Sunday, 26 February 2017

आधा सच है आधा झूठ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    सदा सच बोलो। ये तीन शब्द बेहद खतरनाक हैं। जो इनको मान ले उसकी दशा खराब हो जाती है। सच बोलने का सबक पढ़ाने वाले खुद सच ही बोलें ये लाज़मी नहीं है। एक बार झूठ को बेनकाब करने वाले भी झूठे साबित हो गये मगर तब भी उन्होंने अपने झूठ को झूठ मानने से इनकार कर दिया , कहने लगे ये उनका अपना नज़रिया है। इस तरह सच की इक और परिभाषा बना दी उन्होंने। सच वही जिसे आप माने। इस बात से अभिप्राय यूं निकला कि सच और झूठ परस्पर विरोधी नहीं हैं। दो जुड़वां भाई हैं , बस ये पता नहीं चलता कौन बड़ा है कौन छोटा। एक जैसे दिखते हैं हमशक्ल भाईयों की तरह , देखने समझने वाला धोखा खा जाता है। अंतर केवल रंग का है सच गोरा है झूठ सांवला सलौना सब का मन मोह लेता है। चाल ढाल दोनों की अलग अलग है , सच फटेहाल है झूठ सूटेड-बूटेड है चमक दमक लिये है। सब उसी को पसंद करते हैं सच को लोग दूर से देख कतरा कर निकल जाते हैं बचकर। सच अभी कुंवारा है बेघर है , भटकता रहता है किसी ऐसे की तलाश में जो उसको अपना बना ले। झूठ को हर दिन कोई न कोई वरमाला पहना देता है , उसके कितने ठिकाने हैं , बहुत घर हैं उसके। सच फुटपाथ पर रहता है तब भी खुश है इस बात पर लोग आचंभित हैं। झूठ का कुनबा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है , खूब फल फूल रहा है। सच के भूखे मरने की नौबत आ गई है , इस ज़माने में उसका साथी कोई भी नहीं है। सच पर इल्ज़ाम है कि उसने बहुत लोगों की नींद उड़ा रखी है जिससे उनका जीना मुहाल है , वो चाहते हैं सच को सूली पे लटका दिया जाये। सच पर तमाम मुकदमें दायर हैं।
                इक और दुकान खुली है सच बेचने का धंधा करने वालों की बस्ती में , जो दावा करती है असली सच उन्हीं की दुकान से मिलता है। जिसे ज़रूरत हो उनसे जब जितना सच चाहे खरीद सकता है , मुंहमांगे दाम चुकाकर। कीमत बाक़ी की दुकानों से थोड़ी अधिक है मगर उनका सच प्रमाणित है गारंटी वाला। सब लोग उनसे प्रमाणपत्र वाला सच खरीद अपने ड्राइंगरूम की दीवार पर टांग रहे हैं सच्चे कहला रहे हैं। किसी किसी ने तो घर के बाहर प्रवेशद्वार पर ही सच को टंगवा लिया है ताकि सब देख सकें। सच को हर कोई नहीं खरीद सकता , जिसकी हैसियत है वही मोल चुका सकता है। आजकल सच अमीर लोगों का रईसी शौक बन गया है , हर महंगी वस्तु की तरह। महंगा कालीन , महंगे शोपीस , बहुमूल्य पेंटिंग की तरह ही सच सजावटी सामान बन गया है। सच अब बोलता नहीं है उसके होंठ सिल चुके हैं , पिंजरे वाले तोते और गमले के पौधे के साथ इक कोने में शोभा बढ़ा रहा घर के मालिक की। आजकल सजावट में सूखा ठूंठ या कैक्टस का कांटेदार पौधा , मिट्टी के बर्तन घड़े जाने क्या क्या ऊंचे दाम खरीद लेते हैं।
                सच बेचने वाले कमाल के अदाकार लोग हैं। झूठ के पांव नहीं हैं तो सच के पैर काट उन पे झूठ का बदन लगा बहुत तेज़ी से भगा सब को खुश कर देते हैं। उनको ये कला आती है तभी इस धंधे में उनका नाम है , उनके दफ्तर से निकल छोटे से कस्बे से चलता झूठ राजधानी पहुंच जाता है। सच हर जगह कत्ल किया जा रहा है , सभाओं में , बाज़ारों में , सरकारी भवनों में , अदालतों की चौखट पर , सब कहीं उसी के लहू की लाली है। मगर कोई स्वीकार करना नहीं चाहता कि सच को मार दिया गया है। सब कहते हैं सच ज़िंदा है , उनकी तिजोरी में अलमारी में या दफ्तरी फाइल में सुरक्षित है। अभी उसकी ज़रूरत नहीं है जब भी ज़रूरत हुई निकाल लेंगें। सच का दम घुटता रहे तब भी उसकी मौत नहीं हो सकती , सच कभी नहीं मरता ये मान्यता है। झूठ की जय-जयकार हो रही है , सच पर मुकदमा चल रहा है। कटघरे में खड़े सच को झूठ साबित किया जा रहा है। झूठ दावा कर रहा है बहुमत उसी के साथ है। शासन करने का अधिकार उसी को है। अदालत बेबस है उसको सबूत नहीं मिले सच को कैद करने अपहरण करने या मार दिये जाने के। जांच करने वाले सभी झूठ के साथी हैं , निष्पक्ष जांच हो सकती ही नहीं।  अदालत जांचकर्ता को चेतावनी देती रही है कितनी बार मगर उस पर कोई असर नहीं होता है। झूठ किसी की परवाह नहीं करता , वो सच बनकर वातानुकूलित घर दफ्तर  में रहता है। कोई भी मौसम हो उसको कुछ फर्क नहीं पड़ता , हर तरह के मौसम से ज़ेड केटगरी की सुरक्षा उसको मिली हुई है।

इस दर्द की दवा क्या है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     सुना था जब दर्द हद से बढ़ जाता है तो खुद ही दवा बन जाता है। यही सोच हम दर्द सहते रहे ख़ामोशी से कि ये दवा बन जाये और हमें चैन आये मगर अभी तलक वो हद नहीं आई। वो हद जल्दी आये ये सोचकर हम तो दर्द को बढ़ाने के जतन ही करते रहे। अपना दर्द लाइलाज है इतना तो जानते हैं खुद चारागर हैं , फिर भी ज़िंदा रहते उस हद को देखना चाहते हैं जब दर्द दवा हो जाता है। बिना दर्द जीना किसे कहते हैं कभी तो हम भी देखें , दर्द सहकर जीना मुश्किल तो नहीं फिर भी। मेरे प्रिय मित्र जवाहर ठक्कर ज़मीर जी  की ग़ज़ल है  :-
                               " है कभी आसां कभी दुश्वार है ,
                                ज़िंदगी तेरा अजब आकार है। "
सोचते हैं आसां ज़िंदगी कैसी होती है , दर्द है बड़े काम की चीज़। फिल्मों में नाटकों में गायकी में दर्द बहुत काम आता है। निर्देशक कहता है चेहरे पर दर्द के भाव लाओ आवाज़ में दर्द की तड़प सुनाई देनी चाहिए। लोग दर्द बेच बेच करोड़पति बन गये हैं , कुछ लोग इसी दर्द से मर गये कि लखपति होकर भी पति नहीं बन पाये। लोग सोचते हैं क्या आज़ाद पंछी हैं न घर की फ़िक्र न बाहर की चिंता। शादीशुदा का दर्द कुंवारा कैसे समझे और कुंवारे कुंवारी की हालत शादीशुदा कभी नहीं समझ सकते। सब को अपना दर्द सालता है , पराया दर्द कौन समझता है दुनिया में। जिनको शादी कर लगता मुसीबत मोल ली उनको दो दिन बिना पति-पत्नी रहना पड़े तो बेचैन हो जाते हैं। मिठाई खाना भी पसंद और मधुमेह रोग से भी बचना  कुछ ऐसी सिथ्ति है। सरदर्द खुद लिया और दवा औरों से पूछते हैं। डॉक्टर मानते हैं दर्द से बड़ा कोई रोग  नहीं , जब तक दर्द नहीं होता कोई डॉक्टर को नहीं पूछता। तभी वो सब बाकी दवाओं से ज़्यादा दर्द निवारक दवायें लिखते हैं। दर्द की दवा खाते खाते लोग गुर्दे खराब कर लेते हैं , कोई कैसे बताये दर्द किधर होता है , कभी उधर कभी इधर होता है। इक दर्द और होता है इलाज के खर्च का दर्द जो पहले के दर्द से अधिक दर्द देता है। शरीर का दर्द घटता है मानसिक दर्द बढ़ जाता है।
               लोगों को जाने क्या मज़ा मिलता है किसी को दर्द देकर। परायों का दर्द सह लेते हैं अपने जो दर्द देते वो असहनीय होता है। मुहब्बत का दर्द सब से बड़ा है , हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय। कहते ये भी हैं दर्द का रिश्ता ही सब से गहरा होता है , जिसने दर्द झेला वही समझता दूसरे का दर्द क्या है। जन्म का दर्द बच्चा भूल जाता मगर मां को याद रहता किस बच्चे को जन्म देते कितना दर्द झेला था। ये शायर लोग भी अजीब हैं ज़माने भर का दर्द अपने जिगर में लिये फिरते हैं। चलो इक शायर का शेर भी याद  आ गया :-
                               रंग जब आसपास होते हैं ,
                               रूह तक कैनवास होते हैं।
                               खून दे दे के भरना पड़ता है ,
                               दर्द खाली गलास होते हैं।
                              सैकड़ों में बस एक दो शायर ,
                              गहरी नदियों की प्यास होते हैं।
इश्क़ के मरीज़ की बात ऐसी है , दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की। मुहब्बत का फ़साना यही है , नाकाम इश्क़ ही इतिहास बनाता है। मुहब्बत कामयाब हो जाये तो हादिसा कहलाती है , शादी मुहब्बत को बचने कहां देती है। आम आदमी का दर्द छोटा और बड़े लोगों के दर्द बड़े होते हैं। जैसे कुछ बड़ी बड़ी बिमारियां अमीरों के लिये आरक्षित हैं उसी  तरह सत्ता जाने का दर्द जीने देता न मौत ही आती है। कुर्सी से बिछुड़ने का वियोग राजनेता ही जानते हैं , सब होता तब भी सब निस्सार लगता है। राजनीति में वोटर जो दर्द देता है उसकी शिकायत भी करना अलोकतांत्रिक है , जनता का फैसला मंज़ूर है कहना मज़बूरी है। जीत कर बहुमत जुटाने की पीड़ा और हारने पर खाली तिजोरी का दर्द दोनों सहने होते हैं। जो लोग हरदम मुस्कुराते हैं कहते हैं हज़ारों ग़म छुपाते हैं।
हम से मत पूछना क्यों दर्द भरे नग्में गुनगुनाते हैं। आज तक जितना भी साहित्य रचा गया है दर्द को समझ कर झेलकर ही लिखा गया है। सृजन की पीड़ा प्रसव पीड़ा की ही तरह होती है। दर्द मधुर स्वर होता है , हैं सब से मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं। दर्द दिल में होता है लोग गुनगुनाते हैं।  

