Saturday, 22 April 2017

झूठ सब का दीन-धर्म है ( आज का समाज ) डॉ लोक सेतिया

अख़बार में इश्तिहार मिला जिस में दावा किया गया है श्री श्री आयुर्वेदा द्वारा नाड़ी परीक्षण और आयुर्वेद चिकित्सा "आर्ट ऑफ लिविंग " बैंगलोर आश्रम से प्रशिक्षित अमुक आयुर्वेदिक चिकत्स्क बिना किसी जांच मात्र दो मिंट में हर रोग का निदान और उपचार इक दवा की दुकान पर आकर करेंगे। इक विज्ञापन टीवी पर आता है बाबा रामदेव का फोटो दिखाते जिस में करोड़ों लोगों पर सफल प्रयोग करने और तमाम देसी जड़ी बूटियों को खोजने की बात की जाती है। बहुत महान कार्य कर रहे हैं ये सौंदर्य प्रसाधन बनाकर महिलाओं को खूबसूरत बनाने में सहयोग कर के। क्योंकि असली रोग तो सब पहले ही योग और दो घूंट पीने से ठीक हो गये हैं। रोज़ नया शोर सरकार का सुनाई देता है , स्वच्छता अभियान तीन साल में वास्तविकता तो कहीं नहीं दिखाई देती। और भ्र्ष्टाचार आज भी कोई सरकारी काम बिना सिफारिश या रिश्वत होता नहीं , कोई अधिकारी आज भी आम नागरिक की परेशानी समझता ही नहीं , आज भी अफ्सर चाटुकारिता कर तरक्की पाते हैं। हर विभाग और अधिक धन जनता से वसूल करने में लगा हुआ है। देश में आम जनता आज भी त्रस्त है बदहाल है और शासक जनता के खून पसीने की कमाई अपने ऐशो-आराम पर खर्च कर गर्व महसूस करते हैं। आम लोग हमेशा की तरह चढ़ते सूरज को प्रणाम करते हैं , बिना समझे कि वास्तव में उसने सत्ता पाकर किया क्या है। क्या देश की जनता की हालत सुधरी है , कोई सवाल नहीं करता , कोई सोचता तक नहीं। सब को अपने अपने अनुचित कार्य उचित लगते हैं , सब की कथनी और है करनी कुछ और। नियम कानून सही गलत और नैतिक अनैतिक की परवाह किसी को नहीं है। अपने आप को कोई नहीं देखता कि मैं जो कर रहा वो मेरा कर्तव्य है अधिकार है अथवा केवल स्वार्थ है। धर्म वाले उपदेश कुछ देते हैं खुद कुछ करते हैं। शिक्षा को भी लूट का धंधा बना लिया है और ज्ञान नहीं देते शिक्षा को बेचते हैं। बड़े बड़े अस्पताल स्वास्थ्य सेवा नहीं किसी भी तरह अधिक से अधिक धन कमाने में रोगियों का शोषण करते हैं अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हैं। हज़ारों रूपये के टेस्ट कमीशन की खातिर , बिना ज़रूरत दवायें लिखना , जो कभी नीम हकीम किया करते थे आज उच्च चिकिस्या की शिक्षा हासिल किये लोग उस से बढ़कर आपराधिक ढंग से उपचार के नाम पर करते हैं। लोग हर सरकार की तरह आज की सरकार की कमियों को नाकामियों को अनदेखा कर उस के प्रचार को सच समझ मानते हैं सब ठीक होने वाला है। नहीं हो रहा ये कहने का साहस कोई आम नागरिक क्या तथाकथित समाज का दर्पण कहलाने वाला मीडिया और साहित्य भी नहीं कर रहा। सब को अपने अपने हित की चिंता है , जब खुद ईमानदार नहीं हैं अपने स्वार्थ में डूबे हुए हैं तब दूसरे की कमी देख भी कैसे सकते हैं। हर तरफ हर कोई खुद को मसीहा साबित करने को व्याकुल है , मगर किसी की भलाई कोई नहीं करना चाहता। सब अपने पापों को पुण्य कहलाना चाहते हैं। झूठ आज का धर्म है आदर्श है ईमान है। झूठ की जयजयकार करना सभी की आदत बन चुकी है। सच की पहचान किसी को नहीं है , सच घायल हुआ कराहता रहता है , उसकी पुकार किसी को सुनाई नहीं देती है।

Thursday, 20 April 2017

अहंकार की लाल बत्ती ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

मुझे माता पिता ने दिया क्या था , ये तो मेरी समझदारी और मेहनत है जो आज मेरे पास सब कुछ है। आप को अजीब लगेगा मगर ऐसा सोचने वाले लोग बहुत हैं। उनको मालूम ही नहीं होता कि किन हालात में माता पिता ने उनकी परवरिश कैसे की। शायद उनकी छिपी मेहनत का फल है जो खुद उनको नहीं मिला आपको मिला है। पेड़ लगाने वाला खुद फल नहीं खाता कभी उसके फल कोई और खाता है। आज जो लोग शोर मचाते हैं केवल हम ही सब अच्छा करते हैं और अभी तक बाकी सब सिर्फ बुरा ही करते आये हैं उनको बताना होगा कि आज आप जिस जगह हैं शायद होते ही नहीं अगर आपसे पहले वालों ने ऐसा अवसर सब को मिल सके वो सब नहीं किया होता। किसी नेता या दल की सरकार अगर ये मानती है कि वही सब को सभी कुछ दे रही है तो इसको उनका अहंकार कहना होगा। क्योंकि कोई दल कोई नेता अपनी जेब से या अपनी जायदाद बेच कर जनता को कुछ नहीं देता है , बल्कि देश की जनता के धन पर शाही ढंग से रहता है। शासन करना देश सेवा नहीं होता , देश और जनता की सेवा तब होती जब आप सफेद हाथी की तरह देश के खज़ाने पर बोझ नहीं होते। इसलिए आप जैसी भी राजनीति करें ये दावा नहीं करें कि आप कोई त्याग जैसा महान कार्य करते हैं। पिछली सरकारों ने जो किया जनता जानती है , आप को उनके किये पापों का ही नहीं अपने कर्मों का भी हिसाब देखना है। अभी निर्णय किया गया लाल बत्ती हटाने का जो सही है मगर ऐसा करना ही काफी नहीं है। वास्तविक काम सत्ता की राजनीति नेताओं और प्रशासन की सोच और तौर तरीके बदलने का है। आप ख़ास क्यों हैं जब देश का संविधान सब को बराबरी का हक देता है। और लोकतंत्र का पहला नियम है कोई आपका विरोध कर सकता है , और सत्ता में होते उनके विरोध करने के अधिकार की रक्षा करना आपका फ़र्ज़ है। ऐसा शायद पहली बार आजकल दिखाई दिया है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सभा में जाने वालों की वेशभूषा पर ऐतराज़ किया जाये और काली कमीज़ काली स्वेटर क्या रुमाल और जुराब तक उतरवा दी जाये। पूरा बहुमत फिर भी इतना डर। केवल सड़क पर ही नहीं आपके वाहन पर लाल बत्ती होती है , आप दफ्तर में या जहां कहीं भी हैं आपको खुद को आम नागरिक से अधिक महत्व अपना नहीं समझना चाहिए। ये बात नेताओं अधिकारीयों पर ही नहीं और सब पर भी लागू होती है।
        मैं सब से बड़ा जानकर ज्ञानी , मैं सब से बड़ा गुरु , मैं सब से धनवान , मैं सब से बड़ा दानवीर , मैं सब से पवित्र आत्मा , मैं सब से अधिक देशभक्त और ईमानदार , बड़ा संत साधु सन्यासी , सब से काबिल डॉक्टर वकील या न्यायधीश आदि आदि। मैं मैं मैं। मैं आम आदमी हूं लिखने वाले तक की मानसिकता खुद को सब से ख़ास बताने की नज़र आती है। पत्रकार होना क्या है , आप का ख़ास दर्जा है , आपको सब ख़ास समझें यही चाहते हैं। प्रैस शब्द अपने वाहन पर लिखवाना किसी लाल बत्ती लगवाने जैसा ही है। इसी तरह लोग अपनी कार पर दल का प्रधान या कोई ओहदा लिखवा या सत्ताधारी दल का चिन्ह या झंडा लगा चाहते हैं उनको पुलिस या अन्य लोग विशेष समझें। वास्तव में ऐसा करने वाले लोग भीतर से खोखले होते हैं , जैसे किसी की खुद की कोई काबलियत या पहचान नहीं होती। हर किसी को बताता है मैं उसका बेटा या क्या क्या हूं। अहंकार बड़े होने की नहीं छोटे होने की निशानी है। असली महान लोगों को किसी तमगे लगाने की ज़रूरत होती ही नहीं है।

