना चाहता हूं। 

अभी साज़े -दिल के तराने बहुत हैं ,

अभी ज़िंदगी के फ़साने बहुत हैं। 

दरे -गैर से भीख मांगों न फन की ,

जब अपने ही घर में खज़ाने बहुत हैं। 

             अकेले आप ही नहीं वो भी बेहद परेशान हैं जो देश में सब से अधिक बहुमत पाकर सत्ता में हैं। जब सभी जुमले लगने लगे बेअसर होते जा रहे हैं तब इक खिलौना लाने की बात कर रहे हैं। बच्चों की रेलगाड़ी की तरह दो शहरों को इक बुलेट ट्रैन से जोड़ा जायेगा और बता रहे यही युवा वर्ग को सही जगह पंहुचा सकती है। अच्छे दिन तो घोषित किया जा चुका है कि इक चुनावी जुमला था , अच्छे दिन कोई होते ही नहीं हैं। कभी बाद में बुलेट ट्रैन की बात को भी हवा में उड़ा देंगे तो क्या करोगे। किसने सोचा था समय इतनी तेज़ गति से गुज़र जाता है सत्ता वालों का कि वादे गिनने तक की फुर्सत नहीं मिलती। मेरी धर्मपत्नी मुझे समझा रही हैं मोदी जी से ड्रेसिंग सेंस सीखनी चाहिए। उनको कौन बताये हम लोगों के पास करोड़ों रूपये हों कैसे इतनी महंगी शानदार पोशाकें खरीदने को। ये तो अमिताभ बच्चन जी भी नहीं कर सकते जो दो मिंट के विज्ञापन करने के करोड़ों रूपये लेते हैं। कहीं उनकी निराशा का कारण यही तो नहीं , उनकी शान उनकी शोहरत उनकी भक्ति ने उनको हीनभावना का शिकार कर दिया हो। तभी शायर कहते हैं , बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना , जहां दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता। या फिर ये शेर भी है , शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है। अपना तो साफ फ़लसफ़ा है। 

                नहीं कुछ पास खोने को , रहा अब डर नहीं कोई ,

                 है अपनी जेब तक खाली , कहीं पर घर नहीं कोई।

                     ( डॉ लोक सेतिया "तनहा ")


उपदेश उल्टी गंगा बहाने के ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    उपदेश उल्टी गंगा बहाने के ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

               सभी मुझे समझाते हैं , रोज़ यही सबक पढ़ाते हैं , मुझे याद रहता नहीं वो फिर फिर दोहराते हैं। तुम नकारात्मक सोचते हो सकारात्मक सोचा करो , मन को शांत कर लो। तुम नाहक परेशान होते हो कुछ भी गलत होता देख कर , और भी तो लोग हैं कोई चिंता नहीं करता है। जो होता है देश में होने दो , पहरेदारों को सोने दो। हर बात को देखने के दो नज़रिये होते हैं , गलास कितना खाली है मत देखो , कहो अभी भी कुछ बचा हुआ है ध्यान से देखो। अन्याय होने की बात क्यों करते हो , कभी कभी ऐसा भी होता है किसी आम आदमी को न्याय मिल गया और ख़ास को सज़ा हो गई। उसकी चर्चा करो , बात उसी की करते हैं जो हैरान करती है , जो हर दिन हर जगह होता उसकी बात करना बेकार है। आपके घर में नकारात्मकता बहुत है , आपको बुरा लगता है अनुचित बात का , अपने आप पर संयम रखो। गुस्सा आपकी सेहत को खराब करेगा , शांत हो जाओ , अपने मन को समझा लो यही आज का चलन है इसको स्वीकार करना होगा। बुराई को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला , कौन लड़ेगा उस से। हम लोग मच्छर से लड़ते हैं उसको खत्म करना चाहते हैं , सांप से घबराते हैं , अजगर से डर जाते है और शेर के सामने सांस रोक मुर्दा बन जाते हैं। शायद मरा हुआ जानकर उसे रहम आ जाये अन्यथा समर्पण ही करना है , हम लड़कर नहीं मरना चाहते बिना लड़े जान देने को राज़ी हैं। देखो आपके घर में जितनी धूल है उसको गलीचे के नीचे छिपा रहने दो , कालीन को साफ रखना है , मन की मैल को साफ नहीं करना केवल बदन को साफ करना है और चेहरे को सुंदर बनाना है , शानदार कपड़े पहनने हैं। लोग बहुत उपाय करते हैं नकारात्मकता का अंत करने को और सकारात्मकता का दुशाला ओढ़ने को। समझदार लोग बीच का रास्ता बना लेते हैं , औरों की खराब बातों का शोर मचाते हैं और अपनी सब खराब बातों पर मानते हैं कि ये करना ज़रूरत है मज़बूरी है , नकरात्मक और सकारात्मक के बीच अचारात्मक नाम की नई जगह बना लेते सुविधा से। बाहर गर्म हवाएं चलती रहें आपको उनकी बात नहीं करनी है , आपको अपने लिए ढंडक का उपाय कर आराम से सोना है। 
                                    गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को लड़ने का उपदेश दिया था , आजकल गीता का उपदेश देने वाले अन्याय से युद्ध करने को नहीं कहते हैं। गीता पढ़ने से शांति मिलेगी मगर समझने की कोशिश की तो अशांत हो जाओगे , समझना नहीं है केवल रटना है। आज इक संदेश मिला मुझे बेटी ने भेजा व्हाट्सएप्प पर। अंग्रेज़ी में है , हिंदी में अनुवाद इस तरह है। सत्य युग में युद्ध दो अलग अलग लोक में रहने वालों में हुआ , देवता और दानव। त्रेता युग में दो देशों में शासकों में हुआ , राम और रावण। द्वापर में युद्ध एक परिवार में हुआ , कौरव और पांडव। ऐसे पाप दो अलग लोकों से , दो देशों में , फिर इक परिवार में भाईयों में पाप और पास आता गया।  अब कलयुग में पाप हमारे अंदर ही है और हमें उस से लड़ना है ताकि खत्म कर अपने भीतर के मानव को ज़िंदा रख सकें। मगर ध्यान दें अब बुराई के विरोध में कोई भाई अच्छाई की तरफ नहीं जाता , विभीषण का नाम बदनाम है , घर का भेदी लंका ढाये। अब आपके घर में कोई पापी है तो उसको बचाएं अपने मन के पाप को तो उचित ठहराएं। धर्म क्या अधर्म क्या भूल जाएं , बस मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाकर सीस झुकाएं , चढ़ावा चढ़ाएं और प्रसाद ले आएं। झूठ बोलते बिल्कुल भी नहीं शर्माएं , पाप करते कभी नहीं घबराएं। आरती गायें दीप जलाएं। नमाज़ अदा करें चादर चढ़ाएं। रविवार को मोमबत्ती जलाकर उजाले की बात करें , बाहर कितना अंधेरा है आप भूल जाएं। हर किसी को ससरिकाल बुलाकर सच कहने की बात वहीं छोड़ जाएं , झूठ से अपना काम जितना चल सकता है चलाएं। 
                     मगर मुझ से हुआ नहीं , कभी होगा भी नहीं , कि सब नकारात्मक बातों को अनदेखा करूं और सोचने लगूं कि शायद इसी में ही भलाई है। इस से भी बुरा हो सकता था। जी यही बात किसी पुलिस वाले ने मुझे समझाई थी , आप शरीफ आदमी किसी गुंडे से अपराधी से कैसे लड़ोगे। आज बुरा भला कहा उसने तो शुक्र मनाओ उसने मार पीट नहीं की। किसी गरीब की बेटी को कोई उठाकर ले गया और कदाचार कर वापस छोड़ गया तब भी पुलिस अधिकारी यही समझा उसकी शिकायत निपटा गए कि जान से तो नहीं मारा उस ने आपकी बेटी को। इसको सकारात्मकता कहते हैं , जान है तो जहान है। किसी जगह लिखा हुआ था दुनिया क्या है , बस इक कब्रिस्तान है। बात गंगा से शुरू करनी थी , गंगा कितनी मैली है की बात को छोड़ो अब गंगा की सफाई की बात करो बेशक इस बीच गंगा की गंदगी और बढ़ती गई हो। गंगा को गंदा करो और उसकी सफाई की बातें भी करो , यही सकरात्मकता है।