अथ् श्वान कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    हर शहर की हर इक गली में एक न एक कुत्ता रहता है। ये सारे कुत्ते खुद को गली ही नहीं समाज और देश का रखवाला बताते हैं। अपनी गली में ही नहीं बाहर भी सारे कुत्ते शेर हैं , अब इनकी आपसी लड़ाई अपनी जगह है , और इन सब के समान हित अपनी जगह। ये भौंकते ही नहीं काटते भी हैं , मगर जिस के हाथ में डंडा हो उस से डरते भी हैं। जो इनके सामने हड्डी डालता है उसके आगे दुम भी हिलाते हैं और मतलब को तलुवे भी चाटते हैं। इन्होंने अपनी एकता कायम रखने को संगठन भी बनाये हुए हैं , जिसकी सभा में एक सुर में राग अलापते हैं। फिर भी इन में कोई दूसरे का दोस्त नहीं सब खुद को बड़ा बाकी को छोटा मानते हैं। हर कुत्ता अपने को सब से सुंदर काबिल और मूल्यवान समझता और बाकी को बिकाऊ माल हैं। सच का झंडाबरदार हर कोई अपने आप को घोषित करता है , झूठ को सच के लेबल लगा बेचना जानते हैं सभी। हर दिन हर कुत्ते की मुलाकात किसी चोर के साथ तय होती है जिस में साथ साथ डिनर कर बाकी की बुराई की जाती है।  पालतू कुत्ते को खाने को अपने आप मिलता रहता है , जो किसी के पालतू नहीं उनको मालिक की तलाश होती है। ये सब खुद को ख़ास मानते हैं और हर सभा में अगली कतार में जगह आरक्षित होने को अपना अधिकार समझते हैं। नेता और प्रशासन इन से बहुत भय खाता है , इनका भौंकना बंद कराने को बोटियां भिजवाता है , हड्डियां डलवाता है।
       अभिव्यक्ति  की आज़ादी का अधिकार इन सब को भाता है , इनका भौंकना लोकतंत्र को बचाता है , ये बोलता हुआ औरों की आज़ादी को चबाता है खा जाता है। जब कोई कुत्ता नेता बन जाता है , उसमें इक और पागलपन छा जाता है। तब वो कुत्ता खुद को अल्सेशियन डॉग बतलाता है , सत्ता की दूध मलाई खाता है। इनका अंग्रेजी भाषा बोलना इन्हें हिंदी में भौंकने से ऊपर ले जाता है , सब को इन पर ज़्यादा प्यार आता है। पांच साल बाद जब चुनाव आता है , भाव इनका आसमान पे चढ़ जाता है। बंद कमरों में इनकी कीमत लगाई जाती है , रूठे को मनाने को हर सफाई दी जाती है। सरकार इन पर बड़ी मेहरबान रहती है। इनको बसाने को अलग आवासीय कॉलोनी बनाना चाहती है , पर इनकी आपसी महाभारत से घबराती है। इनका हर पल ध्यान रखती है।  

Saturday, 25 February 2017

कैसा महाभारत है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  ये वो कुरुक्षेत्र है जिस में कोई कृष्ण धर्म की खातिर धनुष उठाने का उपदेश नहीं दे रहा। जहां सभी अंधे हैं धृतराष्ट्र को सब दिखाई देता है , आंखों वाले आंखें मूंद या गंधारी की तरह पट्टी बांध सच को देखने से बच रहे हैं। भीष्मपितामह को अपनी प्रतिज्ञा याद नहीं रही , गुरु द्रोणाचार्य की चिंता है उनको इतिहास छात्रों को अपनी पसंद से पढ़ाना है। अपने आश्रम को शिक्षा का सब से सफल कारोबार बनाकर जगह जगह अपनी दुकानें खोलनी हैं। युधिष्टर को समझ नहीं आ रहा धर्म किस तरफ है , उसकी व्याख्या बदल चुकी है। कौन पांडव है कौन कौरव किसे खबर , सभी दल बदल बदल एक जैसे बन गये हैं। सब को सभा में स्थान चाहिए आसन चाहिए , हर सुख सुविधा चाहिए। उधर महल में बैठा रावण फिर सीता हरण की योजना बना रहा है , इस बार उसने विभीषणों को अपना बना लिया है सत्ता में भागीदार बनाकर , और उसको राम की सेना की जानकारी और भेद लाने को भेज दिया है। अब राम किसी भरत को सिंघासन पर बिठाने की गलती नहीं करता , लक्ष्मण भी अब बनवास में साथ नहीं जाने को तैयार , सीता की दशा अभी भी वही है। रामायण और महाभारत आपस में घुल मिल गये हैं , कवि वीर रस को छोड़ बुद्ध को याद कर युद्ध में शांति की कविता सुना रहे हैं।
        महिला सशक्तिकरण की चर्चा में शामिल सीता और द्रोपती अपना मुल्यांकन करना चाहती हैं। अभी भी उनकी अग्निपरीक्षा ली जाती है आज भी धर्मराज उसको जुए में दांव पर लगा हार जाते हैं। गंधारी अपनी पट्टी खोल आज भी अपनी संतान के दुष्कर्म नहीं देख सकती। राम-कृष्ण चुनाव में अब मुद्दा तक नहीं हैं , उनके आदर्श खोखले साबित हो गये हैं उनकी निति अपनी उपयोगिकता खो चुकी है। आदर्शों की बात बची ही नहीं , युद्ध में भी अब कोई नियम पालन नहीं करता।  वार कमर से नीचे क्या पीठ के पीछे धोखे से भी करने वाला योद्धा खुद को बलवान बताता है। कुंभकर्ण ने नया अवतार लिया है देश का प्रशासन सारा तंत्र पुलिस अदालत न्यायपालिका सब सुख की नींद सोते हैं जब जनता हाहाकार करती है त्राहि त्राहि कहती है। आधुनिक हनुमान अयोध्या को आग के हवाले कर राजधानी में मंत्री बन गये हैं।
             राम बेबस हैं अकेले हैं , कृष्ण खुद ज्ञान भुला सोच रहे गीता का उपदेश किसको देना है। दुर्योधन को यकीन है अब कोई उसको नहीं मार सकता , सभी उसको समझौते का प्रस्ताव भेज रहे हैं। शतरंज की बिसात फिर से बिछी हुई है , शकुनि अपनी चल चल चुके हैं। विदुर समझ गये हैं अब सच और ज्ञान की निष्पक्षता की बात कहना मुसीबत को आमंत्रित करना है। युद्ध जारी है दोनों तरह से हाथ में काठ की तलवार लिये ललकार रहे इक दूजे को वार करने का साहस किसी में नहीं है। बस जनता को दिखाना है कि युद्ध हो रहा है , मगर मन ही मन चिंतन चल रहा चुनाव के बाद की राजनीति को लेकर। जीत दोनों की और हार देश की जनता की होगी ये तो पहले से तय किया जा चुका है। 