Wednesday, 19 April 2017

की उसने मेरे कत्ल के बाद कत्ल से तौबा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

पच्चीस साल बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने माना उन्होंने आपराधिक षड्यंत्र किया था। सत्तर साल उनको समझ आया लाल बत्ती कल्चर सही नहीं है। जो उनको चुनते वो लोग आम और विधायक सांसद मंत्री ख़ास भला क्यों हो सकते हैं। तो अभी तक आप अनुचित करते आये और आज अनुचित करना छोड़ रहे क्या इसको महान कार्य कहोगे। सवाल इतना भर नहीं है , सवाल ये है क्या भविष्य में आप खुद को वी आई पी और ख़ास समझना छोड़ दोगे। मगर इंसाफ की इक अदालत और भी है जहां कोई वकील आपको बचा नहीं सकता है। उस ऊपर वाली अदालत में फैसला देरी से नहीं होता , न ही ऐसा देखा जाता है कि आप अभी किसी संवैधानिक पद पर हैं इसलिए आप पर मुकदमा चल नहीं सकता। हैरानी की बात नहीं है क्या , कोई षड्यंत्रकारी किसी राज्य का राज्यपाल है।  नैतिकता की बात कौन करता है। जब ऊपरी अदालत में फैसला होगा तब भगवान राम भी सवाल करेंगे आपने मेरे नाम पर देश और संविधान की मर्यादा से खिलवाड़ किया और खुद को मेरे भक्त बताते हो। अपनी स्वार्थों की राजनीति में मुझे अपना मोहरा बना दिया किस से पूछ कर। कब किस को मैंने कहा था मेरे लिये कोई मंदिर बनाओ , राम राज्य का अर्थ सब को न्याय और जीने के अधिकार होता है न कि मंदिर बनाना। मुझे महलों से कभी प्यार नहीं रहा इतना तो जानते हो और मैं सत्ता का लालची भी नहीं सब को पता है। ये कैसी अजीब विडंबना है आप अनुचित करना छोड़ते हो या छोड़ने की बात करते हो तब भी ये स्वीकार नहीं करते कि अभी तक आपने जो किया वो गलत किया।
           उस ऊपरी अदालत में सब से हर बात का हिसाब मांगा जायेगा। आप तो डॉक्टर थे आपने अपना कर्तव्य निभाया रोगियों की सहायता करने का या किसी भी तरीके लूट खसूट से धन ऐंठते रहे। आप जो दवा बेचते थे ज़हर बांटते रहे जानबूझकर। और न्यायधीश जी आपको उम्र लग गई इतना तय करने में कि उन्होंने कोई धर्म का कार्य नहीं षड्यंत्र रचा। अभी भी भगवा भेस धारण किये कोई दावा करता है जो किया खुल्ल्म खुल्ला किया सब के सामने। भगवान से छुपकर कोई कुछ नहीं कर सकता , उसको जवाब देना जो किया तेरे नाम पर किया , गुनहगार तुम और कीचड़ के छींटे भगवान के सर पर।
            एक दिन की बात चली है किसी ने एक दिन का अवकाश रखने का सुझाव दिया है , एक दिन उनको भी राजपाठ को छोड़ चिंतन करना चाहिए आपको सत्ता मिली किस उदेश्य के लिए थी और आपने उसे किस स्वार्थ की खातिर उपयोग किया है। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है , न हाथी है न घोड़ा है वहां पैदल ही जाना है। लाल बत्ती वहां काम नहीं आती न कोई पद किसी का कवच बनता है उसकी अदालत में।