Wednesday, 13 September 2017

हिंदी, हिंदीं दिवस और हिंदी वाले ( आईने के सामने ) डॉ लोक सेतिया

हिंदी, हिंदीं दिवस और हिंदी वाले ( आईने के सामने ) डॉ लोक सेतिया

      मेरी ज़िंदगी गुज़री है हिंदी में लिखते लिखते। 44 साल से तो नियमित लिखता रहा हूं हर दिन। आज 14 सितंबर है हिंदी दिवस , क्या पाया क्या खोया सोचता हूं। हिंदी से बहुत लोग बहुत हासिल कर रहे हैं , हिंदी की फ़िल्में करोड़ों का कारोबार करती हैं , हिंदी की किताबें छापने वाले प्रकाशक भी मालामाल हैं , हिंदी के अख़बार भी करोड़ों की कमाई करते हैं , पत्रिकाएं भी खूब पैसा नाम शोहरत हासिल कर रही हैं , हिंदी के टीवी चैनल तो खुदा का रुतबा पा चुके हैं। सरकार की स्थापित की साहित्य अकादमी देश की राज्यों की भी करोड़ों के बजट से अपनों अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम कर रही हैं , हर नई बदलती सरकार अपने चहेतों को निदेशक और सदस्य बनाकर हिंदी की भलाई में खुद की भलाई करती है। पहले नहीं होता था साहित्य अकादमी की पत्रिका पर सत्ताधारी का नाम , संपादक का नाम ही पहला होता था और निदेशक प्रधान संपादक होता था। मगर कुछ साल से जिनको साहित्य से कोई सरोकार ही नहीं उनके नाम नेता अधिकारी के पहले दिए जाते हैं। अब तो विमोचन भी हर अंक का राजनेता से करवाया जाता है और कभी वो भी उनके निवास पर जाकर। हम हिंदी दिवस औपचारिकता निभाने की तरह निभाते हैं , कुछ जगह तो हिंदी दिवस वाले दिन नहीं किसी अन्य दिन ही मनाया जाता है। व्यंग्य वाले इसे श्राद्धपक्ष से जोड़ा करते हैं और जिस बात पर रोना आये उस पर ठहाके लगाते हैं। हिंदी के कवि सम्मेलन में हिंदी का चीर हरण होता दिखाई देता है। कविता संवेदना नहीं जगाती शोर करती है , इक दहशत पैदा करती है , और हर सुनाने वाला बार बार तालियों की गुज़ारिश भीख मांगने की तरह करता है। गीत कभी मधुर होते थे आजकल गंदी बात का युग है। हिंदी का भी बाज़ार है और बहुत बड़ा कारोबार है मगर उस बाज़ार में लिखने वाला न बेचने वाला है न ही खरीदार ही है , वो तो तमाशाई है और खुद ही तमाशा भी। मुझे यकीन है मेरी तरह अधिकतर लिखने वालों को लोग समाज ही नहीं उनके अपने भी इक ऐसा शख्स समझते होंगे जिस को कोई ढंग का काम आता ही नहीं , और ऐसा बेकार का काम कर रहा है किसी पागल की तरह जिस से हासिल कुछ भी नहीं होता। घर फूंक तमाशा देखता है। मगर क्या करूं मेरी विवशता है , बिना लिखे दम घुटता है , लिख रहा तभी ज़िंदा हूं नहीं लिखता तो कभी का मर गया होता। ये जीना भी कोई जीना है बहुत लोग मानते हैं , मगर मुझे लगता है जीना इसी का नाम है। आप कुछ तो सार्थक करते हैं देश और समाज का सच लिखकर बिना किसी स्वार्थ या आर्थिक लाभ के। 
                                   हिंदी दिवस भी मनाये जाते देखा है दो चार बार , क्योंकि मेरे शहर में हिंदी साहित्य को हमेशा को दफ़्ना दिया गया है कुछ खुद को बड़ा लेखक समझने वालों द्वारा , इसलिए ये शोकदिवस यहां मनाया ही नहीं जाता है। यहां कवि सम्मेलन भी करते हैं तो अपने शहर के कवियों को नहीं बुलाते , घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध , और ऐसे में बहरी कवि ग़ज़लकार आकर पूछते हैं स्थानीय लिखने वालों के नाम वो क्यों नहीं आये। क्योंकि उनके लिए ये शहर लोक सेतिया , ठक्क्र जैसों का नगर है। मेरी तरह बहुत लोग हैं जिनकी रचनाएं सभी विधा की देश की पत्रिकाओं और अख़बारों में सालों से छपती हैं मगर अधिकतर कोई मानदेय नहीं देते हैं और कुछ देते हैं तो भीख की तरह , बहुत कम हैं जो नियमित रूप से इक उचित राशि भेजते हैं। खुद को हिंदी के हितेषी बताने वाले बड़े अख़बार भी मानदेय की राशि कभी भेजते हैं कभी नहीं भी भेजते और धीरे धीरे जब लेखक इसकी बात नहीं करता तो भेजना बंद ही कर देते हैं। ये सभी हिंदी को बढ़ावा देते हैं मगर हिंदी लिखने वालों का शोषण कर के। शायद इन सभी को लगता है हिंदी के लेखक को भूख प्यास नहीं लगती और उसको पैसा नहीं देना उसकी भलाई है ताकि उसको दर्द का एहसास होता रहे और दर्द बेहद ज़रूरी है लिखने को। आप ने कोई और काम ऐसा देखा है जिस में दिन रात पूरी लगन से निष्ठा से काम करता रहे कोई बिना अपनी मेहनत का मोल मिले भी। हिंदी लिखने वाले किसी और काम से आमदनी कर के अथवा साहित्य अकादमी से अनुदान लेकर अपनी किताब छपवाते हैं और फिर अपनी किताबों को अपने जान पहचान वालों को उपहार स्वरूप देते हैं भले वो पढ़ें या नहीं पढ़ें। फिर अपने किसी लिखने वाले से लिखवा किताब की समीक्षा खुद ही भेजते हैं सब जगह उसके नाम से। किताब का विमोचन करवाते हैं कभी पुस्तक मेले में दिल्ली जाकर तो कभी साहित्य अकादमी के कार्यकर्म में या फिर हिंदी दिवस मनाने को अपने शहर के आयोजित सभा में जिस में किताब लिखने वाले किताब की समीक्षा पढ़ने वाले ही दिखाई देते है और कोई साहित्य अनुरागी नहीं नज़र आता। 
                               हिंदी दिवस पर हिंदी की हालत की कोई बात नहीं करता। स्कूली बच्चों की लिखी कविताओं जैसी रचनाओं को पढ़कर सुनाया जाता है। मेरा भारत महान। सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा। की तरह ही हिंदी को माथे की बिंदी बताते हैं। मगर हिंदी को अपने को सजाने को दिया जाता कुछ भी नहीं , क्या उसे उधर मांगकर कपड़े पहन और खुद को सजाकर लाना है। सजना भी किस की खातिर है। हिंदी की दशा उस महिला जैसी है जिसे मालूम ही नहीं वो क्या है। सुहागन है तो सुहाग कौन है। विधवा है तो किस की। और छोड़ी हुई है तो किस ने छोड़ दिया है। कुंवारी है तो हर कोई क्यों उस पर जब ज़रूरत हो अपना हक समझ हुक्म चलाता है। आज हिंदी को बता तो दो क्या है वो।