Thursday, 23 February 2017

गधों का अखिल भारतीय सम्मेलन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

सभी गधे ख़ुशी से झूम रहे हैं गा रहे हैं , अपना  राग सुना रहे हैं। भाई हम लिखने वाले तो हमेशा से समझा रहे हैं , हर साल पहली अप्रैल मना रहे हैं। खुद को गधा कहला रहे हैं , गधों की शान बढ़ा रहे हैं। मगर हम लेखकों की बात सभी हंसी में उड़ाते रहे , हमें गधा समझते और उल्लू बनाते रहे। जब प्रधानमंत्री जी ने गदहों का गुणगान समझाया और उनको अपना आदर्श बताया तब सब को हर गधा याद आया। बस इसी बात से देश क्या विदेश तक का हर गधा इतराया इसलिये उनको सम्मानित करने को है अखिल भारतीय गधा सम्मेलन दिल्ली में बुलाया। भाई मुझको है राजधानी जाना , आप भी गधे हैं चले आना मत शर्माना। गधों की महिमा का कोई आर-पार नहीं है , गधा न हो जिस जगह कोई घर गली गांव शहर कोई चैनेल कोई अख़बार नहीं है। इक महान हास्य रस के कवि कहते हैं लोकतंत्र गधों का शासन है , घोड़ों को मिलती नहीं है घास और गधे खाते हैं चव्वनप्राश। राजनीति ने गधों से बहुत सबक पहले भी सीखे हैं , गधे सा रेंकना दुलत्ती झाड़ना और सब मिल एक सुर में गाना , अपने को जनसेवक बताना , कभी किसी गधे को बाप तो कभी बाप को भी गधा बनाना। सत्ता सुख मिलता है इसी कला से , कोई आदमी जिये या मरे अपनी बला से। इस देश का वोटर समझदार कहलाता है मगर वोट देने के बाद धोबी का गधा बन जाता है , न इधर का न उधर का रहता है , हर बार पछताता है।
                 कभी कभी हमारे देश में प्रशासनिक निर्णय देख लगता है इन्हें करने वाले ज़रूर गधे होंगे , कई बार दिलचस्प बात होती है जब कोई मंत्री अपने सचिव से पूछता है इस फाइल में लिखा ये फैसला किस गधे ने लिखा था। और सचिव आदरपूर्वक जवाब देता है श्रीमान आपने ही किया था ये महान कार्य। दफ्तर का चपरासी क्लर्क को क्लर्क बड़े बाबू को बड़े बाबू अधिकारी को आम तौर पर गधा ही समझते हैं। जब प्रधानमंत्री जी देश को बता रहे हैं कि वो दिन रात बिना आराम किये आपके काम किये जा रहे हैं तब उनको पता नहीं शायद वो हम देशवासियों पर कितनी बड़ी तोहमत लगा रहे हैं। क्या जनता को बेरहम ज़ालिम बता रहे हैं , अपराधी ठहरा रहे हैं। हम यूं ही नहीं कुछ कहते आपको देश के नियम कायदे कानून बता रहे हैं।
         सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की इक पुरानी अधिसूचना की याद दिला रहे हैं। जिस में गधों के लिये लंच ब्रेक , ड्रिंक ब्रेक , काम के आठ घंटों का नियम , छुट्टी का नियम ही नहीं , दिन में 4 5 किलोमीटर से अधिक नहीं चलाना , सूरज निकलने से पहले और डूबने के बाद काम न लेने की सीमा , आंधी बरसात और उमस भरे मौसम में विश्राम , यहां तक कि प्रसूति के अवकाश का भी प्रावधान है। गधों  को अब उनके मौलिक अधिकारों की जानकारी मिलनी ही चाहिए। ये सब उनकी भाषा में उनको बताया जाना ज़रूरी है। आम नागरिक को भले सरकार जीने के अधिकार नहीं दे सकती ,गधों को न्याय मिलना ज़रूरी हो गया है , जब चुनाव में गधों का शोर है। गधे वोट डाल नहीं सकते दिलवा तो सकते हैं , अगली सरकार गधों के हित का ध्यान रखने वाली हो तो बुरा क्या है।
                        हास्य अभिनेता जानीवाकर बड़े दूरदर्शी थे , उन्होंने बहुत पहले अपने गधे को गधों का लीडर घोषित कर बताया था।  मेरा गधा गधों का लीडर कहता है कि दिल्ली जाकर सब मांगे अपनी पूरी करवा कर आऊंगा , नहीं तो घास न खाऊंगा। मगर मुंबई और दिल्ली का रास्ता बहुत लंबा है , उनका गधा अभी तक पहुंचा नहीं।  शायद उसी ने राह में अपनी बात बता दी हो प्रधानमंत्री जी को , हो सकता है अब सम्मेलन में वही अध्यक्ष घोषित हो जाये। मुश्किल बहुत है इतने कड़े नियम 4 5 किलोमीटर दिन भर में चलना , ड्रिंक और लंच ब्रेक और सब के साथ राह पर लाल बत्तियां , बिना प्रयोजक कैसे बात बनेगी।  क्या इस चर्चा से कोई प्रयोजक मिलेगा , जो सब बेचना चाहता देसी गधे को अम्बेसडर बनाकर। गधों  को दिल्ली पुलिस अनुमति देगी विरोध प्रदर्शन की या धारा 1 4 4 लगा देगी कौन जानता है। नियम है रस्सी बांधने  से पहले कपड़ा या कुशन बांधना होगा , इसका भी महत्व है सरकारी काम काज कछुआ चाल से होते हैं रस्सी में ढीलापन चाहिए मनमानी करने को। सवाल बाक़ी छोड़ दिया गया है कि गधों के लिए घास का प्रबंध कौन करेगा। गधों के मालिक पर छोड़ना उचित नहीं है , सरकार को चारा घोटाले की जानकारी का उपयोग कर इसका हल भी खोजना चाहिए था।
         इस कथा का अभी अंत नहीं हुआ है , थोड़ा विराम लेते हैं।  

Tuesday, 21 February 2017

तस्वीर भारत की सच इंडिया का - डॉ लोक सेतिया

हम बुद्ध को गांधी को मानते हैं , ऐसा कहते हैं। हम धार्मिक होने का भी दम भरते हैं। हम शांति के पुजारी हैं वासुदेव कुटुम्भ को आदर्श मानते हैं। मगर अंतरराष्ट्रीय विश्व संगठन के वास्तविक आंकड़े हमारा सच बताते हैं। संसार में सब से अधिक उन्नीस करोड़ लोग जो रात को भूखे सोते हैं वो इसी भारत महान के बदनसीब हैं , जिस के राजनेता रोज़ करोड़ों रूपये के फूलों से सजे मंच से गरीबों की बात करते हैं। शायद इस से विचित्र सिथ्ति कुछ नहीं हो सकती , जनता का धन पानी  की तरह बहाकर आप दावा करें गरीब की भलाई या उसके दुःख दर्द समझने का। इसी के साथ एक तथ्य और भी है कि भारत विश्व में हथियार खरीदने वाला सब से बड़ा खरीदार है और अमेरिका हथियार बेचने और बनाने वाला सब से बड़ा सौदागर। अमेरिका किसी का दोस्त नहीं ये कोई राज़ की बात नहीं है , उसकी दोस्ती सिर्फ और सिर्फ अपने मतलब को और फायदा उठाने की है। मगर बात इतनी होती तो भी ठीक था , बात उनकी भी है जो धर्म जनकल्याण और दान पुण्य की बात करते हैं। इन जगहों पर धन दौलत के अंबार जमा हैं , सोने चांदी से सजाया गया है , उपदेश दिये जाते हैं सच्चा धर्म दीन दुखियों  की सेवा है। रोज़ इनकी सजावट भी फूलों से होती है , खूब भीड़ जमा होती है और आडंबर किया जाता है भगवान की पूजा अर्चना इबादत सतसंग जाने क्या क्या। और सब से अधिक भिखारी इन्हीं के दरवाज़े के बाहर हाथ पसारे दिखाई देते हैं , भीतर लाखों करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाने वाले इन को चंद सिक्के भी खैरात में डालते है तो हिकारत से देख कर। सारा सुना उपदेश बाहर निकलते जाने कहां चला जाता है।
        इधर चुनाव में गदहों ( गधे ) की बड़ी चर्चा हुई , टीवी वाले बता रहे कि गुजरात में उनसे कितनों की भलाई हुई है।  मगर मुझे कुछ और बताना है , जो शायद आपको ध्यान नहीं हो या पता ही नहीं हो। जिस संसद ने आज तक आम इंसानों की खातिर कोई नियम कायदा नहीं बनाया कि देश के हर नागरिक को क्या क्या मिलना ही चाहिए , उसी संसद ने वाजपेयी जी के काल में कानून बनाया था जो आपको यकीन हो या नहीं भी हो आज भी लागू है। और शायद किसी गधे ने किसी थाने में कोई शिकायत भी दर्ज नहीं करवाई है कि उसको न्याय मिलना चाहिए। कानून है कि जो भी कुभ्हार या धोबी या कोई भी गधे का मालिक है , वह गधे से दिन में आठ घंटे से अधिक काम नहीं ले सकता , उसको इस तरह जंजीर से नहीं बांध सकता कि वो चल नहीं सके। उसको नियमानुसार खिलाना भी मालिक का कानूनी फ़र्ज़ तो है सप्ताह में एक दिन विश्राम भी देना होगा। आपने सुना कभी ऐसा कोई कानून गरीबों के लिए बनाया सरकार ने। उस में लेबर इंस्पेक्टर की तरह इक अधिकारी भी नियुक्त करने की बात है , ज़रूर देश के हर दफ्तर में कोई गधा कल्याण अधिकारी होगा जो अपना काम फायलों पर नियमित करता भी होगा। अगर आप भी गदहा प्रेमी हैं तो ये आपके मतलब की सूचना है , चाहें तो सूचना के अधिकार का उपयोग कर सरकार से सवाल पूछ सकते। कितना बजट इसका बना और कैसे खर्च किया गया।  कोई घोटाला नहीं है।