हम होंगे कामयाब एक दिन ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

हम होंगे कामयाब , हम होंगे कामयाब , हम होंगे कामयाब , एक दिन।
कितना अच्छा लगता है , एक दिन सब अच्छा ही अच्छा होगा , जाने कब।
बस एक दिन सप्ताह में पेट्रोल पंप बंद रखो ईंधन की बचत होगी। बात मन की है। सलाह हो या सुझाव या फिर आदेश अथवा कानून सरकार का सर माथे। मालूम नहीं दिल्ली में ऑड इवन नंबर से नतीजा क्या निकला , फरमान था अमल किया सब ने। चलो इसे भी कर देखते हैं , एक दिन की ही तो बात है। हम मंगलवार शाकाहारी हो जाने वाले लोग हैं , एक दिन उपवास भी रख लिया करते हैं। ये दूसरी बात है कि इसी देश में करोड़ों लोग हर दिन भी इक समय उपवास करते हैं फिर भी प्रभु उनकी नहीं सुनता। मगर एक दिन और भी बहुत कुछ नहीं करने का सुझाव अपन आम लोग भी दे सकते हैं।
        हर रविवार को कोई नेता भाषण नहीं दे , कोई रैली रोड शो प्रदर्शन नहीं किया जाये। ध्वनि प्रदूषण से लेकर साम्प्रदायिकता का ज़हर तक घट सकता है , शांति रह सकती है देश भर में और बचत की बचत भी।
       हर रविवार अगर टीवी पर सरकारी विज्ञापन नहीं दिखलाये जायें न ही अख़बार में छपें तो जनता के धन का कितने करोड़ रूपये का फज़ूल खर्च कम हो जायेगा। मीडिया वाले भी भूखे नहीं मर जायेंगे।
    और अगर मीडिया वाले भी सप्ताह में एक दिन रविवार को केवल वास्तविक सच्ची खबरें ही दिखायें , कोई तमाशा नहीं , फालतू की बहस नहीं , खुद अपने आप का गुणगान नहीं। मगर पहले खबर किसे कहते हैं उस परिभाषा को तो पढ़ लें। वो सूचना जो कोई लोगों तक पहुंचने नहीं देना चाहता पत्रकार का कर्तव्य है उसका पता लगाना और उसको सार्वजनिक करना। जिस का खुद कोई शोर मचा रहा है उसको खबर नहीं कहते। फायदा होगा , सच सप्ताह में एक दिन खुल कर सांस ले पायेगा।
     पुलिस वाले , प्रशासन वाले , नेता लोग , वी आई पी समझे जाने वाले या कहलाने वाले , बड़े बड़े अभिनेता , खिलाड़ी , धनवान उद्योगपति , धर्म गुरु उपदेशक , सब को सादगी की बात समझाने वाले ,सप्ताह में एक दिन अपने सभी शाही ठाठ बाठ , शान-ओ -शौकत छोड़ आम नागरिक की तरह रहकर ये समझने का प्रयास करें कि देश में वास्तविक समानता के क्या मायने हैं। आप सोचोगे भला इस से क्या होगा , मुमकिन है कुछ लोगों को समझ आ सके कि उनकी शान-ओ -शौकत की कीमत कोई और चुकाता है। क्योंकि आपके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है इसीलिए करोड़ों के पास ज़रूरत लायक भी नहीं है।
       आखिर में इक शायर के लोकप्रिय शेर पर इक दूसरे शायर की ताज़मीने से :-
            ख्याल उसकी तरफ कब गया है मौसम का ,
           कभी जो पूछे सबब उस गरीब के ग़म का ,
          खुले भी राज़ तो फिर कैसे चश्मे-पुरनम का ,
         "चमन में कौन है पुरसाने-हाल शबनम का ,
             गरीब रोई तो गुंचों को भी हंसी आई "।
          (  चश्मे-पुरनम= अश्रुपूर्ण नेत्र।  पुरसाने-हाल=हाल पूछने वाला। ) 

Monday, 17 April 2017

लोक सेतिया केवल लोक सेतिया ही काफी है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

आपका नाम छापना है निमंत्रण पत्र पर , बड़ी विनम्रता से उन्होंने सवाल किया , थोड़ा बता दें क्या नाम छपवाना उचित रहेगा। थोड़ी हैरानी हुई , कहा महोदय आप इतने करीब से जानते हैं मुझे , भला आपको मेरा नाम याद नहीं। चलो कोई विशेष बात नहीं है , ये गलती मुझसे भी कभी कभी हो जाती है , कोई पहचाना हुआ मिलता है मगर तब भूल जाता हूं उसका नाम क्या है। आप मेरा नाम लोक सेतिया छपवा सकते हैं , यही मेरा नाम है। आप समझे नहीं , वो कुछ झिझकते हुए कहने लगे , ये तो अच्छी तरह पता है आप डॉ लोक सेतिया हैं , मगर सभी नाम से पहले कोई विशेषण अथवा अंत में कोई उपाधि लगाते हैं। आप क्या कहलाना पसंद करते हैं , लोग आपको क्या समझें। नाम तो हर आम आदमी का होता है विशिष्ट लोग खुद को साहित्यकार पत्रकार समाजसेवी वरिष्ठ नेता अथवा किसी धर्म या गुरु से जुड़ा कोई शब्द लगाकर नाम को ख़ास बनवा लिखते हैं। आप अभी सोच सकते हैं दो चार दिन बाद बताएं क्या उचित रहेगा। मुझे इक उलझन में डाल कर चले गये मित्र।
               मैं लोक सेतिया हूं मुझे यही मालूम है , मगर लोग मुझे क्या समझें ये मैंने कभी सोचा ही नहीं। जैसे किसी समारोह में देने को खूबसूरत स्मृति चिन्ह या ट्रॉफी बाज़ार से मिलती हैं उसी तरह कोई तो जगह होगी जहां अलग अलग नाम अपनी पहचान को परिभाषित करने को उपलब्ध होंगे। सब से पहले अपनी जानी पहचानी जगह चले गये उनके पास जो मेरी रचनाएं प्रकाशित करते हैं। उनसे मुझे प्रस्ताव मिला था कुछ दिन पहले पत्रकारिता और साहित्य को लेकर उनके साथ जुड़ काम करने का। मुझे अनुबंध में रहना पसंद नहीं इसलिए इंकार किया था ये साफ कर कि मुझे सब पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं छपवाना उचित लगता है और आपकी शर्त है किसी और को कभी अपनी रचना नहीं भेज सकता जो मेरे लिये कठिन है। मैं कई विधाओं में लिखता हूं और आपको मेरी केवल एक ही विधा की रचनाएं छापनी हैं। लेकिन उन से जब खुलकर बात हुई तो समझ आया उनके लिये सच मात्र इक साधन है कारोबार करने का।  उनको झूठ को सच बताकर बेचने या झूठ को सच साबित करने में कोई खराबी नहीं लगती , इसको प्रैक्टिकल होना मानते हैं। खरा सच बिकता ही नहीं आजकल उन्होंने समझाया , पीतल पर सोने की परत चढ़ाना ज़रूरी है। अच्छा हुआ जल्दी समझ आ गई बात और तय कर लिया खुद को ये नहीं होने देना है।
                                  इक संस्था बनी थी समाज की समस्याओं की बात को लेकर , समाजसेवा करनी है का दावा था। मगर चार दिन बाद सभा का मकसद प्रचार कर शोहरत हासिल कर प्रशासन पर अपना प्रभाव स्थापित करना ज़रूरी बताया गया। ताकि खुद कुछ नहीं करना सिवा मासिक बैठक में कोई प्रेस नोट जारी करने के प्रशासन से मांगना क्या क्या करे सरकार। मुझे लगा ऐसा तो मैं सालों से अकेला करता चला आ रहा ये कुछ ख़ास कैसे होगा , मगर तब कहा गया जब हम संगठन बनाकर एक साथ जाएंगे अधिकारी या नेता से मिलने तब वो हमें आदर सहित पास बिठा चाय ठंडा पिला हमारा रुतबा बड़ा करेंगे और कभी खुद हमारा कोई काम होगा तब ये जान पहचान ये संपर्क बड़े काम आएगा। तो ये समाजसेवा भी अपने मतलब से होगी , जब समझे तो अलग होना ही सही लगा। फिर इक लेखकों का संगठन भी मिला साहित्य की सेवा का दम भरने को , मगर वहां भी खुद से बड़ा कोई किसी को नहीं समझता मिला। सब को इक सीढ़ी की तरह संगठन को उपयोग करना उचित लगा। लिखना गौण हो गया और लेखक कहलाना महत्वपूर्ण। तालमेल नहीं बैठा अपना और समझ लिया साहित्यकार का तमगा किसी काम का नहीं है।
                  देशभक्ति और जनता की सेवा की बात करने वालों से भी मुलाकात हो गई इत्तेफ़ाक़ से , झंडा फहराना देश प्रेम के गीत गाना और भारतमाता की जय के उदघोष वाले नारे लगाना। करना क्या कोई नहीं बता पाया , बस खुद को देशभक्त कहलाना है। क्या देशप्रेम और देशभक्ति केवल प्रदर्शन या दिखावे की बात है। नहीं समझे इस से हासिल क्या होगा। धर्म वालों से भी मुलाकात हुई अक्सर , गुरु जी समझा रहे थे अधिक संचय मत करो और खुद आश्रम बनवा रहे थे जगह जगह। लाखों करोड़ों की ज़मीन जायदाद खुद की और प्रवचन दीन दुखियों की सेवा ही धर्म है वाला। मगर किसी गरीब की क्या मज़ाल जो उनके करीब भी आये , जो धनवान चढ़ावा चढ़ाते वही परमभक्त अनुयायी कहलाते हैं। किसी को समझा रहे थे कल मंच से मुझे एक सौ आठ नहीं एक हज़ार आठ बतलाना और मेरे नाम से पहले श्री श्री भी एक नहीं दो बार लगाना। अपना कद और ऊंचा करने में लगे हुए कोई बड़ा छोटा नहीं का उपदेश देते विचित्र लगे।
                   सब को पहाड़ पर चढ़ना है अपना कद बड़ा दिखलाना है। मुझे नहीं समझ आती ऐसी बातें। मैं कुछ नहीं हूं , समाजसेवी नहीं , पत्रकारनहीं , साहित्यकार नहीं  , देशभक्त होने का दावेदार नहीं , किसी धर्म का किसी गुरु जी का भक्त सेवक भी नहीं। मुझे लोक सेतिया ही रहने दो , यही रहना है मुझे कोई तमगा लगाना नहीं है।