Tuesday, 12 September 2017

दूरदर्शी सीधा प्रसारण ( महाभारत भी रामायण भी ) डॉ लोक सेतिया

दूरदर्शी सीधा प्रसारण ( महाभारत भी रामायण भी ) डॉ लोक सेतिया 

            उनको लगा अब तो खुद अपनी आंखों से देश का हाल देखना चाहिए। टीवी पर तो हर दिन उसी की महिमा दिखाई देती है। अपनी आंखों से गांधारी जैसी बांधी हुई पट्टी खोल कर विदुर की दिव्य दृष्टि से देश और जनता की बेहतर हुई हालत देखनी चाहिए। सवाल किया महात्मा जी बताओ स्वच्छ भारत कितना सुंदर लगता है। जवाब मिला स्वच्छ भारत तो टीवी पर इश्तिहार ही रह गया है और देश भर में गंदगी पहले जैसी क्या और भी अधिक हो गई है। जिस जिस जगह स्वच्छ भारत के पोस्टर लगे हैं हर उस जगह ही कूड़ा और गंदे पानी की बदबू से बुरा हाल है। स्वच्छता की परिभाषा बदलनी पड़ेगी ताकि जितना धन खर्च किया गया उसको उचित बताया जा सके। किसी ने स्वच्छता उप कर का हिसाब मांगा तो बताया गया कोई हिसाब नहीं है , हिसाब ही नहीं देंगे तो कोई गड़बड़ की बात कैसे कहेगा। 
          चलो और कोई सवाल करो अब , अच्छा बताओ मेक इन इंडिया से क्या क्या हुआ। मेक इन इंडिया तो खो गया कहीं मगर अब जापान से बुलेट ट्रैन बनवा रहे हैं। इक विदेशी के साथ मिलकर सड़क पर तमाशा दिखला रहे हैं , आधे घंटे के सफर की खातिर करोड़ों खर्च कर नौ किलोमीटर की सड़क को खूब सजा रहे हैं। लोग भूखे हैं और सत्ता वाले जनता का धन बेकार के आयोजनों पर उड़ा रहे हैं। 
         चलो ये बताओ सब की समानता कितनी हो चुकी है। सब आज़ादी का लाभ पा रहे हैं। मत पूछो देश को किस दिशा को ले जा रहे हैं। हर संस्था की धज्जियां उड़ा रहे हैं , उनकी बताई धुन सभी विवश हो गा रहे हैं। विपक्ष की बात नहीं सुनाई देती सत्ता वाले इतने ऊंचे स्वर में चिल्ला रहे हैं। हंसना रोना दोनों उनकी मर्ज़ी से , खुद हंस रहे बाकी सब को रुला रहे हैं। 
         ये तो बताओ उनके साथ जो पितामह हैं क्या उनको नहीं राह दिखला रहे हैं। उनकी अपनी हालत ऐसी हुई है न मर ही सकते न जी पा रहे हैं। शायद अपनी भूल पर मन ही मन पछता रहे हैं। धर्मयुद्ध नहीं अधर्मयुध है राजनीति , नए नए सबक लिखे जा रहे हैं। रामायण लिखने वाले सोचने लगे हैं , महाभारत क्या है समझने लगे हैं , गीता के अर्थ खोजने लगे हैं। इधर कौन क्या है क्या नहीं है कहीं पर सब कहीं कुछ नहीं है। जहां आस्मां था वहां अब ज़मीं है , ज़मीं पर आजकल कोई नहीं है। अभी तो न जाने क्या क्या है होना , जिन्हें आम मिले हैं खाने को , चाहते हैं अब वही बबूल ही बबूल सब जगह बोना। फूल और गुलदस्ते तो हैं सोशल मीडिया पर भेजने को , हर कोई सबकी राह में बिछाता है कांटें ही कांटे। 
         ( अचानक सरकार को खबर हो गई इसकी और नेटवर्क जैम कर दिया गया है )

             अभी कथा जारी है , आप जाईयेगा नहीं , थोड़ा अंतराल लेना है



अंधेर नगरी चौपट राजा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    अंधेर नगरी चौपट राजा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

             राजा तो कोई होता नहीं फिर भी खुद को सेवक भी कोई समझता भी नहीं। सत्ताधारी दल को शायद गर्व हो सकता है बुलेट ट्रैन की आधारशिला रखने पर , क्योंकि और तो कुछ भी अच्छा देश को मिला नहीं भाषणों के सिवा। महंगाई बेरोज़गारी अपराध बढ़ने और नेताओं की असंवेदनशीलता की कोई सीमा बची नहीं है। जनता से अधिक से अधिक पैसा लूटने का काम किया जा रहा है हर तरह से , पेट्रोल के दाम विश्व में आधे हो गए मगर सरकारी लालच कम नहीं हुआ। इक तमाशा रोज़ होता है , उत्तर प्रदेश में किसानों को दस बीस और सौ दो सौ की राशि का चेक मिलता है और कार्यकर्म में नाच गाना होता है महिला नृत्य का। जिनकी सरकार उनको मनोरंजन ज़रूरी लगता है हर अवसर पर। इधर जापान से अनुबंध कर एक लाख करोड़ की राशि से केवल दो शहरों में बुलेट ट्रैन की शुरुआत की जा रही है। आपको जानकर अचरज होगा कि ये राशि देश की स्वास्थ्य सेवा की राशि से दोगुनी है और शिक्षा की राशि से भी दोगुनी है। वास्तव में शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों की राशि को मिलाकर भी इस से कम बजट खर्च करती है सरकार। देश में तीस प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और अभी भी पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य अधूरा है। गरीबों की बात करने वालों की प्राथमिकता गरीब नहीं हैं। क्या जिस मार्ग से नेता को गुज़रना हो कुछ देर को बस उसी को साफ़ सुथरा और सुंदर बनाया जाना उचित है। अगर देश वास्तव में स्वच्छ करना है तो इसको बंद करना होगा , ख़ास लोगों को भी जो वास्तविकता है दिखाई देनी चाहिए। कब तक आप केवल शोर मचाकर देश की जनता को धोखे में रख सकते हैं। विपक्ष का उपहास करना जनतंत्र के खिलाफ है जो सत्ताधारी दल के लोग करते नज़र आते हैं। इसे देखकर लगता है जैसे इतना बहुमत पाकर उनको अहंकार हो गया है , जबकि बहुमत जिन अच्छे दिनों की बात से मांगा था उनका कहीं अता पता नहीं है। काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती ये याद रखना ज़रूरी है।

Monday, 11 September 2017

हिंदी का गाना , हिंदी का रोना ( निट्ठला चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

हिंदी का गाना , हिंदी का रोना ( निट्ठला चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

      आज 12 तारीख है 14 सितंबर को है हिंदी दिवस , हमने 10 तारीख को ही हिंदी दिवस मना भी लिया। मैं भी बुलाया गया था , शामिल भी हुआ था , मगर दो दिन बाद भी मुझे समझ नहीं आ रहा उसका मकसद क्या था। जाकर देखते ही समझ आया मंच सजा हुआ है मगर वातावरण में शोक सभा जैसी ख़ामोशी है , आधा हाल खाली है , केवल वही लोग आये हुए हैं जिनको आना ही है अपने अपने मकसद से। लोग आपस में अपनी खुद की बात कर रहे हैं बाकी सब से नमस्कार की औपचारिकता निभा कर। दिवार पर संस्था का बड़ा सा पोस्टर चिपका है जिस पर बहुत नाम हैं और कुछ किताबों की तस्वीर हैं जिनका विमोचन किया जाना है। विचार विमर्श और कविता पाठ की भी बात लिखी गई है। जैसा कि परंपरा है एक घंटा देर से मुख्य अतिथि आये तभी कार्यकर्म शुरू हुआ है। साहित्य के आयोजन में राजनेता मुख्य महमान हैं ताकि दो पांच हज़ार दे कर हिंदी पर उपकार कर जाएं। बताया गया आज केवल हिंदी के बारे लिखी रचनाएं ही पढ़नी हैं , हिंदी को जैसे बांध दिया गया हो ऐसा लगा। सब से पहले शुरुआत की किसी ने और कई देशों में लोग हिंदी में बात करते हैं ये समझाया कि उन्होंने किस किस देश की यात्रा की है और बाज़ार में खरीदार से सब उनकी भाषा में औपचारिक बात करते है बताकर साबित किया कि हिंदी का परचम लहरा रहा है। विचार की बात थी मगर विचार नहीं किया गया कि इस में शुद्ध कारोबार है भाषा से अनुराग नहीं। हिंदी बोलना उनकी ज़रूरत है मज़बूरी है पसंद नहीं है। मैंने देखा लोग उनकी बात पर ध्यान नहीं दे रहे थे , श्र्द्धांजलि सभा में दिंवगत आत्मा की सद्गति की बात की तरह। इस तरह सब बारी बारी आते रहे और हिंदी हिंदी दोहराते रहे। स्कूलों दफ्तरों में बच्चे लाते हैं लिखकर उस तरह की रचनाएं हिंदी है माथे की बिंदी , हिंदी का आकाश , हिंदी से हर काम , हिंदी तुझे सलाम , कौन क्या पढ़ रहा कोई नहीं सुन रहा था। इक बोझिल सा समां लगा मुझे जैसे किसी बच्चे को अध्यापक ने आदेश दिया हो और उसे खड़े होकर लिखी नोटबुक से पाठ पढ़ना है चाहे क्लास में बाकी बच्चे अपनी बातों में व्यस्त हों। मुझे किसी की भी रचना में कुछ भी नया और सार्थक नहीं मिला , यही लगा कहां आ गया क्यों आ गया। बीच बीच में किसी लेखक की किताब का विमोचन होता और उस के बाद उस के किसी अपने से उस की समीक्षा पढ़ने की बात होती रही। बिना सुने सब समझ रहे थे अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग है। इक समीक्षक को लिखने वाले की कहानी मुंशी प्रेमचंद जैसी और उन से बेहतर लगी। अब इस में किसी को क्यों आपत्ति हो , जिस को जो पसंद हो। मैं भी अपनी पत्नी की पसंद को अपनी पसंद बताता हूं हमेशा। सभा के अंत से पहले मुख्य अतिथि को किसी और सभा में जाना था भोग की बात थी अर्थात कोई शोक सभा होगी। मैं भी चला आया था अपनी दो ग़ज़ल पढ़कर जो हिंदी में लिखी थी पर हिंदी पर नहीं थीं , ये अपराध करना ही पड़ा क्योंकि मुझे आज के हालात पर समाज की वास्तविकता पर बोलना था , तोता रटंत नहीं करता मैं कभी भी। मगर मुझे मालूम है उस के बाद जो जो हुआ होगा। कुछ लोगों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया होगा और सफल आयोजन की बधाई भी दी गई होगी। बस इक बात खो गई होगी कि इस से हिंदी की क्या भलाई हुई है। मुझे ख़ुशी है बहुत लोगों से मिलना हुआ इसी बहाने , मगर समझा नहीं आयोजन का हासिल क्या है। शायद चार दिन पहले अपनी सुविधा से हिंदी दिवस मनाने की बात से ही मुझे समझ लेना था ये इक आडंबर है जो साल दर साल दोहराना पड़ता है ये बताने को कि हम हिंदी वाले हैं।