Monday, 20 February 2017

देश का स्वर्णिम इतिहास ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

लिखना है इतिहास देश का आज़ादी से लेकर अब तक ,
क्या क्या शामिल करना होगा यही सोचते भी कब तक ,
सरकारी गैर-सरकारी सभी आंकड़ें जुटा लिये हैं मैंने ,
बात देश की जनता की पहुंचेगी लेकिन ये रब तक।
दो सौ गुलामी में भी इक साहस था इक हिम्मत थी
सब को था मालूम हमने है आज़ादी उस से पानी
अपना सब न्योछावर करने को हर कोई राज़ी था
पर ये सब थी बात पुरानी मिली आज़ादी जब तक।
फिर सत्ता की चाहत ने राजनीति को था भटकाया ,
सब नेताओं ने मिलकर अपना इक संविधान बनाया ,
मालिक जनता को बेबस वोटर और भिखारी बना
सरकारों के नाम पे नेताओं की लूट को एहसान बताया।
हर दीवार पर लगे हुए हैं अब सरकारी इश्तिहार यही ,
सब से अच्छा मुल्क यही संविधान यही सरकार यही ,
नेता अफसर सब अपने उनके सब है बस उनकी खातिर ,
जनता की फटी हुई झोली में बचती नहीं खैरात यही।
आज बतायेंगे हम सबको चले कहां से कहां आये हैं ,
धर्म की दुकानें हैं जैसे लंबे शाम के होते साये हैं ,
शिक्षा का भी बाज़ार सजा है बिकती है महंगे दामों ,
समाज सेवा और स्वास्थ्य सेवाओं को लूट बनाया है ,
गुलामी से बदतर है जो अच्छे दिन ले आये हैं।
मत देखों सड़ता अनाज सरकारी गोदामों में आप ,
मरते हैं भूखे बेशक लोग रोज़ दरबार लगाओ आप ,
झूठे वादों के भाषण देकर सबको भरमाओ आप ,
आम आदमी है गरीब देश का मौज मनाओ आप।
सबको मोबाइल फोन मिला लो कर लो बातें जी ,
सोशल मीडिया पे दिन भर वक़्त बिताओ नाकारा ,
मत देखो क्या हाल देश की जनता का क्या हमारा ,
देखो फ़िल्में कितना कमाती रोता संगीत बेचारा।
बड़ी बड़ी बातों से किस किस को बहलाओगे ,
अपने मुंह मियां मिट्ठू कब तलक कहलाओगे ,
योगी का भेस बनाकर भोगी जैसे काम सभी ,
सोचो सोचो बाबा जी सोचोगे जब शर्माओगे।
विश्व समानता दिवस पर पता चली है बात हमें ,
उजियारे का नाम देकर दी है काली रात हमें ,
दस बीस प्रतिशत अमीर आधी जनता है फकीर ,
आपकी रैलियां बदल सकती नहीं कोई तकदीर।
सब नेता सत्ता के भूखे हैं नहीं कोई भी जननायक ,
भरी सभा में हंसते थे शैतान फिल्मों में खलनायक ,
सभी का अभिनय राम पात्र का मन है रावण जैसा ,
कोई इनसे बचे किस तरह नेता सारे दुखदायक।
पुलिस को भोली जनता लगती है जैसे चोर है ,
अपराधियों से उनका पक्का जो गठजोड़ है ,
नेता सब निर्वस्त्र हुए हैं खुद को सुंदर दिखलाने में ,
भगवान बचालो इनसे हमको सुनाई देता शोर है।
जिसको भोर घोषित किया गया वो इक काली रात है ,
कालिख से लिखा हुआ कहते स्वर्णिम इतिहास है।
                   (  डॉ लोक सेतिया )

Wednesday, 15 February 2017

और इस तरह देशभक्त हो गया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                                  हम सभी खुद को कैसा समझते हैं , क्या अपने आप को कभी आईने में तोलते हैं। कल मुझे एक लेखक की भेजी पुस्तक मिली , जिस में खुद उनकी एक भी रचना नहीं थी। मैंने पहली बार इस तरह की किताब पढ़ी जिस में इतनी विविधता थी , दो शहरों की बात , कुछ मंदिरों , इमारतों की बात और बहुत ऐसे लोगों की भी बात थी जिन्होंने जीवन में कुछ हटकर तमाम कार्य किये। सोचा ये सब पढ़ने और याद करने का अर्थ क्या है। मुझे लगा इन सभी से हमें स्पष्ट रूप से परिभाषायें समझ आती हैं। बस उसी को आधार बना कुछ निष्कर्ष निकालने की कोशिश की है।
                          आप नेता हैं राजनीति करते हैं , अगर देश जनता की भलाई नहीं केवल सत्ता हासिल करना ही आपकी चाहत है आदर्श है तो इस में देशभक्ति कहां है। आपने देश और समाज के नैतिक मूल्यों का पालन किये बिना किसी भी तरह चुनाव जीत लिया तो आप कानून और संविधान की अवहेलना करने वाले अराजक तत्व हैं जो शासक बन अन्याय और लूट ही कर सकते हैं। बड़े  से बड़े पद मिलने पर भी आपने अगर सच्ची निष्ठा और ईमानदारी से देश और राज्य में निष्पक्ष शासन नहीं दिया , लोकहित की नहीं दलहित परिवारहित की ही चिंता की तब आप देशभक्त कैसे हैं। अगर देश या राज्य के कोष का एक भी पैसा आपने व्यर्थ बर्बाद किया जिस से जनता का कुछ भी कल्याण नहीं हो सकता तब आप अच्छे शासक नहीं हैं। और अगर जनता का धन अपनी सुख सुविधा पे खर्च करते हैं जब लोग गरीब हैं भूखे हैं तब आप अमानत में खयानत के दोषी हैं।  जिस शासन में जनता को न्याय बुनियादी हक सुरक्षा और निडर होकर जीने का बराबरी का अवसर नहीं मिलता उसकी पुलिस प्रशासन न्यायपालिका सभी अपना कर्तव्य निभाने में असफल ही नहीं देश और समाज के अपराधी भी हैं। किसी आम आदमी को मरने तक न्याय नहीं मिलना , बिना अपराध जेलों में ज़ुल्म सहना और धनवान और ख़ास लोगों के अपराधों की सज़ा उनके जीवन काल में नहीं मिलना और उनकी मौत के बाद फैसला सुनाना सज़ा का ये न्याय नहीं न्याय व्यवस्था का उपहास है।
               बात केवल नेताओं और प्रशासकों की नहीं है , आप अगर डॉक्टर हैं लेकिन आपका मकसद रोगियों की सेवा या उपचार से अधिक पैसा बनाना है और उस के लिये आप तमाम गलत तरीके अपनाते हैं। तब आप अपने देश समाज और पेशे के प्रति ईमानदार नहीं बल्कि गुनाहगार हैं। देशभक्त तो कदापि नहीं। शिक्षक बनकर शिक्षा का व्योपार करने वाले तो अज्ञानी हैं जो खुद भटके हुए किसी दूसरे को सही दिशा नहीं दिखला सकते। कारोबार भी कुछ नियमों का पालन कर किया जाता है ईमानदारी से , बहुत अधिक मनमाने दाम वसूलना मुनाफाखोरी करना लूट होता है व्योपार नहीं। साहित्यकार लेखक और पत्रकार भी अगर सच की बात नहीं करते और अपने नाम शोहरत पैसा पुरुस्कार की चाह में दरबारी या फिर व्योपारी बनकर फायदा उठाते सच को गलत ढंग से प्रस्तुत कर तब उनका गुनाह अक्षम्य है। चौकीदार हैं आप रखवाली करनी है आपने , खुद को न्यायधीश या थानेदार न समझें।
                       देश के हर नागरिक को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। केवल नेताओं की बुराई की बातें करना काफी नहीं है। सोशल मीडिया पर संजीदा बातों को उपहास या मनोरंजन की बात बना देना भी अनुचित है , क्यों  नहीं सोचते आपका देश है आपको उसको बेहतर बनाना है जतन करके।  क्या आप देश के नियमों का पालन करते हैं , सोचते हैं आपने देश को या किसी नागरिक को कोई नुकसान नहीं देना। हो सके तो किसी को कुछ फायदा पहुंचना जनसेवा करके देशसेवा कर तभी देशभक्त हैं।  खाली बातों से देश प्रेम नहीं होता है। आज पर्यावरण की हालत देश की और खराब होती जा रही हर साल चालीस प्रतिशत बढ़ रहा प्रदूषण। देश में बीस लाख लोग इसी से मरते हैं हर सेकिंड बीस लोग। पेड़ काटना , वाहनों का धुवां , उद्योगों का धुवां - अन्य गंदगी से धरती और जल का प्रदूषित होना। सीमेंट की ऊंची बहुमंज़िला इमारतें बनाने में प्रदूषण ही नहीं धरती और धरती के नीचे के जल का गिरता स्तर। कौन कौन दोषी है। हर कोई समझता है चर्चा करता है मगर खुद भी किसी न किसी तरह शामिल है देश की बदहाली बर्बादी में। औरों पर सब आरोप लगा मैं देशभक्त नहीं हो गया।