Sunday, 16 April 2017

उनकी संवेदना उनका प्यार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

जनता बेचारी अबला नारी , नहीं समझी कभी क्यों हुई बलिहारी ,
जब जब जिस ने की प्रकट झूठी संवेदना उसकी दुर्दशा को देख ,
उसकी सेज सजा दी बिना जाने समझे गले में उसके माला डारी।
जिस जिस ने भोली भाली जनता से किया प्यार करने का वादा ,
उस उस को परमेश्वर समझ लिया कदमों में उसके समझा स्वर्ग ,
हर प्रेमी झूठा निकला बस उसका स्वामी बनकर लुत्फ़ उठाया।
नारी ही इक चाहत अपनापन और अपनी प्रशंसा सुन खुश होना ,
कितनी बार यही किया कितनी बार किस किस से धोखा खाया ,
सब उसी पर शासन करने आये नहीं किसी ने उसको रानी बनाया।
नेताओं की संवेदना होती है शिकसभाओं में दो पल का दिखावा ,
नहीं होता किसी को शोकसभा में किसी की मौत पर कोई दुःख ,
इक औपचरिकता निभाते हैं लोग बेदिली से होती है प्रार्थना भी।
तब भी हम ये झूठी रस्म निभाते चले जा रहे हैं बिना विचारे ,
ये सब तो हैं मझधार में जाकर साथ छोड़ने वाले नाम को अपने ,
नहीं मिला करती मंज़िल नहीं मिलते किनारे इनके सहारे।
हम फिर भी सुबह शाम उन्हीं की आरती हैं गाते फूल चढ़ाते ,
मतलबी लोग शासक बनकर नहीं कभी वादे किये निभाते ,
हम उनके झूठ पर कुर्बान जाते झूठ को सच वो बताते।
वो सब सुख देना वो सब कुछ तुम्हारा है की प्यारी बातें ,
मिला कभी नहीं कुछ जागते हुए काटी हैं हमने रातें ,
दिया कुछ नहीं सिवा कहने को प्यार संवेदना की बातें।

लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम ( आज के वक़्त की सरकार के नाम आखिरी खत ) डॉ लोक सेतिया