व्यवस्थिक ढंग से अव्यवस्था की सरकार ( वास्तविकता ) डॉ लोक सेतिया

     व्यवस्थिक  ढंग से अव्यवस्था की सरकार ( वास्तविकता )

                          डॉ लोक सेतिया

       अब राज़ खुल गये हैं , साधु संतों और धर्म वालों के ही नहीं , नेताओं सरकारों और कानून व्यवस्था कायम रखने को तगड़ा वेतन सुख सुविधाएं हासिल करने वाले अधिकारियों तक सभी के। सब शामिल हैं व्यवस्थिक तरीके से अव्यवस्था फैलाने में। जब चलना ही जंगलराज है तब इन सब सफेद हाथियों की ज़रूरत ही क्या है। घोषित ही कर दो देश में आज़ादी है जो चाहो करो , कोई रोक टोक नहीं कोई सज़ा नहीं। सज़ा हो तो सब को मिलनी चाहिए जो जो तमाम अपराध होते देखते रहे , अपराधियों को बचाते रहे। एक अपराधी को अपराध की दुनिया बनाने देने को कितनों ने अपनी ईमानदारी अपने कर्तव्य की अनदेखी की , कोई हिसाब नहीं। बात किसी एक जगह की नहीं एक शहर की नहीं एक कारोबार की नहीं है। आज ही देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुगांव में स्कूल में इक बच्चे के कत्ल पर यही कहा है। सवाल देश भर के मासूमों का है और हर स्कूल का है शिक्षा से जुड़े सभी लोगों और सरकारों का है। टीवी वालों को हर खबर इक अवसर लगती है अपने लिए ये देख हैरानी होती है। 
          अगर वास्तव में देश में शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर वास्तविकता को समझा जाये तो पता चलेगा जैसे यहां कोई नियम कानून नहीं कोई देखने वाला नहीं कोई पालन करने वाला नहीं किसी भी कायदे का। कितना बड़ा कारोबार बना दिया है आपने इन दो बुनियादी ज़रूरतों को जनता की। और जो करोड़ों वसूल करते उन पर कोई निगाह ही नहीं किसी विभाग की। कैसे शिक्षक कैसी शिक्षा , कैसे हॉस्पिटल कैसे डॉक्टर्स और कैसी सुविधाएं और किस तरह के कर्मचारी और उपकरण।  सब जानते हैं सरकारी ही नहीं निजि बड़े बड़े नर्सिंग होम और हॉस्पिटल किसी भी मापदंड पर खरे नहीं हैं। किसी सरकार की इस से बड़ी लापरवाही क्या हो सकती है कि आप देखते ही नहीं शिक्षा और इलाज के नाम पर लोगों की ज़िंदगी से खिलवाड़ होता है। किसी खुली जगह कोई अपने धंधे को बढ़ाने को मुफ्त टेस्ट और उपचार की बात कर लोगों की ज़िंदगी से खेलता है क्योंकि कोई रोकने वाला नहीं है। कल ही मेरे इक दोस्त को बुखार हुआ तो इक डॉक्टर की लैब ने प्लेटलेट्स की कमी बताई दूसरी लैब ने टाईफाइड और तीसरी लैब ने कुछ और बताया। क्योंकि कोई नियम ही नहीं कौन करेगा जांच खून की , अनुभवी टेक्निटिशन या कोई भी लड़का दसवीं पास , जबकि होना पैथोलोजिस्ट डॉक्टर चाहिए।  मगर कोई भी डॉक्टर मरीज़ को किसी पैथोलोजिस्ट के पास नहीं भेजता , क्योंकि उनको निदान की नहीं हिस्से की चिंता है। क्या ये भ्र्ष्टाचार नहीं है।  हॉस्पिटल हो या स्कूल सब को सस्ता स्टाफ चाहिए और अधिक से अधिक कमाई भी।  इक आपराधिक चलन हो गया है बड़े बड़े हॉस्पिटल्स को मरीज़ भेजने में हज़ारों का कमीशन मिलने का। 
                 ये सरकार खुद को ईमानदार सरकार बताती है मगर इसका तौर तरीका आपराधिक ही है। कभी मुख्यमंत्री की सभा में जाने वालों से काली जुराब तक उतरवाई जाती हैं तो कभी पूरा हाईवे ही बंद किया जाता है चाहे कोई एम्बुलेंस ही क्यों नहीं हो।  मानवता की बात सरकार प्रशासन और पुलिस में नहीं है तभी अपराधी अपराध करते डरते नहीं हैं। नेताओं की औलाद के अपराध का बचाव लोग करते हैं और सरकार भी अपराधियों के पक्ष में खड़ी है।  अच्छे दिन ऐसे होते हैं किसी को पता नहीं था।

Sunday, 10 September 2017

कुछ कागज़ के कुछ पत्थर के ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

    कुछ कागज़ के कुछ पत्थर के ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

            बहार का मौसम था और फूलों की बात थी। फूल बंद हाल कमरे में सजे हुए थे तरह तरह के नाम रंग वाले। कोई सुगंध नहीं थी जबकि कितना इतर उपयोग किया गया था। सभा आयोजित की गई थी और सब को फूलों की ही बात करनी थी। सब लिख कर लाये थे पढ़कर सुनाने को , ये फूल कागज़ वाले थे जिनका दावा था वो मुरझाते नहीं कभी। किसी ने हाथ लगाया और सब कागज़ बिखर गए भरी सभा में। हर कोई अपनी बात कहने को आया था और मंच से समझाता रहा सब को बहार की बात। सुनी नहीं किसी ने किसी की भी बात। बहार का अनुभव बंद कमरों की सभा में करना और करवाना चाहते थे सभी। सब अपने अपने कुएं को समंदर समझ रहे थे , सब अपनी अपनी ऊंचाई बढ़ाने को आतुर थे और किसी ऊंची जगह खड़े होने की कोशिश कर रहे थे। रेत के टीले का क्या पता कब हवा में बिखर जाये। अपनी अपनी महिमा का बखान अपने अपने साथी से करवा खुद ही आत्ममुग्ध हुए जा रहे थे। कोई दूसरे की महिमा से प्रभावित नहीं हो रहा था। कोई हर किसी के पास जाकर अपनी नई दुकान का पता बता रहा था। कोई रौशनी बेच रहा था बहार वाले बाज़ार में तो कोई सहयोग का कारोबार करने की बात कर लेन देन पर ही अटका हुआ था।  सब महान काम करने का दावा कर रहे थे। मुझे बहार को देखना था मगर उस जगह खिज़ा ही खिज़ा हर तरफ दिखाई दे रही थी , सूखे पत्ते और उदासी थी छाई हुई। 