Tuesday, 14 February 2017

चलना तो है ( कविता ) भाग - दो डॉ लोक सेतिया

अकेला हूं मैं
नहीं साथ कोई
राह कठिन है
हमसफ़र कोई नहीं।
तुम भी अगर
मेरी तरह हो अकेले
मुझे अपना बना लो
आ जाओ मेरे पास
या मुझको बुला लो।
पर सोच लेना
क्या निभाना है साथ
हमेशा पूरी डगर साथ रहकर
वह ही ये जान कर कि
जीवन के लंबे सफर में
आराम करने को रुकने को
नहीं आती कोई मंज़िल
कभी कहीं ठहरने के लिए।
बस चलते जाना है निरंतर
चलते ही जाना
चलना तो हर हाल ही होगा
चाहे चलो अकेले-अकेले
या साथ साथ बन हमसफ़र
साथ निभाने को ऐ साथी।

Monday, 13 February 2017

वास्तविकता ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

               रचना जब तक रोग-ग्रस्त रही , सुरेश रात-दिन उसके पास रहा देखभाल को , तभी इतनी गंभीर दशा से निकल कर फिर से पूरी तरह स्वस्थ हो सकी। आज दोबारा वही सवाल रचना के मन में आया और उसने सोचा आज साफ साफ पूछ ही लेती हूं। वो सुरेश से बोली क्या अभी भी तुमको नहीं लगता कि मैं ही वही लड़की हूं जिस से तुम्हें बहुत पहले ही विवाह कर लेना चाहिए था। सुरेश ने जवाब दिया , रचना मुझे तुमने इक बात कही थी बहुत साल पहले , मुझे आज भी याद है तुम भी भुला नहीं पाई होगी उस बात को। रचना ने कहा बिल्कुल याद है , मैंने यही कहा था सुरेश मैं तुम से अथाह प्रेम करती हूं , अगर शादी करूंगी तो सिर्फ तुम्हीं से। सुरेश ने याद दिलाया हां ये तो कहा था मगर इक बात और भी तुमने कही थी , कि अगर मैंने तुझे छोड़ किसी और लड़की से शादी की तो तुम जान दे दोगी। रचना बोली कही थी ये भी बात क्योंकि नहीं जी सकती तुमसे बिछुड़ कर , लेकिन तुमने नहीं बताया कि तुम मुझ से नहीं तो और किस से शादी करना चाहते हो। सुरेश ने कहा देखो रचना तब भी मैंने तुमसे यही कहा था कि हम बचपन के दोस्त हैं लेकिन मेरे मन में कभी तुम्हारे प्रति वो भावना नहीं आई कि मुझे तुम्हीं से विवाह करना चाहिये। बेशक मुझे और भी किसी लड़की से प्यार का कोई एहसास नहीं हुआ , मगर तुमने तब खुद कहा था कि तुम उस दिन का इंतज़ार करोगी जिस दिन मेरे दिल में भी वही भावना पनपेगी कि मुझे सिवा रचना के किसी से शादी नहीं करनी है। हम दोनों में कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ , कोई अनबन नहीं मतभेद नहीं , तुम में कुछ भी कमी भी हर्गिज़ नहीं है , फिर भी मुझे नहीं पता क्यों मुझे उस तरह का एहसास हुआ नहीं जो तुम चाहती थी और चाहती हो आज भी। रचना आज जब हम दोनों पचास साल से अधिक आयु के हो चुके हैं , अकेले अलग अलग रहते भी अच्छे मित्र बने हुए हैं , तब मुझे फिर से पुराना सवाल अनावश्यक लगता है। मगर क्योंकि तुम्हें ये सवाल बेचैन करता रहता है तो हमें इसका उत्तर तो खोजना ही होगा। रचना क्यों न हम अपने गुरु जी से इस बारे चर्चा करें , वो इन दिनों यहीं आकर ठहरे हुए हैं थोड़े दिन को। रचना ने कहा सही बात है , तुम जाकर मिलो गुरु जी से और उन से अकेले में मिलने का समय ले सको तो मैं साथ साथ चल कर उन्हीं से पूछना चाहती हूं , शायद वही मेरी दुविधा को दूर कर सकते हैं।
                     सुरेश ने जब गुरु जी को बताया कि रचना तंदरुस्त नहीं है और आपसे मिलना भी चाहती है , तब वो स्वयं ही शिष्या से मिलने और उसका हालचाल पूछने चले आये रचना के घर। रचना की तबीयत की बात जानने के बाद गुरु जी बोले , बताओ बेटी आपको क्या पूछना है मुझ से। रचना ने तब अपने और सुरेश के बारे सब कुछ बताकर पूछा , गुरु जी मैंने इतने साल तक इंतज़ार किया है , तब भी सुरेश के दिल में अपने लिए प्यार क्यों नहीं जगा पाई। गुरु जी ने रचना से पूछा , बेटी क्या तुम मानती हो कि तुम सुरेश से सच्चा प्यार करती हो , जबकि सुरेश के मन में वो भावना नहीं है। रचना ने जवाब दिया गुरु जी मुझे तो यही लगता है। गुरु जी बोले बेटी तुम्हारा विचार सही नहीं है। मुझे लगता है सुरेश ही है जो तुम से सच्चा अटूट और अथाह प्यार करता है , तभी उस ने तुम्हारी ख़ुशी को समझ कहीं और विवाह की बात सोची तक नहीं , इस डर से कि तुम कुछ अनर्थ नहीं कर बैठो। तुम शायद आकर्षित रही हो सुरेश के प्रति , उसको पाना भी चाहती हो , मगर प्रेम कभी विवश कर हासिल नहीं किया जाता है। बहुत मुमकिन है अगर तुमने कोई शर्त नहीं रखी होती अपनी जान देने  की , और कहती सुरेश तुम्हें जिस किसी से भी शादी करनी हो कर लेना , मुझे किसी दूसरे से नहीं करनी फिर भी तुम्हारी ख़ुशी में खुश रह लूंगी अकेली रह के भी। तब मुझे लगता है सुरेश खुद ही तुम से कह देता मुझे तुम से अच्छी लड़की कोई नहीं मिल सकती। जैसा तुम मानती रही हो रचना , वास्तविकता उस के विपरीत है। जितना प्यार सुरेश के मन में है तुम्हारे लिए , तुम्हारा प्यार उसके लिए उसके सामने कुछ भी नहीं। रचना बेटी तुमने प्यार को समझा भी नहीं जाना भी नहीं , आज रचना को पहचान हो गई थी प्रेम  की। सुरेश ही नहीं रचना भी समझ गई थी वास्तविकता।