चालीस साल से अधिक समय हो गया है मुझे जनहित के पत्र लिखते लिखते। बेशक किसी भी सरकार से मेरी आशायें नेताओं और प्रशासन के संवेदनशील और वास्तविक लोकतांत्रिक होने की पूरी नहीं हुई हों , इंदिरा गांधी से लेकर सभी बदलती सरकारों में , जिन में वाजपेयी जी की भी सरकार शामिल रही है , और मनमोहन सिंह जी की केंद्र की और हरियाणा में भुपिंदर हुड्डा जी की सरकार तक। फिर भी शायद इक उम्मीद बची हुई थी कि किसी दिन मैं अपने जीवन में वो बदलाव देख सकूंगा जो मेरा ख्वाब है। कभी कोई नेता आयेगा जो खुद राजसी शान से रहना अपराध समझेगा जब देश की वास्तविक मालिक जनता गरीबी और भूख में जीती है। मगर आपके नित नये नये झूठे प्रचार के शोर में हर तरफ जब बस एक ही नाम का शोर है तब ऐसे सत्ता के होते विस्तार के जश्न भरे माहौल में भला किसी मज़लूम की आह या चीख किसी को सुनाई देगी। आपका सारा संवाद एकतरफा है मन की बात से तमाम तथाकथित ऐप्स तक की बात। तीन साल में आपको पी एम ओ ऑफिस में देश के भ्र्ष्टाचार और आपकी सभी योजनाओं की असलियत तक की जानकारी भेजी पत्र द्वारा। और आपके सभी दावे शत प्रतिशत झूठे साबित हुए। आपका स्वच्छ भारत अभियान और खुले में शौच मुक्त का दावा इस कदर कागज़ी और झूठा सब को नज़र आता है अपने आस पास। सब से अनुचित बात आपको कभी लगा ही नहीं कि प्रशासन को उत्तरदायी बनाया जाये उनका तौर तरीका बदला जाये। जो पहले मुख्यमंत्री हुए उन्होंने भी हर अफ्सर को यही निर्देश दिया था कि उनके दल के कार्यकर्ता की हर बात मानी जानी चाहिए। ये कैसा लोकतंत्र है , दल की सरकार का अर्थ क्या हर तथाकथित नेता का शासक होना है। संविधानेतर सत्ता जितनी आज है कभी नहीं रही। खेद इस बात का भी है कि पहले मीडिया का कुछ हिस्सा सत्ता के हाथ की कठपुतली बनता था आज सभी बिक चुके लगते हैं। जिस तरह हर राज्य में मनोनयन से मुख्यमंत्री बनाये जा रहे हैं उस से तानाशाही का खतरा साफ मंडरा रहा है। आज तक जितनी भी सरकारें आईं उन्होंने कभी भी सच बोलने वालों को इस कदर प्रताड़ित नहीं किया जितना भाजपा के शासन में जनहित की बात करने पर मुझे झेलना पड़ा है। सी एम विंडो की बात छोड़ो प्रधानमंत्री जी से जनहित की शिकायत भी बेअसर है। आपके ऑफिस में लिखे किसी पत्र का को उत्तर नहीं मिला न कोई प्रभाव। आपके मीडिया में खुद के सोशल मीडिया पर महानता के चर्चे बस आपकी इकतरफा बात है। सौ पचास की भलाई की बात को अपने प्रचार में बताते क्या कभी बताया कितने लाख या शायद करोड़ की अर्ज़ियाँ रद्दी की टोकरी में फैंक दी। हो सकता है आपकी लोकप्रियता चरम पर हो और तमाम लोग आपके नाम का गुणगान करते हों मगर मैं आपकी केंद्र की सरकार और हरियाणा में राज्य की सरकार से इस कदर निराश हो चुका हूं कि भविष्य में जनहित की बात सरकार प्रशासन या नेताओं को लिखना ही छोड़ रहा हूं। शायद आप सभी के लिए ये राहत की बात होगी कि मुझ जैसे लोग तंग आकर खामोश हो जायें।
                    लो आज हमने छोड़ दिया रिश्ता ऐ उम्मीद ,
                   लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम।

कौन कौन है सच का कातिल ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आज इक फिल्म देखी जिस ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया। नायक नायिका दोनों की आंखें नहीं हैं , खलनायक नायिका से अनाचार करते हैं और जिनको अपराधी को पकड़ना है वही शिकायत करने वालों को अपमानित और प्रताड़ित करते हैं। नायिका ख़ुदकुशी कर लेती है और नायक बाद में बदला लेता है खुद अपराधियों को सज़ा देता है। मुझे तभी कुछ लोग याद आये जो यही करते हैं , सी एम विंडो हरियाणा की शिकायत की जगह से पुलिस प्रशासन विभाग के अधिकारी से विभाग के बड़े ऑफिस तक सभी। उपयुक्त को महीनों अपना कर्तव्य याद नहीं रहता , विभाग इक जूनियर इंजीनियर को बार बार पत्र भेजता जिसकी प्रति शिकायत करने वाले को मिलती रहती साल तक। फिर कभी शिकायत निपटा देने कभी करवाई की बात का एस एम एस भेजते इक साथ। ये जानते हैं कि जो कर रहे उसका अर्थ अनुचित कार्य करने वालों का पक्ष लेना और जनहित की बात करने वाले को प्रताड़ित करना है। इस तरह ये तथाकथित देशभक्त जनता के सेवक सच को अपराध बना देते हैं और जो सरकार को अवैध कार्यों की जानकारी दे उसको खलनायक बनाना चाहते हैं। कोई विवेक कोई अंतरात्मा इनको झकझोरती नहीं है , इनको पता है फिल्म की तरह वास्तविक जीवन में कोई अपराधियों से खुद नहीं लड़ सकता , न ही इनकी अकर्मण्यता को साबित किया जा सकता है। पर शायद किसी दिन ऊपरवाला इनका इंसाफ करेगा , क्योंकि इनकी मर्ज़ी से किसी की शिकायत जब चाहे बिना कुछ किये बंद की जा सकती है , और उसके बाद बड़े अधिकारी से मिलने वाले पत्रों को जिन में ये बताने को लिखा होता है कि अभी आपने भेजा नहीं क्या किया , जवाब बिना दिये फैंका जा सकता है , मगर भगवान की फाइल खुली हुई है और उसको ये बंद नहीं कर सकते। हां इन्होंने प्रशासन और अधिकारीयों पर से , न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा खत्म कर दिया है। जो एक बार इनकी असिलयत देख लेगा वो दोबारा कोई जनहित की अथवा देश की व्यवस्था की बदहाली की शिकायत कभी नहीं करेगा। ऐसे लोगों ने कितने अपराधियों को बचाया और कितने बेगुनाहों को अपमानित व प्रताड़ित किया इक दिन तो हिसाब होगा ही।

Monday, 10 April 2017

स्वच्छ भारत , स्वच्छ हरियाणा , स्वच्छ फतेहाबाद शहर ( डेढ साल बाद वही तस्वीर ) डॉ लोक सेतिया

2 7 नवंबर 2 0 1 5 को आखिर मैंने भी मुख्यमंत्री को शिकायत का पत्र लिख दिया। और साल तक वो शिकायत भटकती रही दफ्तर दफ्तर। साल पहले की ली कुछ तस्वीरें ये हैं।



ये सभी अधिकारीयों को अख़बार वालों को भेजता रहा।
सरकारी विज्ञापन छापने वालों को भला ये कैसे दिखाई देता।
मालूम नहीं किस तरह मेरी शिकायत को साल बाद दाखिल दफ्तर का दिया गया।
पिछले महीने खबर छपी उपयुक्त को शहर को स्व्च्छ आवारा पशु मुक्त और खुले में शौच मुक्त कराने पर इनाम पुरुस्कार मिला। तब की ताज़ा तस्वीरें ये भेजी मैंने सभी को।




