Saturday, 3 June 2017

हमारी मांगे पूरी करो ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया ( कविता ) - भाग तीन हास्य व्यंग्य

            हमारी मांगे पूरी करो ( हास - परिहास )

                        डॉ लोक सेतिया ( कविता ) 

सब एक साथ नारे लगाते
हाथों में बैनर उठाये
सरकार के विरोध में
चल रहे थे आला अधिकारी
को मिल कर अपना विरोध
जताने को देने को इक विरोध पत्र।
अधिकारी से पहले से ही समय लेकर
आपस में खुल कर चर्चा की थी
नहीं बनाने देना ऐसा नया कोई कानून
जो अंकुश लगाए हमारे काम
जब जैसे मर्ज़ी हमेशा की तरह
निर्बाध रूप से करने पर रोक लगाए।
देख कर उनको लगता था जैसे
आंदोलन करने नहीं कोई जंग लड़ने को
सीना ताने चल रहे हैं सब के सब
आर-पार की लड़ाई लड़ने को।
लगता था आज उस अधिकारी की
खैर नहीं जिसको मिलने जा रहे
संगठन बनाकर सभी एक साथ
मगर जब सचिवालय पहुंचे तब
आला अधिकारी के सचिव ने
दफ्तर से बाहर आकर बताया था
साहब कब से आप का इंतज़ार कर रहे
आपको हमेशा की तरह समर्थन देने को
आप में पांच सात लोग भीतर जाकर
विरोध पत्र दे सकते हैं।
संगठन के ओहदेदार चले गए भीतर
और बाकी सब बाहर बैठ जलपान करने लगे
बाहर जो नारे लगा रहे थे अंदर जाकर
दोनों हाथ जोड़ कर आदर सहित
प्रणाम की मुद्रा में खड़े थे अधिकारी के सामने।

स्वागत है आप सभी बंधुओं का आज यहां
बताएं अब क्या परेशानी है आपको
आपकी सहायता करना हमारे लिए
सरकार के लिए भी ख़ुशी की बात होगी।
विरोध पत्र दिया गया पढ़ लिया साहब ने
पूछा कहें आपको किस बात की चिंता है
संगठन के प्रमुख ने समझाया सरकार
ठीक से पढ़ समझ लो तब करो विचार
हम सभ्य नागरिकों पर इतना अत्याचार।

आपके नियम कानून तो बंद कर देंगे
हमारा निर्भय होकर करते रहना कारोबार।
हंस दिए अधिकारी सुन उनकी बात को
बोलो आप लोग किस दुनिया में रहते यार
अभी तलक आपने किस किस नियम का नहीं तोडा
सब देख कर भी आंखें बंद रखती रही है सरकार।

कब किया किसी नियम का सच में पालन आपने
अनधिकृत ढंग से घर दुकान भवन निर्माण क्या
नहीं किया हमेशा सभी आपने जब मर्ज़ी जैसे
हद से हद कभी कभी कहने को नोटिस मिला
शायद मज़बूरी में आपने कोई कर दिया जुर्माना भरा।
आप को सब पता है धनवान हर कानून को रखता है
अपनी पतलून की जेब में खरीद कर निडर होकर
आपको पहले कभी अनधिकृत काम करते नहीं लगा डर
अब क्यों बेकार शोर मचा खुद को करते बेनकाब
जो नहीं जानते थे आपके किये कर्म कितने गलत
आपने खुद मचाया शोर हो गई सभी को खबर।
अब अगर नहीं बनाया गया जनता की भलाई को
ज़रूरी ऐसा कानून तब होगी हाहाकार  बिक गई सरकार।
आप बताओ कितने कानून बनाये हैं हर तरह के
दहेज बंद हुआ क्या  क्या रुकी बाल मज़दूरी
स्वच्छ भारत दिखा कहीं , हुई बंद रिश्वतखोरी
अपने देश में कानून बनते ही नहीं पालन करने को
हमने प्रदूषण वाहन के सभी नियम बनाये हैं
तोड़ने को जुर्माना भरने को छूट जाने को।
बन जाने दो ये नया कानून भी सरकार का
सब बाकी नियमों की तरह साबित होगा बेकार सा।
सब संतुष्ट होकर धन्यवाद देते निकले बाहर
आकर बाहरी जमा सदस्यों को सब समझाया
चले एक दिन मौज मस्ती की साथ बंद कर धंधे को
अब मत सोचो हमने क्या खोया और क्या पाया।

आप जिस को समझ रहे कोई भूत है नज़र आता
असल में वो नहीं था कोई  था हमारा साया
गलती हमारी सूरत की नहीं कोई भी चाहे शक्ल जो
अपराध उस का जिस ने आईना लाकर हमें दिखाया।

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