Saturday, 11 February 2017

इक ईमानदार की मौत ( आलेख-विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

कुछ भी काल्पनिक नहीं , केवल सच। इक ईमानदार मर गया। बस इतनी सी बात है कोई खबर नहीं। पर क्यों और कैसे मरा पता चला तो लगा ये तो देश की वास्तविकता दिखाती कहानी है। बहुत साल पहले इक सरकारी विभाग में नौकरी करता था , कभी कुछ भी अनुचित नहीं किया। बहुत बार ऊपर के अधिकारी चाहते तब भी गलत काम नहीं कर पाते क्योंकि वह इक बाधा बन बीच में आ जाता था। उसको नहीं मालूम था बड़े अधिकारी उसको नापसंद करते हैं ईमानदार होने के कारण। उसको पीलिया रोग हो गया कुछ दिन इलाज हुआ छुट्टी लेकर , जब डॉक्टर ने उसको स्वस्थ बता दिया तब विभाग के बड़े अफ्सर ने और छुट्टी देने से मना कर दिया। उसे दफ्तर जाना ही पड़ा , मगर क्योंकि बिमारी से बहुत कमज़ोरी महसूस कर रहा था , इसलिये उसके सहयोगियों ने वहीं रखी चारपाई पर लेटने को कह दिया आराम करने को। तभी ऊपर के बड़े अधिकारी वहां आ गये थे और उसको सोता देखकर शराब पीकर लेटने का इल्ज़ाम लगा उसको निलम्बित कर दिया। वास्तव में उसने शराब का कभी सेवन किया ही नहीं था। उसने नोटिस मिलने पर जो बात सच थी लिख दी जवाब में , ये भी कि वो शराब नहीं पीता और ये आरोप झूठा और निराधार है। जब सेवा पर बहाल नहीं किया गया तब उसको न्याय पाने अदालत जाना पड़ा और अदालत ने उसकी बात को सही पाया दफ्तर के ही बाकी लोगों की गवाही और डॉक्टर के भी शराब नहीं पीने की बात को सही बताने पर। मगर बड़े अधिकारी अदालत के निर्णय के खिलाफ ऊपरी अदालत जाते गये तीस साल तक चुनौती देते और वो मरने तक इंसाफ होने का इंतज़ार ही करता रहा। उसके सेवानिवृत होने की उम्र बीत चुकी थी सालों पहले मगर उसे पेंशन कभी नहीं मिली , अभी फैसला आना बाकी था मगर मौत ने अपना फैसला पहले सुना दिया।
                  ये कहानी इतनी ही नहीं है , अभी असली बात बाकी है। वो शख्स इस सब को नियति समझ जी ही रहा था , अचानक कुछ दिन पहले उसको बताया डॉक्टर ने कि आपके हृदय का ऑपरेशन करना होगा। उसका पुत्र विदेश में नौकरी करता है वो आया और अपने पिता का ऑपरेशन दिल्ली के इक हॉस्पिटल से करवा वापस चला गया। लेकिन थोड़े दिन बाद उसको रात को सांस लेने में तकलीफ होने पर जब उनके अपने शहर में एक हॉस्पिटल ले गये तब जांच में पता चला कि ऑपरेशन करते समय उसको इंफेक्शन हो गया था और फिर ऑपरेशन की ज़रूरत है। दो लाख पहले जमा कराओ तब इलाज होगा , आधी रात को आजकल जब नोट बंदी की वजह से आप बैंक से भी नहीं निकाल सकते दिन में भी , रात को नकद राशि का प्रबंध करने में समय तो लगना ही था। जब तलक पैसे जमा करवाते वो शख्स ज़िंदा ही नहीं रहा , सरकार हैरान होती है जब हमने वादा किया हुआ है सब ठीक होने का फिर लोग कैसे बेवजह मर जाते हैं। पर लोग क्या करें जब ज़िंदगी नहीं मिलती मौत को गले लगाना ही पड़ता है। नोट बंदी में जो मरे उनके नाम पता होंगे कुछ लोगों को , ख़ुदकुशी करने वालों की भी पुलिस लिखती है एफ आई आर , मगर ऐसे लोग मरे कत्ल हुए या मरने को विवश कोई नहीं बता सकता। होनी प्रबल है कहकर सब बरी हो जायेंगे , किसी को कोई अपराधबोध तक नहीं होगा , जिन्होंने इक छोटी सी गलती सरकारी दफ्तर में खाट पे लेटने की को शराब में धुत होने का झूठा इल्ज़ाम लगा कर नौकरी से निकलवाया , अथवा जिस विभाग ने तीस साल तक न्याय होने नहीं दिया , कोई भी खुद को मानवता का दोषी नहीं मानेगा। शायद ऐसा पहली बार आपने भी देखा सुना होगा। मैं दो ऐसे लोगों को जानता हूं जिनको कभी वास्तविक दोष के कारण हटाया गया सरकारी नौकरी से और बाद में बहाल कर दिया गया।
        चालीस साल पुरानी बात है , इक पी डब्लयू डी के जेई को विभाग का सामान का गबन करने पर हटा दिया गया। दो साल तक घर बैठे आधा वेतन लेते रहे , दो साल बाद उनके इक मित्र विभाग में में एस डी ओ के पद पर उसी ऑफिस में आये तो उनको खुद पत्र भेजकर बहाल होने की जानकारी दी , उनसे कहा गया कि आप तीस हज़ार विभाग को राशि का भुगतान करें जिस का सामान गायब मिला था। कमाल की बात ये हुई थी कि उन्होंने तीस हज़ार भरने को दोबारा नौकरी में जाते ही तारकोल बेच उस पैसे का प्रबंध किया था। ऐसी इक और घटना भी है। इक डॉक्टर जिस जगह नियुक्त था नौकरी करना नहीं चाहता था अपने घर से दूर , बिना त्यागपत्र दिये चला आया और निलंबित कर दिया गया। उसने अपने शहर अपनी निजि प्रैक्टिस कर ली। बीस साल तक चलता रहा इसी तरह , फिर इक जान पहचान के नेता के मंत्री बनते उसको केवल नौकरी पर वापस बहाल ही नहीं किया गया बल्कि पिछले सालों का सारा वेतन लाखों रूपये भी मिल गये।
        जिस देश  में दोषी बच जाते हों , और निर्दोष सज़ा भोगते भोगते दुनिया से अलविदा हो जाते हों , उसकी व्यवस्था को क्या कहा जा सकता है। मुझे  इक पंजाबी गीत याद आ रहा है।
                          सच्चे फांसी चढ़दे वेखे , झूठा मौज मनाए ,
                        लोकी कहन्दे रब दी माया , मैं कहन्दा अन्याय।
                        की मैं झूठ बोल्या , की मैं कुफ्र तोल्या , कोइना भई कोईना।  