मगर ये भी किसी को दिखाई नहीं दिया। कागज़ों पर सभी योजनायें हर सरकार की तरह।
दो दिन पहले फतेहाबाद के विधायक का फोन नंबर मिल गया और उनको फोन कर सब असलियत बताई।
उस दिन 9 अप्रैल की भी तस्वीरें ले लीं उनको दिखाने को जो ये हैं।
कल 1 0 अप्रैल को जब विधायक जी को शिकायत का पत्र देने जाने लगा तब जो देखा सामने उसकी भी तस्वीर ले जाना उचित लगा और ये कल सुबह दस बजे की तस्वीर भी फोन में ले ली। जिस में नगरपरिषद वाले कूड़ा ट्रॉली में भर रहे और आधा वहीं आग लगा जला भी रहे थे।
दस बजे मैं विधायक जी के ऑफिस पहुंचा और शिकायत का पत्र दिया , बहुत आदर से पास बिठाया और चाय को पूछा। मैंने उनको पत्र दिया जिस को उन्होंने रख लिया , कहने लगे आप गंदगी से परेशान हैं। मैंने कहा नहीं मैं प्रशासन के तौर तरीकों से झूठ से और जनता की समस्याओं से परेशान हूं। चालीस साल से जनहित की बात लिख रहा मगर किसी शासक किसी अधिकारी पर कोई बदलाव दिखता नहीं। सब को अपना प्रचारित झूठ सच और जनता की असलियत झूठ लगती है। खैर उन्होंने फोन किया बिना अर्ज़ी को पढ़े ही नगरपरिषद प्रधान को कुछ इस तरह। " भाई ये डॉ साहब मेरे  पास बैठे हैं शिकायत कर रहे , आपका अपना वार्ड है मॉडल टाउन देखो "। कुछ समझे , जैसे उनको समस्या और इतने अरसे तक बदहाली की फ़िक्र नहीं , उनको तो विवश होकर फोन करना पड़ा जब कोई आया है। वास्तव में उनका ध्यान दो भगवा वेश धारी साधुओं की तरफ था जिनको वो पांच सौ रूपये दान देकर कोई पंचमुखी रुद्राक्ष ले रहे थे और उन से मंत्री बनाने को उनकी खातिर जप करने को कह रहे थे। शायद विपक्ष के विधायक को उनकी पूजा और आशिर्वाद ही मंत्री बनवा सकता है। अब जो खुद औरों से खुद अपने लिये सहायता चाहता हो मुझे उस से सहायता क्या मांगनी थी , मुझे तो उनको उनका कर्तव्य याद दिलाना था , कि आपका फ़र्ज़ है जनता की दशा देखना। मैंने उन्हें सब बताया भी दिखलाया भी आगे उनको मर्ज़ी है।  


Sunday, 9 April 2017

हमारे घोटाले शाकाहारी हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

देखो ये भाईचारा है इसको घूस लेना मत कहो। कोई आकर घर पर मिठाई की जगह नकद पैसे नेता या अधिकारी के घर इनके बच्चों को दे कर अपना कोई काम निकलवा जाता तो बुरा है क्या। सभा में मंत्री जी को महंगे उपहार भेंट करना अनुचित कहां है। सदभावना की खातिर स्वीकार करते हैं कोई मांग कर नहीं लेते। अब अगर हर सरकारी योजना का धन बड़ा अधिकारी अपने कुछ ख़ास चाटुकारों का एन जी ओ बनवा आबंटित करता है थोड़ा खुद भी बचाता है तो गलत क्या है। जनता की सहायता को है राशि तो क्या अधिकारी देश की जनता में शामिल नहीं है , जो उसके परिचित ख़ास लोग हैं वो भी जनता ही हैं। आप अफ्सरों द्वारा किसी दुकानदार से कोई वस्तु खरीद मोल नहीं चुकाने को अपराध नहीं साबित कर सकते। जब देने वाला खुद कहता है भला आपसे झोला भर सब्ज़ी और टोकरा भर फल प्रतिदिन लेने के हम पैसे वसूल कर सकते हैं। ऐसे में उस पर कृपा की दृष्टि रखना हमारा परम कर्तव्य बनता ही है। ऐसे कारोबार वाले के कानून तोड़ने या कायदे का पालन नहीं करने पर भला कोई सख्त करवाई की जा सकती है। उच्च अधिकारी क्या मंत्री तक भेजते रहें पत्र बार बार कि आपने क्या किया शिकायत पर , कौन जवाब देता है। उच्च अधिकारी या मंत्री भी पत्र लिख इतिश्री कर लेते हैं , सब इक दूजे की समस्या समझते हैं। जाने क्यों अभी तक ये नियम साफ नहीं किया गया है कि उपहार देना लेना हमारी पुरानी परंपरा रही है। इक अनधिकृत फक्ट्री वाला नकद रिश्वत देने के विरुद्ध है , मगर अपने सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़े को अफ्सर के घर देसी घी का टीन और कुछ सामान अपने गांव से लाया शुद्ध बताकर देता है और अधिकारी खुश होकर उसका काम कर देता है। ये सब भाईचारा है , फिर भी आपको घोटाले लगते हैं तो ये विशुद्ध शाकाहारी हैं सेहत के लिये लाभकारी , कोई दुष्प्रभाव नहीं इनका। आजकल कोई घोटाला नहीं होता है बस प्रेम और भाईचारा बढ़ाने को थोड़ा लेन देन किया जाता है।  