      लोग मतलब के बहुत सच्चे लगे , फूल कागज़ के सभी अच्छे लगे।


Friday, 8 September 2017

ख्वाबों ख्यालों की दुनिया ( उल्टा सीधा ) डॉ लोक सेतिया

   ख्वाबों ख्यालों की दुनिया ( उल्टा सीधा ) डॉ लोक सेतिया 

                 ये दौलत भी ले लो , ये शोहरत भी ले लो। भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी। मगर मुझ को लौटा दो बचपन का सावन।  वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी। वो नानी की बातों में परियों का डेरा , वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा। भुलाये नहीं भूल सकता है कोई वो छोटी सी रातें वो लंबी कहानी। जगजीत सिंह भी नहीं हैं , जसपाल भट्टी भी नहीं हैं , लोग भूल भी गए थे नानी की कहानी को। मगर कोई नहीं भूल सका इक सपना जो चार साल पहले उसने देखा था। देश में कहीं है कोई परियों के डेरे जैसी जगह जहां सभी अजूबे सच हैं। बड़े बड़े महल रंगीन शामें रौशन दिन रात और इक ख्वाबों ख्यालों की दुनिया जिसे देख कर कोई विश्वास नहीं करता कि वो सपना ही है या वास्तविकता भी हो सकती है। सब से पहले उस ने सपने को सच करने को इक लाल किला बनाकर उस से भाषण दिया था और सपनों को बेचने का भव्य शोरूम खोला था। लोगों को बताया था नकली पहले बनाये जाते हैं असली बाद में बन जाते हैं। हर इमारत का मॉडल पहले बनाया जाता है फिर उसी तरह की इमारत खड़ी की जाती है। और उसने वादा नहीं किया था , इक सपना दिखलाया था सब अच्छा लाने का , ख्वाबों की दुनिया को ढूंढ लाने का। 
          आखिर वो परियों का डेरा मिल ही गया , सब को पता था मगर किसी को भी दिखाई नहीं देता था। अब इक हादसा हुआ और जो सब जानते थे मगर देख कर भी नहीं देखते थे , उसका पता सब को चल गया। बस आजकल उसी का शोर है , उसकी हर छुपी हुई बात तलाश की जा रही है। कभी कभी ख्वाब डरावने भी होते हैं , ये सच्ची बात है , मुझे बचपन में अक्सर इक ख्वाब आता था और मुझे बुखार तक चढ़ जाया करता था। पिता जी ने इक छोटी सी तलवार मुझे दी थी रात को अपने सिरहाने के नीचे रखने को। अब याद नहीं कब वो डरावना ख्वाब आना बंद हुआ। सपनों की इक सतरंगी दुनिया किसी ने कब कैसे बसाई कोई नहीं जानता , मगर उस दुनिया की चमक दमक के पीछे बहुत राज़ दफ़्न थे बादशाहों के महलों की तरह। रंगारंग कार्यकर्मों की ऊंची तान में सिसकियों की आवाज़ सुनाई कहां देती है। आज भी सत्ता को भला अपनी शानो शौकत से अधिक कुछ नज़र आता है , अपनी जय जयकार सुनना सभी चाहते हैं। देश विदेश में सब यही कर रहे हैं। लोक शाही संविधान सब भूल गए हैं , सेवक हैं की बात किसे याद रहती है , मसीहा कहलाना चाहते हैं। हर मसीहा बहुत कुछ छुपाये रहता है , सब से पहले यही सच कि मसीहा मसीहा होता ही नहीं। कोई भी मसीहा गरीबों को कुछ देने को नहीं आता , मसीहा होने की कीमत वसूलता है। भगवान बनाकर लोग बड़ी भूल करते हैं। भगवान का सच यही है , खुद आलिशान घरों में रहता है , सज धज कर सिंघासन पर बिराजता है , सुबह शाम आरती होती है उसकी और मनपसंद व्यंजन का भोग लगाया जाता है। भगवान बना दिया तो उस से सवाल नहीं कर सकते कि किया क्या है ये कैसी दुनिया बनाई है जिस में इतना भेद भाव है। सब को सब बराबर देना था , और भारत भुमि पर तीन चौथाई दौलत दस फीसदी अमीरों की और नब्बे फीसदी इक चौथाई की खातिर लड़ते मरते हैं जीने को हर दिन।  भगवान की ये कैसी सियासत है। 
           ताजमहल हो या चीन की दीवार , सब बने गरीबों की लाशों पर ही हैं। परियों के स्वर्ग और जन्नत की हक़ीक़त भी अलग नहीं होगी। इंसान और इंसानियत की बात नहीं और सपने बेचते हैं सुनहरी रंग वाले। सपने छलते हैं और सपनों के पीछे भागने वाले असलियत से बहुत दूर हो जाते हैं। ख्वाबों की दुनिया कितनी भी सुंदर हो जागते ही सामना फिर उसी हक़ीक़त से होता है। आज की हक़ीक़त बड़ी भयानक है और सब अच्छा बनाने वाले आज भी परियों के डेरे के मोहजाल से निकलना नहीं चाहते। उन्हें मालूम नहीं बिना उसके उनकी नैया पार कैसे होगी। ये नशा है जो उतरता नहीं आसानी से , मगर इक सच और भी है। देश की जनता भले और कुछ नहीं कर पाए , बड़े बड़े शासकों के नशे को चकनाचूर करती रही है। होश में आने पर मालूम होता है जिन को हमने नासमझ लोग माना उनको हर बात की समझ थी। अच्छे अच्छों को बुरे दिन दिखलाती रही है ये जनता , जब ज़मानत भी नहीं बची उनकी जो समझते थे वही देश हैं , उन्हीं से देश कायम है।

Thursday, 7 September 2017

आंखों वाले अंधे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

           आंखों वाले अंधे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

             नीम हकीम खतरा ऐ जान। मुहावरा सब को याद है। मगर फिर भी खुद खतरा मोल लेते हैं लोग। इधर बहुत आसान है किसी सार्वजनिक जगह पर अपनी दुकान लगाकर मुफ्त जांच के नाम पर अपना कारोबार बढ़ाने का काम करना। मुफ्त की हर वस्तु सस्ती नहीं होती है , खुले आसमान के नीचे किसी मरीज़ की जांच करना शायद ही नियमानुसार उचित हो। अब ये करने वाला शिक्षित है अथवा बिना शिक्षा लिए करता है कोई अंतर नहीं है। ज़हर आपको दोस्त देता है या दुश्मन ज़हर ज़हर का काम करता है। सरकार कभी देखती नहीं कौन कैसा अपराध कर रहा है , हम जानते समझते हैं ये अनुचित है फिर भी अनदेखा करते हैं। जब आप गंदगी के ढेर वाली जगह अजनबी लोगों से अपनी जांच और उपचार कुछ पैसों के लालच में करते हैं तब आप कितनी भयानक बिमारियों को बुलावा देते हैं नहीं जानते। सरकार सभी को स्वास्थ्य सेवा नहीं दे सकती मगर इतना तो कर्तव्य निभाना कठिन नहीं कि किसी को आम जनता के जीवन से ऐसा खिलवाड़ नहीं करने दे। बहुत कुछ नहीं बहुत अधिक अपराधिक ढंग से खिलवाड़ किया जाने लगा है लोगों के स्वास्थ्य के साथ। क्या बड़े बड़े सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स को अपने पास रोगी भेजने की कमीशन देना अथवा किसी डॉक्टर का कमीशन खाना उचित है। नीम हकीम भी वही करते है और बड़े बड़े उच्च शिक्षा वाले डॉक्टर भी। हम्माम में सभी नंगे हैं। आप को पैसा कमाना आता है सौ तरीकों से , आपको खुद अपने ही जीवन से खिलवाड़ करने की बात क्यों समझ नहीं आती , तब आपकी समझ आपकी जानकारी को लकवा मार जाता है। आजकल अधिकतर रोग इसी कारण बढ़ रहे हैं , ईलाज के बिना नहीं गलत ईलाज से मरना अधिक अफसोसजनक है।