Thursday, 9 February 2017

कलयुग का अच्छा नामकरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

सरकार को कलयुग नाम काले धन की तरह लगता है इसलिये गुप्त ढंग से प्रभु से सीधी मन की बात करने का तरीका खोज ही लिया गया। अब क्योंकि प्रभु को संदेश ही यही भेजा गया था कि सरकार केवल भारत देश ही नहीं पूरे विश्व में स्वच्छता अभियान से लेकर अपनी हर योजना को पहुंचाना चाहती है ताकि सब के दुःख-दर्द खत्म हो सकें तो प्रभु इनकार नहीं कर सके। उत्सुक थे भारत की सरकार की कौन सी ऐसी योजना है जो वो कर सकती है जो खुद प्रभु नहीं कर पाये अभी तक उसको जानने समझने को। सरकार इक प्रस्ताव लिखित में लाई थी जिस में अनुरोध किया गया था कलयुग का नाम बदलने को , क्योंकि घोटाले शब्द की तरह कलयुग भी बेहद बदनाम हो चुका है और सरकारी दल अगला चुनाव इसी को लेकर लड़ना चाहता है कि हमने कलयुग का अंत कर सतयुग ला दिया है। प्रस्ताव को समझ प्रभु ने कहा आपका विचार तो शुभ है और सतयुग का आगमन हो भी सकता है , मगर उस में कुछ भी छुपा नहीं होगा। आप कुछ करते कुछ कहते और सोचते कुछ और हैं तो आपको कठिनाईयां झेलनी पड़ेंगी। सब जनता की आमदनी ही नहीं खुद अपने चंदे की पाई पाई का हिसाब साफ रखना ही होगा , खासकर झूठी शपथ , झूठे वादों  की जो परंपरा आपकी रही है हर जगह उसी से बहुत भयानक परिणाम सामने आएंगे और आपकी मुश्किलें बढ़ाएंगे। झूठी शपथ लेते ही प्राण पखेरू उड़ जाएंगे , वादा नहीं निभाया तो आप जी भी नहीं सकेंगे और आपको मौत भी नसीब नहीं होगी। वास्तव में सतयुग लाने की खातिर आप जितने भी कलयुगी प्रवृति के लोग हैं उनका विनाश प्रलय द्वारा करना होगा। सब से महत्वपूर्ण ये है कि सतयुग में आपका ही शासन हो ये असंभव होगा। अब बतायें आपको वो सतयुग चाहिए जिस में कोई दूसरा शासक हो आपकी जगह।
                   ऐसा है तो ये रहने दो मगर कोई दूसरा विकल्प हो तो बतायें , हमें निराश वापस नहीं भेजें। जिस में कलयुग का अंत तो हो मगर शासन मेरा इस ही नहीं अगले कार्यकाल भी चलता रहे। तब आपको मेरे त्रेता युग के अवतार श्री राम जी से जाकर विनती करनी चाहिए , शायद वो फिर दोबारा अवतार लेने को राज़ी हो जायें तब त्रेता युग लाया जा सकता है। जैसे ही श्री राम जी को जानकारी मिली कि ये लोग उसी दल से संबंधित हैं जो राम मंदिर बनाने की बात किया करता था तो उनहोंने सरकार से मुलाकात करने तक से मना ही कर दिया। कहा मुझे ऐसे भक्तों से डर लगता है जिनके लिये मैं इक मोहरा हूं राजनीति का। जब श्री राम जी नहीं मिले तो श्री कृष्ण जी याद आये , किसी तरह उनसे मिलने का रास्ता निकाल ही लिया। चलो सतयुग त्रेता युग न सही द्वापर युग भी हो तो क्या बुरा है। श्री कृष्ण थोड़ा ध्यानमग्न होकर सोचने समझने लगे और जान गये इनका अभिप्राय क्या है , सतयुग नहीं , त्रेता युग भी नहीं तो द्वापर ही सही। क्या क्या समझौते करते हैं बिना विचारे , भला इनसे क्या निभेगी। श्री कृष्ण बोले मैं तो जब जब धरती पर अधर्म बढ़ता है आता ही हूं सब जानते हैं , मगर है कोई अर्जुन भी तो हो जिसका सारथी मुझे बनना है। अर्जुन दिखाई नहीं देता मगर कंस गली गली मिलते हैं और आपकी राजनीति तो दुर्योधनों से भरी पड़ी है। कितनी सभाओं में उन्हीं को गदा धनुष और तलवार तक भेंट की जाती रही है।  एक भी युद्धिठर भी नहीं कोई। किसको शासक बनाने को धर्मयुद्ध किया जायेगा , मुझे समझाओ तो। किस को मेरे ज्ञान की ज़रूरत है , आप सभी तो खुद को महाज्ञानी मानते ही हो। जिस तरह आपने हर अवतार को देवी देवता को हर धार्मिक ग्रन्थ को अपने मकसद को इस्तेमाल किया , अपनी सुविधा और मर्ज़ी से परिभाषित कर अर्थ का अनर्थ किया बार बार उस जानकर कोई अवतार कोई देवी देवता क्यों जाना चाहेगा धरती पर धर्म किसको कहते हैं ये समझाने। आप को क्या मालूम है जिन जगहों पर आप उपासना या दर्शन करने जाते हैं उन में कोई देवी देवता या अवतार रहता ही नहीं है। कोई दूसरे ही लोग हैं जो उनके नाम पर कारोबार करते हैं झूठा दावा और प्रचार कर के कि वो किस का मंदिर या कोई धर्मस्थल किसी भी धर्म का है। मुझे छलिया कहकर बुलाया जाता है मगर मैंने अपने स्वार्थ के लिए छल किया नहीं कभी किसी के साथ।
                         श्री राम जी और श्री कृष्ण जी से निराश होकर फिर सरकार प्रभु की शरण में आये तो प्रभु बोले अब मेरे बस में कुछ नहीं है जब कोई देवी देवता कोई अवतार तुमसे सहमत नहीं है। तब सरकार ने अपनी फाइल से इक नया प्रस्ताव सामने रख दिया , जो पहले से तैयार कर लाये थे अपनी आदतानुसार। प्रभु आप कलयुग को कोई और नाम दे दो अच्छा सा। प्रभु बोले ये है तो अजीब बात ही जैसे तुम राजनेता लोग सत्ता पाते ही पुरानी सरकार की योजना को अपनी पसंद का नया नाम दे देते हो , फिर भी इतना हठ बार बार नये नामकरण का करते हो तो जाकर घोषणा कर दो कि आगे से कलयुग को हठयुग कहकर बुलाया जायेगा। यही नाम उचित है आपको देखकर प्रतीत होता है , लेकिन ये समझ लो कि बाल हठ , स्त्री हठ , में कोई समस्या नहीं है पर राजहठ का परिणाम कभी कभी बहुत बुरा हुआ करता है। तुम अगर अपना हठ त्याग सको तो अच्छा होगा , अन्यथा किसी नये अवतार का धरती पर आना तुम्हारे लिये भी शुभ तो कदापि नहीं होगा।

Wednesday, 8 February 2017

अब अच्छे दिन आये हैं ( हास्य-व्यंग्य कविता ) 2 1 भाग तीन , डॉ लोक सेतिया

सुन लो  बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं ,
तिगनी का नाच नचाने को हमने , लंगड़े सभी बनाये हैं ,
अब सब का इक जैसा होगा , काले भी गोरे बन जायेंगे ,
अपने रंग में रंगना सब को , अपनी फेसक्रीम ले आये हैं।
मुर्दों की अब बनेगी बस्ती , ऐसी योजना बनाई है ,
हर घर लाशों हैं मिलती , भाई का कातिल खुद भाई है ,
अपने दल की टिकेट देकर , जितने अपराधी खड़े किये हैं ,
माननीय बन शरीफ कहलायें , इंकलाब क्या लाये हैं।
सुन लो बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं।
सब इश्तिहार हमारे देखो तुम , झूठे हैं या सच्चे हैं ,
हम सब छप्पन इंच के हैं अब , बाकी तो अभी बच्चे हैं ,
मत देखो जो कुछ भी बुरा है , तुम गांधी जी के बंदर हो ,
जो सत्ता कहती सच वही है , सच की परिभाषा बनाये हैं !
सुन लो बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं।

सत्ता के मद में हैं जनाब ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

शायद इसकी कल्पना किसी को नहीं थी जिस तरह से सत्ता अपने मद में चूर हर किसी को अपमानित कर रही है। बेशक जिन से सत्ता छीनी है जनता ने और आपको सत्तासीन किया है उन्होंने बहुत गलत किया था , जिस की राजनीतिक सज़ा उनको चुनाव में हार के रूप में मिली है। पर आप शायद भूल गये उनके अपकर्मों की सज़ा देने को ही आपको जिताया देश की जनता ने आप पर भरोसा कर के कि आप जनता की बदहाली को दूर करेंगे। पिछली सरकार के घोटालों की जांच और कानूनी सज़ा दिलवाना आपका काम है , मगर उसी तरह जैसे निष्पक्ष न्याय किया जाता है। मगर जिस तरह आप संसद में विपक्ष को निम्न स्तर की भाषा से अपमानित करने का कार्य कर रहे  हैं उस से खुद आपके भीतर का डर दिखाई देता है। कैसी विडंबना की बात है आप ऐसा करते हुए इतिहास और नीति की बात कर रहे हैं जब की खुद उसी का पालन नहीं कर रहे हैं। सुना तो आपने भी होगा जिस पेड़ पर फल लगते हैं वो झुकता है। किसी को अपमानित करना भले वो आपका विरोधी भी हो आपका गौरव नहीं बढ़ाता है। जब आपको संसद में सवालों के जवाब देने थे तब आपने संसदीय मर्यादा की चिंता छोड़ अपनी मर्ज़ी से जनसभा में अपनी बात रखी ताकि आप पर सच या झूठ कहने  के लिये किसी नियम में संसद में कोई करवाई  नहीं हो सके। आपने भाषणों  में जिसे चाहा काले धन का समर्थक घोषित कर दिया और ये साबित करना चाहा केवल आप और आपका दल ही सच्चा देशभगत व ईमानदार है। अदालत आपकी वकील आप न्यायधीश भी आप , ये कैसा लोकतंत्र है। आपने देश को जो वादे किये थे वो अभी तलक सच हुए लगते तो नहीं। आपने कहा इतिहास को पढ़ते रहना चाहिए मगर शायद आप खुद भूल गये देश का पुराना नहीं आज़ादी के बाद का इतिहास। जिसे बुरी तरह हराया जनता ने लोकतंत्र की रक्षा की खातिर , जब देखा नये शासक सत्ता का दुरूपयोग बदले की भावना से करने लगे तब उनको भी हटाकर फिर  से उसी को चुन लिया , पांच साल भी नहीं रही वो सरकार। आज आपको अगर खुद अपने कामों पर यकीन होता कि आपने सत्ता पाकर अच्छे काम किये हैं जिन से जनता खुश है तो आप अपने काम पर वोट मांगते , जब कि आज भी आप दूसरे लोगों की गलतियों की ही बात करते हैं भाषण में। क्यों नहीं कह सकते देखो मेरी सरकार ने वास्तव  में अच्छे दिन ला दिये हैं। क्योंकि आपकी घोषित की सभी योजनाएं उसी तरह भ्र्ष्टाचार और लालफीताशाही से असफल की जा चुकी हैं। आप हर बार रावण बताकर किसी को बुरा साबित कर भी लें तब भी आप राम हैं ये साबित नहीं हो सकता। कब तक आपको केवल इसी लिये सत्ता मिलती रह सकती है कि कोई दूसरा बुरा है। आप खुद कब अच्छे बनकर दिखाओगे।
                                इक कहानी है , इक बुरा आदमी शराबी जुआरी और धूम्रपान करने वाला होता है , दूसरा जो ये सब नहीं करता और खुद को शरीफ समझता है , अन्यायी और अत्याचारी साबित होता है , जब कि पहला अत्याचार को मिटाने वाला बन नायक कहलाता है। पहले की बुराईयां सिर्फ खुद उसी को नुकसान पहुंचा रहीं थीं जबकि दूसरे की सारे समाज को।