Saturday, 8 April 2017

शब्द वही हैं अर्थ बदल गये हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

बड़े बड़े पोस्टर सरकारी प्रचार के विज्ञापनों वाले दावा करते हैं आपका देश आपका शहर स्वच्छ हो रहा है , आपके शहर के अधिकारी को उत्कृष्ट कार्य का इनाम भी दिया जा चुका है। अब अगर आप अपने आस पास की बढ़ती गंदगी की तस्वीर उनको दिखाना चाहोगे तो उनको बुरा लगना ही है। आप आंखें बंद नहीं रखना जानते चुप रहना भी नहीं आता तो आप इन लोगों का नया शब्दकोष लेकर पढ़ लो नया अर्थ। इसी हर तरफ फैली गंदगी को आप स्वच्छ भारत अभियान नाम देकर देखो आपको कितनी ख़ुशी होगी। समझ जाओगे अच्छे दिन आ चुके हैं , आपको पता ही नहीं था अच्छे दिन शब्द का अर्थ क्या है। आपका दोष नहीं है आपने कभी देखे ही नहीं थे अच्छे दिन , अब बेशक सोचो इन अच्छे दिनों और उन खराब दिनों में फर्क कहां है। आपने सुना ये नया शासक दिन में अठाहर घंटे काम करता है , क्या काम करता है ये क्यों सोचते हो। अब आपको ये अधिकार थोड़ा है कि आप सूचना के अधिकार में ऐसे सवाल करो कि तीन साल के 1 0 9 5 दिनों में उन्होंने कितनी सभाओं में कितना समय भाषण देने में बिताया , कितने दिन किस किस देश की यात्रा की , किस किस धर्मस्थल क्या क्या दान किया क्या क्या पूजा पाठ किया। भला किस शासक को याद है दरिद्र नारायण की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और शासक अगर अपना फ़र्ज़ निभाता ईमानदारी से तो भगवान अपनी पूजा से कहीं अधिक खुश होता है। आपने तो पद ग्रहण करते देश के संविधान की शपथ ली थी , क्या उसकी याद रही , लोकतांत्रिक मूल्यों की चिंता कभी की। आप औरों पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाले सभी राज्यों में किसी भी तरह अपना शासन कायम करना ही नहीं अपितु हर राज्य में अपने द्वारा मनोनित व्यक्ति को ही सत्ता सौंपते हुए वही सब करने लगे जिस की आलोचना करते थे। शायद आपके शब्दकोश में इसी को संविधानिक मर्यादा का पालन करना कहते हैं। आंतकवाद और कालाधन क्या खत्म हो गया , कितना काला धन पकड़ा आपने , जब खुद राजनैतिक दलों को सब छूट देनी थी तब ये तमाशा किया ही किसलिये। आपके दल के अपराधी भी माननीय हो गये और आप उनका प्रचार उनकी बढ़ाई कर करते रहे। झूठ की परिभाषा तक बदल कर रख दी आपने , बहुत खुश हैं हर तरफ आपकी धूम है। ऐसे में किसी की भूख किसी की चीख आपको क्या सुनाई देगी ,
अब जो ख़ुदकुशी कर रहे या जिनकी हालत बद से बदतर होती गई आपके शासन में , उनको कौन बताये यही अच्छे दिन हैं जो आने वाले हैं का शोर मचाकर आप आये थे। शायद आप भी वही मानते हैं कि जनता कहां याद रखती है क्या वादा किया किस नेता ने , लेकिन आप अभी से दो साल बाद फिर से चुनाव जीतने की चिंता में डूबे हुए हैं। अर्थात सत्ता ही आपका एक मात्र मकसद है , अन्यथा आपको फ़िक्र होती कि तीन साल पहले जो जो करने का संकल्प किया था उसको कितना पूरा किया और कैसे बाकी भी पूरा करना है। अगर सोचते और हिसाब लगाते तो जान पाते अभी कुछ भी नहीं बदला है। आज भी प्रशासन पुलिस सब निरंकुश हैं , आम आदमी आज भी डरा सहमा है , निराश है। आपके सरकारी विज्ञापनों में असली किसानों को वो अभिनेता उपदेश देता है जो खुद किसान कहलाने का झूठा प्रमाणपत्र जालसाज़ी से बनवा लाया था। किसी ने उस से सवाल किया जब जिस प्रमाणपत्र को दिखला आपने लोनावला में ज़मीन खरीदी थी जिसको किसान ही खरीद सकते थे , वही अदालत में फर्जीवाड़ा साबित हुई तो आपकी खरीदी ज़मीन अवैध क्यों नहीं है। याद आया आप शासक जब चाहे किसी अनुचित काम को उचित घोषित कर सकते हो। जैसे कल जिस रिहायशी जगह कारोबार करना गैर कानूनी था आज आपने कुछ पैसे लेकर उसको उचित करार दे दिया। एक दिन देश को संबोधित करते आपने कहा अब कभी काले धन को घोषित करने का अवसर नहीं दिया जायेगा और उसके ठीक बीस दिन बाद इक नयी योजना आधा आधा की ले आये। ये कैसी नैतिकता है क्या मूल्य हैं , आप करो तो पुण्य और करें तो पाप। अच्छा अच्छा ये अच्छे दिनों की तरह बदली परिभाषा है। शिक्षक दुविधा में हैं किस शब्दकोश से बच्चों को अर्थ समझायें , क्या मालूम आपके बाद कोई और आप से बढ़कर निकले और शब्दों के अर्थ क्या शब्द ही नये रचने लगे। लगता है आपको भी कोई नया इतिहास रचना है , ऐसा इतिहास जिस में बस आप नायक बाकी सब खलनायक हों।  लेकिन ध्यान रखना इधर लोग खलनायकों को ही नायक बनाने लगे हैं , मिसाल आपके सामने है। सब फ़िल्मकार यही आदर्श स्थापित कर अमीर बन रहे हैं , जब भगवा धारण कर व्यापार किया जा सकता है तब कुछ भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता टीवी शो वाला भी आपका चाहने वाला है , मगर आपको मालूम तो है ना कि ऐसे दोस्त अच्छे नहीं होते जो आपको सच नहीं कह सकते हों। तब वास्तव में कभी भी कुछ भी हो सकता है। चलो शायद कभी नेता अधिकारी भी सच में बदल कर देशसेवक और ईमानदार बन जायें , कठिन तो है फिर भी उम्मीद करने में बुरा क्या है। हो सकता है अच्छे दिन सच को आ जायें , दिल को मज़बूत रखना कहीं ख़ुशी में जान ही नहीं चली जाये देखकर।