Tuesday, 5 September 2017

मुहब्बत तब से अब तक ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया

     मुहब्बत तब से अब तक ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

               आजकल ये होता नहीं है , कभी अक्सर हुआ करता था। किसी विषय पर खुली सभा में चर्चा करवाना। आजकल टीवी पर ही बहस होती है और सब को पता होता है जो आजकल जिस दल के साथ है उसको उसकी ही बात कहनी है। हमने इसी को शोध का विषय रख दिया और जिनको पी एच डी की डिग्री लेनी उनको इस पर शोध करना पड़ा और आज सब का सार इस सभा में चर्चा में सामने आया है। जब परदादा जी का समय था तब मुहब्बत करते थे हर किसी से , घर परिवार ही नहीं , आस पड़ोस तक नहीं , गांव क्या हर जान पहचान वाले से बात करते तो प्यार से ही और याद रखते सभी को। इश्क़ किसे कहते कभी सोचा ही नहीं था किसी ने। नफरत कोई किसी से नहीं करता था , किसी की बात अच्छी नहीं लगती तब भी बड़े प्यार से बताते भाई ये ठीक नहीं है , और कोई बुरा भी नहीं मानता था। दादा जी के ज़माने में फिल्मों और नाटकों में मुहब्बत की बात होती थी , मुहब्बत करना आंसू बहाना और अपने आप को तबाह करना। सब इस से बचते थे , दिल में ऐसा बुरा ख्याल आये भी तो निकाल देते थे। महिला क्या पुरुष भी लाज शर्म का पास रखते थे। पिता जी के समय रंगीन फिल्मों का युग आया तो युवकों पर फ़िल्मी नायिकाओं से प्यार का खुमार चढ़ा हुआ था। मगर शादी हो जाती तो अपनी बीवी ही फ़िल्मी नायिका सी लगती थी। अगली पीढ़ी बीच मझधार में अटकी रही , दिल ही दिल में प्यार मगर इज़हार करने से डरते डरते , बात खत्म हो जाती। बड़े भाई के समय लोग बिना सोचे समझे इश्क़ कर बैठते , मगर शादी तक बात नहीं पहुंच पाती थी। कोई कोई भाग कर शादी की मुसीबत मोल लेता , अधिकतर तकदीर का फ़साना जाकर किसे सुनाएं , इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं , जैसे गीत गाकर अपनी भड़ास निकाल लिया करते। ज़माना बड़ा ज़ालिम है कहते रहते। 
             अब तक संक्षेप में पुरानी कहानी सुनाई , आगे विस्तार से आधुनिक प्रेम की लघुकथा सुनाते हैं। लंबी नहीं चलती अब इश्क़ की कहानी , उपन्यास तो लिखा ही नहीं जा सकता। सब से पहले हर प्रेम कहानी में तीसरा किरदार होना लाज़मी है। साक्षी के साथ ही राहुल भी कॉलेज में पढ़ता था , और अब दोनों एक ही शहर में जॉब कर रहे हैं , राहुल का दोस्त अलोक साक्षी के साथ ही उसी कंपनी में जॉब करता है। सप्ताह के अंत में तीनों साथ साथ सिनेमा जाते हैं डिनर करते हैं मस्ती करते हैं। कभी कभी शादी की बात भी होती है मगर कोई खुलकर बताता नहीं उस के दिल में क्या है। हम अच्छे दोस्त हैं इतना ही सोचते हैं , मगर साक्षी भी समझती है राहुल और अलोक चाहते हैं उस से शादी करना , अभी कहना नहीं चाहते क्योंकि अभी उनको पहले जॉब में तरक्की अधिक ज़रूरी लगती है। साक्षी को यही लगता है शादी किसी से भी कर लें कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि शादी के बाद सब एक जैसे हो जाते हैं। पति पद मिलते ही महिला पुरुष एक समान नहीं रह जाते , कई सहेलियों को देखा है , प्यार किया शादी की और उसके बाद कुछ भी नहीं रहता। कोई जल्दी नहीं है , उसे खुद पहल नहीं करनी है , ऐसी कोई ज़रूरी भी नहीं शादी करनी। मगर करनी पड़ेगी नहीं तो पिता जी जाने कब कहीं रिश्ता कर देंगे। 
                                           इक दिन साक्षी नहीं आई तो राहुल और अलोक में शादी को लेकर बात हो ही गई। साफ भी हो गया दोनों को ही ऐसी लड़की चाहिए जो जॉब करती हो ताकि ज़िंदगी आराम से कट सके। अब वो साक्षी हो चाहे कोई और ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता , इसलिए दोनों ने फैसला किया कि इस से पहले कि कोई तीसरा भाजी मार जाये हम आपस में टॉस कर लेते हैं। सवाल इस का है कि साक्षी को कौन अधिक पसंद है ये पता लगाना ज़रूरी है। ये तय किया गया कि दोनों अपना अपना प्रस्ताव खत लिखकर साक्षी को भेजते हैं और फिर मिलकर बात करेंगे किस को साक्षी क्या जवाब देती है। दोनों इक दूजे को नहीं बताएंगे क्या लिखा है। और एक साथ दोनों के खत स्पीड पोस्ट से भेजे गए। अगले सप्ताह मिलने पर बताया जाना है कोई जवाब आया या नहीं आया। 
                           साक्षी को भी आज आना था उसी पार्क में , राहुल और अलोक थोड़ा जल्दी ही पहुंच गए आपस में बात करने को। राहुल खुश था उसको साक्षी का जवाब मिल गया था , लिखा था मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है तुमसे विवाह करने में मगर घरवालों की अनुमति लेनी होगी। आजकल कोई लड़की भाग कर कोर्ट मैरिज नहीं करती , माता पिता भी देखते बेटी खुश रहेगी ऐसा लड़का होना चाहिए। आमदनी और अपना घर रहन सहन बस यही देखना होता है , मिलकर दोनों के परिवार तय करते हैं। राहुल को लगा था बात बन ही गई है। अलोक के चेहरे पर भी कोई दुःख दर्द नहीं था , इक मुस्कान थी होंटों पर। राहुल ने पूछा क्या तुम्हें भी यही जवाब मिला है। अलोक ने बताया कि नहीं उस ने साफ लिखा है हम दोस्त हैं और इक दूसरे को समझते हैं पसंद भी करते हैं मगर तुमने जो जो दावे किये मुहब्बत में चांद तारे तोड़ लाने और मेरी ख़ुशी की खातिर सब करने के मुझे नहीं लगता तुम्हारी जॉब का भविष्य और आर्थिक हालत अभी उस सब की अनुमति देती है। अभी तुम इस बात को छोड़ अपने भविष्य की सोचो मेरा यही कहना है जो इक सलाह है। 
                     तभी साक्षी भी आ गई थी , अलोक ने कहा साक्षी मुझे ख़ुशी है तुमने राहुल को चुना है , मगर मुझे इक बात समझ नहीं आई कि मैंने तो खत में कोई बात लिखी ही नहीं थी। तुमने कैसे समझा मैं आजकल का युवक चांद तारे लाने की बात करूंगा। साक्षी ने कहा सच बताऊं मैंने तुम्हारा खत खोलकर पढ़ा ही नहीं क्योंकि मुझे डर था तुमने ऐसी बातें लिखी होंगी जैसी कविताएं तुम सुनाया करते हो। और कहीं मैं भावुकता में आकर तुम से शादी करने की भूल न कर बैठूं।  मगर तुमने क्या लिखा था बताओ तो। अलोक ने बताया कि मैंने तो कोरा कागज़ ही भेजा था ताकि तुम उस पर चाहो तो अपना नाम लिख दो। 
            आपको लगता है अब तो सब साफ हो गया है। राहुल और साक्षी की शादी हो गई होगी। मगर ऐसा नहीं है। गगन को साक्षी पसंद थी जो उसकी कंपनी में जॉब करती थी। गगन ने अपने पिता जी को अपनी पसंद बताई और उन्होंने जाकर साक्षी के माता पिता से उसका हाथ मांग लिया। गगन को लगा था साक्षी ही ऐसी लड़की है जो उसके साथ मिलकर कंपनी को और उंचाईयों पर ले जा सकती है। अलोक से राहुल अच्छा था और राहुल से गगन अधिक अच्छा है। साक्षी को कोई और अच्छा मिल जाता तो गगन से भी शादी नहीं करती शायद। आजकल के इश्क़ की अच्छी बात ये है कि कोई किसी से नाराज़ नहीं होता दुश्मनी नहीं करता इस बात को लेकर। सब को उस से और अच्छी या अच्छा मिल ही जाता है।

Monday, 4 September 2017

हिसाब कर रहे हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        हिसाब कर रहे हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

