Wednesday, 26 July 2017

ख़ूबसूरती की बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       ख़ूबसूरती की बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   सब से पहले सुंदरता की परिभाषा नहीं होती मायने समझ लेना ज़रूरी है। आपको रिमझिम रिमझिम बरसात अच्छी लगती है मगर अभी कल टीवी वाले ही नहीं देश के प्रधानमंत्री जी भी बरसात का तांडव शब्द बोल रहे थे। इंद्रदेवता को नृत्य नहीं भी आता हो मुमकिन है तांडव नृत्य पर शिव जी का कॉपी राइट है। बिना सोचे समझे हम शब्दों का उपयोग करते हैं , बाढ़ आना देवी देवता का कोप नहीं खुद हमारी गलतियों से है। मगर विषय और है , सुंदरता ख़ूबसूरती की बात। आपको हरियाली अच्छी लगती है फूल अच्छे लगते हैं पेड़ पौधे पहाड़ ही नहीं नदियां समंदर क्या रेगिस्तान तक में कशिश दिखाई देती है। वास्तव में जो दृश्य हमारी आंखों को पसंद आते वो हमें सुंदर लगते हैं। सभी फूल खूबसूरत होते हैं फिर भी लोग गेंदे के फूल की कोमलता से अधिक कांटों वाले गुलाब को देख ख़ुशी अनुभव करते हैं। मुझे तो लगता है प्यार को गुलाब से जोड़ने के पीछे ये भी मकसद होगा कि संभल कर इस में कांटे भी छुपे हैं। परिभाषा को छोड़ अब सीधा विषय की बात करते हैं। 
        जब भी सुंदरता की बात की जाती है तो अधिकतर महिलाओं की ही बात होती है। और बेशक किताबों में नारी की सुंदरता का वर्णन करते हर औरत सुंदरता और त्याग की मूरत होती है बताया गया है तब भी हमने या फिर सुंदरता के बाज़ार ने कुछ मापदंड बना दिए हैं। सालों तक इक साबुन फ़िल्मी नायिकाओं की सुंदरता की बात कह कर बिकता आया है और कुछ पॉवडर क्रीम भी। रंग गोरा होना भी ज़रूरी है ये किसी नासमझ की फैलाई बात है , मजनू को लैला खूबसूरत लगती थी किसी ने कहा तेरी लैला तो काली है , मजनू का जवाब था तेरी आंख नहीं है देखने वाली। अर्थात सुंदरता देखने वाले की नज़र में होती है। हर मां को अपनी संतान दुनिया की सब से सुंदर लगती है क्योंकि नज़र किसी और की नहीं मां की होती है। 
       महिलाएं क्षमा करें मेरे मन में उनके लिए आदर बहुत है मगर समाज की वास्तविकता लिखना मेरा धर्म है। अक्सर जब भी महिअलों के साथ कदाचार की बात होती है कुछ लोग पहनावे पर इल्ज़ाम लगाया करते हैं , मेरा मकसद यहां वो कदापि नहीं है। किसी महिला ने क्या पहना है उस से आपकी सोच गंदी नहीं हो जाती और जिनकी सोच खराब है उनको गलत आचरण करने को महिला की वेशभूषा की ज़रूरत नहीं होती। मैंने बहुत महिलाओं से और पुरुषों से इस विषय पर खुलकर बात की बहुत समय लगाकर। आपको कौन किस तरह किस कारण भाता है या भाती है और क्या क्या आपको प्रभावित करता है। विश्लेषण कुछ इस तरह है। आकर्षक होना और उत्तेजित करना दो अलग बातें हैं। साड़ी में अधिकतर महिलाएं अच्छी लगती हैं अगर साड़ी सलीके से पहनी हो , सूट भी अपनी उम्र और शारीरिक बनावट को ध्यान में रखकर पहना हुआ अच्छा लगता है। मगर हर नए फैशन को अपनाना सही नहीं है। कपड़े शरीर ढकने को पहनते हैं जब आपका पहनावा ऐसा हो जो आपके बदन को ढकता नहीं दिखलाता हो तब उस पहनावे को अपनी पसंद बता सकते हैं मगर देखने वालों को क्या लगता है आप उसे नहीं बदल सकते। इधर अधिकतर इस तरह का पहनावा अपना चुके हैं भेड़चाल की तरह। वास्तव में आपको क्या पहनना क्या नहीं इस बारे कहते आये हैं कि खाओ मन पसंद और पहनों जग पसंद। मतलब जो आपको अच्छा लगता वही खाओ मगर पहनावा वही ठीक जो देखने वालों को अच्छा लगे। 
                        बात केवल पहनावे की नहीं है , आप सुंदर लगते हैं ये बहुत और बातों पर भी निर्भर करता है। मेरी आदत है हर फोटो को ध्यान से देखता हूं और महसूस करता हूं इस फोटो लेते समय चेहरे पर भाव क्या हैं। बहुत कुछ समझ आता है। मुझे अपनी मां शायद सब से सुंदर लगती थीं क्योंकि उनका चेहरा ही नहीं मन भी बहुत निर्मल था। उन जैसी महिलाएं शायद दो चार ही मुझे मिलीं। बात मेरी माता जी की इसलिए नहीं की क्योंकि मेरी मां थीं बल्कि क्योंकि आज भी उनको जानने वाले सब उनकी सरलता मासूमियत और भोलेपन के साथ मधुर व्यवहार और हमेशा इक मुस्कान रहना चेहरे पर को याद करते हैं। कभी किसी बेटे बेटी बहू दामाद या बच्चों तक से कठोर बात की हो किसी ने नहीं देखा। हर किसी से अपनेपन से मिलना और किसी के लिए मन में बैर भाव नहीं रखना , यहां तक की किसी से कोई गिला शिकवा भी करतीं तब भी हंसती हुई। आपका बात चीत का ढंग और सौम्यता ही असली सुंदरता है जो कभी ढलती नहीं है। आपको बूढ़े लोग भी देखने पर प्रभावित करते हैं अपने आचरण से। मोटापा या शरीर का शेप का रंग का होना असली खूबसूरती नहीं होता। पल भर की चमक और हमेशा की आभा में ज़मीन आसमान का अंतर होता है। चर्चा को बातें बहुत हैं मगर संक्षेप में इतना बहुत है।

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