Tuesday, 4 April 2017

{ जीने का सही तरीका } दुनिया के यातायात के नियम ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आप पैदल चलते हैं या किसी वाहन की सवारी कर सफर करते हैं आपको कुछ कायदे कुछ नियम समझने ज़रूरी होते ही हैं। बायीं तरफ चलना देख कर कदम रखना और ऊंचाई या निचाई फिसलन या धूल और गंदगी के इलावा जानवर आदि का ध्यान रखना होता है। सड़क पार करनी हो तब इधर उधर देख सही जगह से करना होता सुरक्षा की खातिर। जब आप वाहन चलाते हैं तब भी आपको बहुत बातों का ध्यान रखना होता है। किस गति से चलना किस तरफ कैसे मोड़ काटना सिग्नल पर रुकना और हैलमेट पहनना। आपको सिर्फ खुद अपने वाहन का ही ध्यान नहीं रखना होता , दायें बायें आगे पीछे चलते वाहनों का भी ख्याल रखते हैं। कभी सोचो अगर सब केवल खुद अपनी मर्ज़ी से इधर उधर होते बगैर सब को रास्ता देते चलने लगें तो कितना टकराव हो कितनी दुर्घटनायें घटती हैं ऐसी लापरवाही से। पुलिस हवालदार और जुर्माने का डर काफी मदद करता है खुद हमारी सुरक्षा में।
                         मगर क्या हम अधिकतर जीवन में इन बातों पर विचार करते हैं , जीने का सही तरीका भी वही है जब हम सब केवल अपनी सुविधा नहीं सभी की परेशानियों और अधिकारों की परवाह करें। कभी ध्यान देना हमारी अधिकतर समस्याओं की जड़ खुद हमारे अथवा किसी दूसरे के सामाजिक नियमों की अनदेखी करना होता है। मुझे जो चाहिए जैसे चाहिए की सोच उचित नहीं है , क्यों और किसलिए भी सोचना समझना ज़रूरी है। काश इतनी छोटी सी बात सभी समझ लें कि चाहे जो भी हो हमें सही राह पर चलना है , मुश्किलों से बचने को आसान रास्ते नहीं तलाश करने। कहने को बेशक हम सब दावा करते हों कोई अनुचित कार्य नहीं करने का , मगर वास्तविकता ये नहीं है। अगर हम अनुचित नहीं करते तो कोई हमारे कारण परेशान नहीं होता। खेद की बात तो ये है कि हम हर अनुचित काम उसको उचित ठहरा कर करते हैं। आप अपने घर के सामने सफाई रखते हैं और चुपके से या छिपकर अपनी गंदगी पड़ोसी के दरवाज़े के सामने या जहां कहीं चाहते हैं डाल देते हैं। कोई रोकता है तो हम समझते हैं वही गलत है , इस तरह हम चोरी और सीनाज़ोरी करते हैं। रिश्वत खाना और खिलाना दोनों अनुचित हैं , हम उचित काम भी अपनी सुविधा से करवाने को ऐसा मर्ज़ी से भी करते हैं और कभी विवश होकर भी। आपने रिश्वत देकर अपना काम ही नहीं करवाया अपने दूसरों के लिए भी मुश्किल खड़ी कर दी , क्योंकि आपने गलत लोगों की आदत बना दी घूस लेने की।
            सोचो अगर सरकारी अधिकारी अपना काम निष्पक्षता से पूरी इमानदारी से करते तो आज देश की ऐसी दुर्दशा कभी नहीं होती। चंद सिक्कों की खातिर अपना ईमान बेचकर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने देश के करोड़ों लोगों के प्रति अपराध किया है। यही बात नेताओं की है , उद्योगपतियों कारोबारियों , सभी ने नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाईं हैं। अध्यापक या डॉक्टर क्या इस लिये होते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को मानव कल्याण के खिलाफ अपने मतलब के लिये इस कदर लूट खसूट का कारोबार बना देना चाहें। वकील और न्यायधीश न्याय को हैं अथवा अपनी ज़रूरत अपनी सुविधा अपनी आय ही सब से बड़ा धर्म है। कोई जो भी काम करता है उसको अपने कर्तव्य में ईमानदारी को महत्व देना होगा , जब कोई भी अपना फ़र्ज़ नहीं निभाता और अधिकार सब चाहते तब यही होना है जो आज होता दिखाई देता है।
           आम आदमी क्या तथाकथित महान कहलाने वाले लोग भी अपने मार्ग से भटके हुए हैं। धर्मप्रवचक उपदेशक खुद मोह माया और नाम शोहरत में उलझे हैं , आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। क्या यही उपदेश है किसी भी धर्मग्रंथ में लिखा कि धर्मस्थल अपने पास धन दौलत के अंबार जमा करते रहें। दीन दुखियों की सेवा की बात किस को याद है। पत्रकारिता और लेखकों कलाकारों अभिनय करने वालों फिल्मकारों आदि को मालूम है उनको क्या आदर्श स्थापित करने हैं। समाज का आईना जब बिगड़ गया है और धन दौलत हासिल करना सफलता का पैमाना बन गया हो तब क्या होगा।  पथप्रदर्शक मार्ग से भटक गये हैं। शायद किसी को फुर्सत ही नहीं ये सोचे कि उसका अपना कर्तव्य सही ढंग से नहीं निभाना उसकी निजि बात नहीं है। हर मानव समाज का हिस्सा है और हर हिस्से को सही काम करना चाहिए। आप प्रकृति को देखें हवा पानी आग मिट्टी , पेड़ पौधे सूरज सब नियमित अपना अपना काम करते हैं , दुनिया तभी कायम है। आपके जिस्म में हर अंग अपना अपना काम ठीक करता है तभी हम ज़िंदा हैं , हाथ पांव क्या बदन का छोटे से छोटा भाग ठीक नहीं हो तब मुश्किल होती है।  जिस्म के अंदर भी मांस हड्डी रक्त और हृदय गुर्दे और फेफड़ों की तरह कितने और भाग हैं मस्तिष्क  की नाड़ियों से लेकर महीन ग्रन्थियों तक , सब अपना काम रात दिन करते हैं तभी जीवित हैं हम सब। यही नियम समाज का भी है , जब हम में कोई अंग रोगग्रस्त होता है बिमारी का असर सारे समाज पर पड़ता है।
                           शायद अब आप सोचोगे कि काश इंसान के लिये भी कोई कानून का पालन करवाने वाला हवालदार होता जो हर लाल बत्ती की तरह गलत दिशा में जाने से रोक देता। मगर वास्तव में ऐसा है , वो ईश्वर है या जो भी जिसने इंसान को बनाया है , उसने इक आत्मा इक रूह इक ज़मीर सभी में स्थापित किया है। मगर क्या हम अपनी अंतरात्मा अपने ज़मीर की आवाज़ सुनते हैं , ये फिर लाल बत्ती पर कोई हवालदार खड़ा नहीं होने पर सिग्नल तोड़ आगे निकल जाते हैं। सब जानते है उचित क्या है अनुचित क्या , पाप पुण्य का अंतर समझने को शिक्षित होना ज़रूरी नहीं है। जब भी किसी के साथ अन्याय करते हैं या किसी को उसका अधिकार नहीं देते तब हम जानते हैं ऐसा गलत है। हर धर्म यही समझाता है मगर हम खुद को धार्मिक बताने वाले धर्म-अधर्म में अंतर जानते हुए भी अनुचित मार्ग अपनाते हैं खुदगर्ज़ी में। लेकिन क्या हम सोचते हैं हमें अपने अपकर्मों की कर्तव्य नहीं निभाने की कोई सज़ा नहीं मिलेगी। ये खुद को धोखे में रखना है। आप बबूल बोते हैं तो आम कैसे खाओगे। आपका बीजा बीज इक दिन उगेगा पेड़ बनकर , अगले जन्म की बात नहीं है , इसी जन्म में सब को अपने अपकर्मों की सज़ा मिलती है ये कुदरत का नियम है जो किसी सरकारी कानून की तरह बदला नहीं जा सकता। हैरानी की बात ये है कि जब हम सभी को कोई दुःख कोई परेशानी होती है तब हम ये नहीं सोचते कि ऐसा अपने किसी अपकर्म के कारण तो नहीं हुआ , हम किसी और को दोषी ठहरा अपने आप को छलते हैं। सही यात्रा के लिये यातायात के नियम पालन करने की ही तरह सार्थक जीवन यात्रा जीवन में मानवीय मूल्यों का पालन कर ही संभव है।