                     लाला जी की दुकान पर गया था , हाथ जोड़ विनती की थी थोड़ा समय और मांगा था उधार चुकाने को। लाला जी की आदत है जिस को उधार दिया सब को बताते रहते हैं उसने अभी तक ब्याज चुकाया नहीं है। लाला जी ने अपमानित कर वापस भेजा था। कुछ दिन बाद लाला जी उसके गांव में घर पर जा पहुंचे और अपना उधार चुकाने को कहा , उसने कहा आपकी दुकान पर आऊंगा खुद चुकाने को। मगर लाला जी ने घर में सब के सामने और आस पड़ोस वालों को सुनाते ऊंची ऊंची आवाज़ में खूब बुरा भला कहा। तब उसने कहा लाला जी आप कल सुबह आना आपका हिसाब करना ही होगा। अगली सुबह लाला जी अपने मुनीम को साथ लेकर बही खाता लेकर पहुंच गए थे। वहां जाकर देखा दो ढोल वाले दरवाज़े पर खड़े हैं , सोचा ज़रूर कोई ख़ुशी की खबर होगी। लाला जी ने दरवाज़ा खटखटाया तो उसने लाला जी को भीतर आने को कहा और बोला मैं आपका इंतज़ार ही कर रहा हूं। और ढोल वालों को कहा आप ढोल बजाते रहना जब तक मैं लाला जी का हिसाब चुकता नहीं कर लेता। बाहर ढोल का शोर था और अंदर लाला जी का हिसाब बराबर किया जा रहा था। अपने अपमान का बदला लाला जी की जमकर धुनाई कर के , लाला जी को समझ आया था हिसाब सभी का होता है। आखिर दरवाज़ा खुला और बाहर सब के सामने उसने पूछा लाला जी हिसाब बराबर हुआ या अभी भी बकाया है कुछ लेना है जो। लाला जी की बही खाता सब में हिसाब बराबर किया जा चुका था। 
                              आपको अभी नहीं समझ आया होगा आज ये सब क्यों बताया जा रहा है , कौन लाला कौन कर्ज़दार और कैसा हिसाब। आजकल कितना शोर है , रोज़ नई नई कहानी सुना रहे हैं इक अपराधी की , कितने राज़ खोल रहे हैं। इस शोर का अर्थ क्या है , किसी साहुकार का हिसाब किया जा रहा है। मीडिया वाले शोर मचा रहे हैं ताकि आपके सवाल खो जाएं उनके इस शोर में। इतने सालों तक क्या क्या अपराध होते रहे और सरकार नेता अधिकारी कानून के रखवाले और वो सभी जो इसी काम का वेतन लेते हैं कि देश में कहीं भी कुछ भी हो उनको निगाह रखनी है। बजट का बड़ा हिस्सा इसी काम पर खर्च किया जाता है ताकि देश में अराजकता नहीं कानून और न्याय का शासन हो। ये सब अनजान नहीं थे , ये सब उनसे छुपा हुआ नहीं था , ये सब अपने अपने मतलब को आंखे बंद कर किसी को अवसर देते रहे अपनी मनमानी करने का। आज खुद को बचाना है और उनको भी बचाना है जिनसे कीमत मिलती है तभी ये शोर है। ढोल बजाने वाले खुद भी गुनहगार हैं और जो इनसे ढोल बजवाते हैं वो भी। हिसाब कर रहे हैं या सब हिसाब किताब शोर के पीछे दबाना चाहते हैं। 
                                      आधा सच नहीं पूरा सच सामने आना चाहिए और सभी गुनहगार पकड़े जाने ज़रूरी हैं। नहीं तो वही खेल फिर से शुरू हो जायेगा कुछ अंतराल के बाद। ऐसा समझा जाता है इक दिन सब का हिसाब कोई करता है मरने के बाद , मगर अभी शायद इनको और शोर मचाना है।

Sunday, 3 September 2017

हम सभी लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 131 Part -2

          हम सभी लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बेईमान लोग। 
झूठ के सहारे 
सच को हराकर 
धनवान बन गए।
बड़े पदों को पा लिया 
छल कपट धोखा कर सब से
ऊंची पायदान पर  हैं
बैठे भगवान बनकर । 

ईमानदार लोग। 
रात दिन जूझते बेईमानी से
मात खाते  हर बार
पल पल मरते हुए जी कर 
खुश हैं इस बात से कि 
किसी तरह अपना  बसर
कर रहे हैं बिना किसी तरह से
कोई भी समझौता किये। 

नासमझ लोग। 
बेईमान लोगों की जय
बोलकर सोचते हैं वही हैं 
देश समाज के रखवाले।  
उन्हीं से चाहते हैं पाना 
सब कुछ अपने लिए जो 
कभी किसी को देते नहीं है 
कुछ भी वास्तव में। 

बदनाम लोग। 
कोई गुनाह नहीं किया
फिर भी सब को लगते हैं
मुजरिम हैं 
हर किसी को देते रहते हैं 
अपनी बेगुनाही के सबूत।
कोई नहीं करता तब भी यकीन 
सफाई देना , बिना किये अपराध 
बना देता है गुनहगार उनको। 

नाम वाले लोग। 
खुद ही अपनी कीमत 
बढ़ा चढ़ा कर बाज़ार में 
बेचते हैं अपने आप को रोज़।  
भीतर पीतल और बाहर है 
इक चमकती हुई सुनहरी परत 
सब खरीद रहे उन्हीं से सब 
वो भी जो नहीं रखा उनकी 
आलीशान सजी बड़ी बड़ी 
बाज़ार की दुकानों में।

Saturday, 2 September 2017

सब कुछ नया आप क्यों पुराने ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    सब कुछ नया आप क्यों पुराने ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

            हमने बहुत शासक देखे। उनको भी देखा जो कुछ भी नहीं बोले और आपको भी जो बहुत अधिक बोलते हैं बड़बोले हैं। झूठ बोलने में आपकी बराबरी कौन कर सकता है। हर दिन आपने अपनी बोली बात को ही बदल डाला। आपने बहुत लोगों को बदल डाला उनका काम देख कर। आपके काम को कौन देखे जो आपको भी बदल सकता। अभी तक आपका भी काम बढ़िया तो क्या संतोषजनक भी नहीं है , अच्छे दिन दूर दूर तक दिखाई नहीं देते , आपको भी हमेशा अपने दल की सरकार हर जगह होने से अधिक कुछ नहीं लगा है। अभी भी आपको देश की जनता की नहीं अगले चुनाव की चिंता है , शायद इस से अधिक विडंबना की कोई बात नहीं हो सकती कि देश के सब से बड़े पद पर पंहुचा व्यक्ति इसी को महत्व देता रहे कि कैसे वही उस जगह बना रहे। सत्ता का इतना अधिक मोह लोकतंत्र में अच्छा नहीं है। अभी इक उच्च न्यायलय को इस हद तक टिप्पणी करनी पड़ी कि आप देश के प्रधानमंत्री हैं या अपने दल के ही केवल। वास्तविकता और भी खराब है। दल भी कहां है आप और आपके मुट्ठी भर भरोसे के लोग ही सब कुछ हैं। शायद ही कोई उचित समझेगा कि देश का प्रधानमंत्री जनसभा संसद या लाल किले से संबोधन में कुछ भी ऐसी बात बोले जो सच नहीं हो। आपने खुद अपनी ही कही बातों को कितनी बार बदला है शायद ये इक मिसाल है , खुद अपनी बात को झूठ साबित करते रहे हैं। हर दिन नई घोषणा करना काफी नहीं उनका सफल होना ज़रूरी है। स्वच्छ भारत की दशा ये है कि राजधानी में कूड़े के पहाड़ के गिरने से लोग दबकर मर जाते हैं मगर आपको ये किसी और का काम लगता है , क्या दिल्ली उस भारत का हिस्सा नहीं जिसको स्वच्छ भारत करना है। सांसदों को अपना नेता नहीं चुनना है , अगले चुनाव में कौन सांसद होंगे उन पर नहीं आपकी मर्ज़ी है अगला प्रधानमंत्री भी आपको ही बनाया जाये। विधायक नहीं चुनते मुख्यमंत्री कौन हो आप चार लोग तय करते हैं , राष्ट्रपति तक आपकी मर्ज़ी से बनाया जाता है। परिवारवाद और जातिवाद को बुरा बताते थे आप और व्यक्तिवाद स्थापित करना चाहते हैं। आपने देश में आम नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं और अधिकार देने को क्या किया है , कुछ भी नहीं। देश की आधी आबादी को पीने का पानी साफ नहीं मिलता , शिक्षा की हालत भी बदहाल है , स्वास्थ्य सेवा की दशा बद से बदतर हुई है। बेतहाशा खर्च कर सरकार अपना झूठा गुणगान करती है क्योंकि वास्तविकता कुछ अलग ही है। हर योजना कागज़ों तक है , खुले में शौच के दावे की पोल खुलती है जब शौचालय बने हुए दिखाते हैं जहां पानी ही नहीं। स्कूल जिस देश में शौचालय में बच्चों की क्लास लगती हो का सच भी आपको विचलित नहीं करता है। आपने अपने दल के सांसदों को गांव गोद लेने को कहा मगर असलियत में खुद आपने जिस गांव को गोद लिया उसकी हालत नहीं मालूम। सचिन तेंदुलकर जी ने दो गांव लिए गोद मगर किया कुछ भी नहीं ये सब ने टीवी पर देखा। यही हालत सब जगह है। आपने देश की सरकार को संविधान और लोकतान्त्रिक ढंग से नहीं किसी कंपनी के सी ई ओ या मालिक की तरह चलाना चाहा है जिस के लिए अपने हित और सफलता ही मकसद होता है। लोकतान्त्रिक मर्यादाओं की अनदेखी कर और हर जगह अपराधियों से गठबंधन कर आप किस दिशा को जाना चाहते हैं। आपने नया बनाया कुछ भी नहीं क्योंकि आपका पूरा ध्यान पुराने को ध्वस्त करने पर है। विकास की बात करने से क्या होगा जब आप विकास के नाम पर विनाशक जैसे काम करने लगे हैं।  सब से अधिक दुर्भाग्य की बात ये है कि आपको खुद अपने इलावा किसी पर भी भरोसा नहीं है। आप पर भरोसा कैसे किया जाये हम नहीं जानते , आपकी हर बात खोखली साबित होती रही है।
                     आपको इक सार की बात कहना चाहता हूं। सब को बदलने की बात करना छोड़ खुद अपने आप को बदल लिया जाये तो दुनिया बदल सकती है। धर्म उपदेशक भी खुद को नहीं बदलते औरों को बदलने को उपदेश देते रहते हैं। नतीजा कुछ भी नहीं मिलता।  


