Thursday, 1 June 2017

भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                       इतना तो सभी पहले से ही जानते हैं कि देश को भ्रष्टाचार से निजात दिलाना ज़रूरी है। सामने भाषण में खुद को सेवक बताने वाले सब नेता और अधिकारी ऑफ द रिकॉर्ड ही सही मान लेते हैं कि हम सब जो कर रहे वह और जो भी हो देशभक्ति कदापि नहीं है। मगर उनकी मज़बूरी है देश की जनता के धन को लूटना और अपने घर भरना साथ अपने ख़ास लोगों को कोई ओहदा कोई साधन उपलब्ध कराना ताकि सरकारी गोदाम में कोई छेद उनको भी मिले पेट भरने को। आज तक हर सत्ताधारी नेता और हर अधिकारी यही कहता है वही इस कोड़ को मिटा सकता है , मगर वक़्त आने पर बेबस हो जाता है। आदत है कि जाती ही नहीं , हर शराबी की समस्या है छूटती ही नहीं मुंह को लगी हुई। जानवर तक जब आदमी का लहू चख लेते हैं तो उसका स्वाद उनको आदमखोर बना देता है। राजनीति आदमखोर बन चुकी है , सत्ता को गरीबों का लहू मुंह को लगा हुआ है , अब रहा नहीं जाता। आप चिंता नहीं करें कभी न कभी हर मर्ज़ की दवा मिल जाती है। मेरे पास इक नुस्खा है जो लिख कर देश की सरकार को भेजा है , सुना है ये नया प्रधानमंत्री जो अब उतना नया भी नहीं है , नई नई योजना रोज़ लागू करता है। देश को घोटालों और दलाली रिश्वतखोरी के मुक्त करवाने की फूलप्रूफ योजना बना भेज दी है , मुझे उस के लागू होने की पूरी उम्मीद है। संभावना को तलाश किया जाना ही नया कुछ करना होता है। ख़ास बात ये भी है इस में जनता तो खुश हो ही जाएगी साथ में उनका भी कल्याण होगा जो अपनी उचित आमदनी से गुज़र बसर कर पाने में कठिनाई महसूस करते हैं। 
            बस इक भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान किया जाना होगा , रिश्वत की पुरानी परंपरा है। सैंकड़ों साल का इतिहास है , कभी इसे ईनाम नाम दिया जाता था और जनता अपना काम करा सरकारी कर्मचारी को आना दो आना बक्शीश दिया करते थे। कहते थे ये लो इस से मिठाई खा लेना , मिठाई शब्द सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है और इसका ध्यान कहां रहता है कि आपका कोई स्वाभिमान है , वेतन मिलता है अच्छा फिर भिखारी क्यों बनें। शुरू में एक प्याली चाय और बीड़ी से ईमान खरीद लेते थे लोग , और पाने वाला देने वाले को सलाम किया करता था , बदलते बदलते रिश्वत का सवरूप बदला और मंत्री अधिकारी और सरकारी बाबू भीख मांग कर नहीं अपना अधिकार समझ छीन के लेने लगे। अपने धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि जिन के पास सब कुछ हो तब भी और अधिक हासिल करने की लालसा या हवस रहती है वही सब से दरिद्र होते हैं। आप इनको भिखारी ही समझना जिनकी आमदनी है तब भी बिना रिश्वत गुज़र बसर नहीं होती। देश के बड़े बड़े अदाकार खिलाड़ी नामी लोग साधु संत भगवा वेशधारी भी दरिद्र ही हैं , सेठ साहूकार उद्योगपति तो भूखे होते ही हैं दौलत के। ऐसे सभी भिखारियों की भूख कभी खत्म नहीं होती। जब मुफ्त की हराम की आसान ढंग से कमाई की आदत पड़ गई तो उनका खुद पर इख़्तियार बाकी नहीं रहता। 
              देश में कानून बदलते रहते हैं , इक और सही। भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान किया जाना चाहिए। नेताओं और अधिकारीयों को अधिकृत सरकारी भिखारी घोषित कर बड़ी आसानी से देश को भर्ष्टाचार मुक्त किया जा सकता है। हर मंत्रालय के बाहर हर अधिकारी के दफ्तर के दरवाज़े के पास भीख के कटोरे की तरह इक दान पेटी रखी जानी चाहिए। जनता को अपनी स्वेच्छा से देश हित में भीख देनी चाहिए , अगर ऐसा नहीं किया तो आपको देश विरोधी समझा जायेगा। लोग भीख यूं भी बढ़ चढ़ कर देते हैं। घूसखोरी किसी आपदा से कम नहीं है और आपदाग्रस्त लोगों की सहायता सभी करना चाहते हैं। सत्ता में अकाल रहता है हमेशा ज़मीर नाम की मौत होने से। नेता अफ्सर घबराएं नहीं उनको कमी नहीं होगी , अपने देश में रिवायत है खेत से इक गन्ना तोड़ने नहीं देते मगर गुड़ की भेली खुद ही दे देते हैं। दान देने ईनाम देने में अपनी बराबरी कोई नहीं कर सकता। यहां तक कि सरकारें भी जनता की समस्यायों में धन की कमी की बात कहने के बावजूद , दानवीर कहलाने को कितने आडंबर करती हैं। मगर अगर फिर भी आपको लगता है लोग दानपेटी में भिक्षा नहीं डालेंगे तब आप पेट्रोल अदि पर जैसे कई कर लगे हैं उसी तरह हर जगह भिक्षा सरचार्ज लगा सकती है। और इस से आया धन सभी अमला बांट सकता है , माना ये रिश्वत को कानूनी रूप देना होगा फिर भी विश्व में भ्रष्ट देशों में अपने स्थान की बदनामी तो नहीं होगी। भिक्षा देना तो पुण्य का काम है , सब मानते हैं।

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