कौन कौन है अपराधी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      कौन कौन है अपराधी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

               बस हर तरफ चर्चा है इक नाम की। क्या बस वही गुनहगार है। अपराधी और बहुत हैं। आपको गिनती करनी कठिन हो जाएगी। इक अख़बार के पत्रकार को पता था और उसने अपने छोटे से अख़बार में लिख भी दिया और उसका कत्ल भी हो गया। क्या तब की सरकार तब से अभी तक का प्रशासन सुरक्षा और न्याय व्यवस्था कायम रखने को नियुक्त लोग पुलिस और नेता ही नहीं वो सभी आम नागरिक जो ये सब देखते रहे जानते रहे और खामोश रहे अपना कर्तव्य देश और समाज के लिए नैतिकता और सच्चाई के लिए नहीं निभाते रहे वो भी शामिल नहीं इस सीमा तक हालत बढ़ने के लिए जो आज देश भर की पुलिस और सेना भी देश में किसी जगह जाने को इक बड़ी चुनौती समझती है। जो जो नेता जाकर उसको मिलकर वोटों की भीख मांगते रहे क्या उन्हें असलियत नहीं मालूम थी। क्या उनके लिए सत्ता पाना देश हित से अधिक महत्वपूर्ण है। आज वो सब खामोश हैं , कोई इक शब्द नहीं बोलता इस बात पर। दिखावे की देशभक्ति की ज़रूरत नहीं है वास्तविक देशभक्ति क्या है इसको समझना ज़रूरी है। आज जो टीवी चैनल नए नए कारनामे खोजने की बात करते हैं अभी तक क्या अंधे थे गूंगे थे बहरे थे। कल तक उसी की महिमा का गुणगान करते रहे आप भी और आज सच के झंडा बरदार बन गए , सच को मुनाफे का सामान समझते हैं। कितनो की बात की जाये कोई सीमा ही नहीं है। 
             कौन हैं जो खुद को धार्मिक समझते हैं। आपने खुद देखा ही नहीं अनुचित कामों को होते हुए बल्कि आप शामिल रहे किसी के अनुचित और अधर्म के कामों में , क्या यही शिक्षा हासिल की आपने धर्म की। आप खुद तो अधर्म की नगरी में अपनी ख़ुशी से रहते रहे औरों को भी विवश किया अधर्म की नगरी में आकर बसने को। धर्म के नाम पर आपने अधर्म का साथ दिया तो आपका अपराध और अधिक हो जाता है। शायद ये सभी धर्म को न मानते हैं न ही समझते हैं , इनका धर्म से कोई सरोकार नहीं है। इन सब का मकसद कुछ और ही रहा है। भगवान से तो इनको कोई डर लगता ही नहीं है वर्ना अधर्म की राह पर चलने से बचते। आज इक गुनहगार पकड़ा गया मगर कितने गुनहगार अभी आज़ाद हैं और उनको कोई सज़ा नहीं होगी केवल इतनी सी बात नहीं है। इस से खराब बात ये होगी कि उनको अपने किये अपराधों का कभी पछतावा तो क्या एहसास भी नहीं होगा। ये समझते ही नहीं हैं इन्होंने कितना अक्षम्य अपराध किया है। 
               इक पुरानी कहानी है , इक चोर को अदालत में सज़ा हुई तो उसने अपनी माता को पास बुलाया और उसे कान में कुछ कहने की बात की और जब कान पास आया तो उसने कान को काट खाया। ऐसा क्यों किया पूछने पर उसने कहा जब पहली बार मैंने चोरी की थी माता को पता चला मगर उसने मुझे बचाया था डांटती फटकारती सज़ा देती तो शायद मैं सुधर जाता। मेरे अपराध सुन कर भी खामोश रही अपने स्वार्थ की खातिर और अपना फ़र्ज़ नहीं निभाया संतान को सही राह दिखाने का। ये मेरे अपराधी बनने की महत्वपूर्ण कारण है। आज ये कहानी दोहरानी होगी और बहुत गुनहगार सज़ा के हकदार हैं समझना होगा।

Friday, 1 September 2017

खुल गये सभी राज़ ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया

         खुल गये सभी राज़  ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया। 

                  बस एक बात में पूरी कहानी समझा दी , मैंने कभी नहीं पढ़ा तुम्हें क्योंकि मैं नहीं चाहता था तुम्हारी आलोचना करना। उनकी दोस्ती की परिभाषा यही है शायद दोस्त को कभी सही बात बोलकर नाराज़ नहीं करना। मेरी समझ अलग है कि सच्चा दोस्त वही जो आपको खरी बात बोले। आलोचक हैं तो ज़रूरी नहीं आप सब की कमियां ही बताएं , समालोचना भी की जा सकती है। क्या क्या अच्छा है और क्या अगर नहीं होता तो अच्छा होता की तरह सार्थक ढंग भी मुमकिन है। सोचा ही नहीं था पढ़ने से पहले ही कोई तय कर सकता है कि नहीं पढ़ना अच्छा है , पढ़ लिया तो कमियां ही मिलनी हैं। अच्छा किया , जब पहले से पूर्वाग्रहग्रस्त होकर किसी बात को परखोगे तब पढ़ने की ज़रूरत ही क्या थी। इस तरह दोस्त ने मेरे लेखन को बिना देखे बिना पढ़े ही खराब नहीं कहने की बात कहकर खराब बता दिया। अफ़सोस यही कि पढ़कर बताते कि बेकार है तो शायद कुछ सुधार ही कर लेता। मैंने कभी खुद को भला आदमी नहीं समझा , जनता हूं बहुत सारी कमियां हैं मुझ में खूबी कोई नहीं। फिर भी ये गलत लगता है कि कोई मुझे जाने समझे बिना ही निर्णय कर दे कि ये बुरा आदमी है।
                                   आजकल टीवी के खबरी चैनल बहुत चिल्ला चिल्ला कर बहस कर रहे हैं , खुल गए हैं किसी के कितने ही राज़। जबकि ये राज़ कभी राज़ थे ही नहीं , सब को पता था मगर कोई किसी को बताता नहीं था। इक बार फिर से खबर क्या है ये समझते हैं। परिभाषा साफ है हमेशा से ही कि खबर वो सूचना है जो कोई छुपा कर रखना चाहता है , आम लोगों को पता नहीं चलने देना चाहता। अख़बार समाचार चैनल के पत्रकार को उसको खोजना है और सब को बताना है। आप उस बात को दिन भर खबर बताते हैं जो अब किसी से छुपी हुई नहीं है , जिसका चर्चा हर तरफ है। आपको तो शर्मिन्दा होना चाहिए कि ये सब क्यों नहीं पहले पता लगाया और बताया। या फिर आपको मालूम था मगर बताने का साहस नहीं किया या नहीं बताने की कीमत लेते रहे। सब देख कर आंखें बंद रखने वाले देश के प्रधानमंत्री रहे हैं जिन पर कोई आरोप नहीं लगा जबकि उनकी सरकार घोटालों की सरकार थी इतिहास यही बताएगा। बहुत अधिकारी सब गलत होता देख चुप रहते हैं , अपना कर्तव्य नहीं निभाते , मगर उनको निर्दोष नहीं बताया जा सकता। अभी तक देश में यही हुआ है , जो भी करना चाहिए था किया नहीं। किसी शायर का शेर है :-

                 वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,

                 तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं। 

             आज भी सरकार यही करती है देश में भी और हर राज्य में भी। कोई कुछ भी करता रहे आप ने कुछ नहीं किया रोकने को , आपने सभी ने , नेताओं ने आधिकारियों ने , पुलिस प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों ने अपना फ़र्ज़ नहीं निभाया और अपराधी को संरक्षण देते रहे। खबर वालों को खबर थी नहीं अथवा खबर से बेखबर बने रहे , राज़ की बात नहीं है। दान का चर्चा घर घर पहुंचे लूट की दौलत छुपी रहे , क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फितरत छुपी रहे , नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी रहे। राज़ अभी भी नहीं खुला कि सब शामिल थे गुनाह में , केवल गुनाह करने वाला ही नहीं , वो भी जो गुनाह होने देते रहे , वो भी जो देख कर अनदेखा करते रहे। अपने आप को सब शरीफ बताते हैं शराफत की यही नई परिभाषा है। शरीफ लोग घर में छुपकर दरीचों से तमाशा देखते हैं बाहर निकलने की गल्ती नहीं करते। जान है तो जहान है।