Tuesday, 7 February 2017

सत्ताधारी और विपक्षी दोनों समधी-समधी ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था , ये पुरानी कहावत कितनी सच है क्या पता। मगर दो दिन  से देश की संसद में लगता है शुद्ध मनोरंजन की बातें की जा रही हैं। होता है जब हमारे पास करने को कुछ नहीं होता तब हम गप शप करते हैं टीवी देखते हैं या पूरा दिन फेसबुक व्हाट्सऐप पर बेकार की बातों को ज़रूरी मान कर समय बिताते हैं। इक अजीब बात है समय नहीं है का बहाना बनाते हैं अक्सर जब कि समय सभी के लिए एक समान है चौबीस घंटे। समय तब नहीं बचता जब प्राण जाते हैं छूट , राम नाम  की लूट है लूट सके तो लूट , सुबह होते ही मंदिर से भजन कीर्तन सुनाई देता है। उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है , जो जागत है सो पावत है जो सोवत है सो खोवत है। तो संसद में बहस के नाम पर जनता की बदहाली की बातें  नहीं आपसी छेड़-छाड़ , ताने व्यंग्य , हास-परिहास चल रहा था। ठहाके लगा रहे थे शायद जनता की समझ पर हंस रहे थे किन नेताओं को मसीहा समझ उनकी जय जयकार करती है। किसे फ़िक्र है जनता की , जो देश में होता है होने दो , पहरेदारों को सोने दो , जनता रोती है रोने दो। तब होगा बचाव का काम शुरू घर बाढ़  को और डुबोने दो। आज समझ आया पक्ष और प्रतिपक्ष कोई दुश्मन या विरोधी नहीं हैं , इनका बहुत मधुर रिश्ता है समधी-समधी वाला हास उपहास छेड़-छाड़ वाला। बुरी  नहीं लगती आपसी बात , मेरे ताया जी कहते थे समधी को तो कोमल पुष्प की तरह रखते हैं। बड़ा ही नाज़ुक रिश्ता होता है , मगर आजकल दहेज और दिखावे की चाहत ने इस नाते में खटास ही नहीं कटुता भी ला दी है। सत्ता पक्ष विपक्ष भी सत्ता के मोह  में अंधे होकर संसद और लोकतंत्र की गरिमा को भूल गये हैं।
                        हर दल देश की सत्ता  को अपनी बहु समझता है , जिसे गरीब जनता ने उनको सौंप दिया है। किसी  को भी वो अपनी बेटी लगती ही नहीं। बहु के आंसू झूठे लगते हैं , उसकी तकलीफ बहाना , पता  नहीं नेताओं की अपनी बेटियां होती भी हैं कि नहीं। समधी लोग मिलते रहते हैं हर अवसर पर , मगर खुद को बेटी का पिता कोई नेता नहीं मानता , हर नेता बहु का ससुर ही समझता खुद को। अपने समधी की कमियां निकालना उसका मज़ाक बनाना असभ्यता नहीं समझा जाता , ये प्यार की लड़ाई है। इस सत्ताधारी और विपक्ष वाले नाते में दोनों तरफ से पिसती बेचारी जनता की बेटी है जिसे हर कोई बहु मानता सेवा करवाने को। बहु को घर की मालकिन कोई नहीं समझता। संसद विधानसभाएं जैसे सिनेमा हाल या पीवीआर हैं जहां राजनेता अभिनय करते हैं जनता को दिखाने को कभी झूठ मूठ बेटी के पिता बनकर तो कभी सच में बहु के ससुर का किरदार निभाते हुए। समय आ गया है अब आपको इक और कर भी चुकाना चाहिए , मनोरंज कर। बाकी जो आप देते रहते हैं सभी दल के नेताओं को वो तो आपको अपनी बेटी की ख़ुशी नहीं सुरक्षा की खातिर देना लाज़मी है।

Monday, 6 February 2017

ग़ज़ल 1 1 4 ( आया नहीं दाग अब तक छुपाना ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आया नहीं दाग अब तक छुपाना ,
मैली है चादर हमें घर भी जाना !
हम ने किया जुर्म इक उम्र सारी ,
बस झूठ कहना नहीं सच बताना !
सुन लो सभी यार मुझको है कहना ,
की जो  खताएं उन्हें भूल जाना !
मुझ से बुरा और कोई नहीं है ,
मैं खुद बुरा हूं भला सब ज़माना !
दस्तूर मेरा यही तो  रहा है ,
जीती लड़ाई को खुद हार जाना !
तुमने निकाला हमें जब यहां से ,
फिर ठौर अपना न कोई ठिकाना !
"तनहा" जहां छोड़ जाये कभी जब ,
सबको सुनाना उसी का फसाना !

Sunday, 5 February 2017

पीछे जो रह गये हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

                                           हर कारवां से कोई ये कह रहा है " तनहा "
                                           पीछे जो रह गये हैं उन को था साथ लाना।
मुझे अपनी ग़ज़ल का ये आखिरी शेर याद आया आज , जब इक टीवी शो पर देखा कभी एक साथ एक प्रतियोगिता में शामिल दो कलाकार इक मंच पर थे मगर एक निर्णायक की कुर्सी पर और दूसरा सालों बाद इक प्रतियोगी बन कर। सवाल प्रतिभा का नहीं है , सवाल किस्मत का भी नहीं है। सवाल अवसर मिलने का है और सवाल ये भी है कि काबलियत की पहचान से अधिक महत्व सफलता हासिल करने का है। ऐसे ही इक और टीवी शो में भी आज देखा , कल तक गांव के घर घर में काम करने वाली महिला का बेटा जब टीवी पर गा रहा तो तमाम गांव के लोग उसके  फोटो और नाम लिखी तख्तियां लेकर बार बार उसका नाम पुकार कह रहे हैं तुम ने गांव का नाम रौशन किया है। कौन जनता है यही लोग कल तक उसी को खुद से कितना छोटा समझते रहे हैं। मान लो अब वो शो का विजेता भी बन जाये मगर बाज़ार में सफलता नहीं हासिल कर सके तब फिर इन्हीं लोगों की नज़रें पहले की तरह दिखाई देने लगेंगी। सब इतनी तेज़ी से दौड़ भाग रहे हैं कि कोई ध्यान ही  नहीं देता कब कोई हमसफ़र किस जगह कैसे पीछे छूट गया कारवां से बिछुड़ गया। कभी बहुत देर बाद जब हमारे पास सब कुछ होता है मगर वो साथी नहीं होता जो अपना अकेलापन मिटा सकता था , तब समझ आता है उतना पाया नहीं जितना खोया है। इसलिए आज इक बात कहना चाहता हूं , हम मित्रता दिवस की बात करते हैं और बहुत संवेदना प्रकट किया करते हैं लेकिन बिछुड़ जाने पर कोई खबर ही नहीं रखते उसी मित्र की।  काश हम देशवासी यही सबक भूले नहीं होते कि अकेले खुद नहीं आगे बढ़ना , सभी को संग लेकर चलना है आगे और भी आगे। और ये बात राजनेताओं के झूठे और खोखले नारे जैसी हर्गिज़ नहीं है।
 

Saturday, 4 February 2017

{ 600 वीं पोस्ट } नये कीर्तिमान की योजना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                           नये कीर्तिमान की योजना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
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सौ साल जीने का कीर्तिमान बनाना किसी काम का नहीं होता अगर आप वास्तव में कभी जीने का लुत्फ़ ही नहीं उठा सके। ज़िंदगी का मज़ा सही या गलत तरीके पर चल कर नहीं लिया जा सकता , जिनको मज़ा लूटना वो लोग हर ढंग अपनाते हैं। बात राजनेताओं और अधिकारियों की अथवा बड़े बड़े पत्रकारों अभिनय करने वालों या उद्योगपतियों धन्नासेठों की नहीं है। अपराधी से लेकर मनमानी करने वाले वास्तव में इसी मानसिकता वाले लोग होते हैं जो खुद मज़ा लेने को सब से बड़ा काम समझते हैं। ये तो इक भूमिका थी आपको समझाने की कि कीर्तिमान किस को कहते हैं। अब उस योजना की बात जो इक नया ही नहीं नवीनतम कीर्तिमान स्थापित करेगी। फरवरी महीने में 2 8 -2 9 दिन अभी तक होते रहे हैं , इस बार 3 0 दिन का महीना जल्द ही घोषित किया जा सकता है। कब कौन कैसे मत पूछना अभी इसको गुप्त रखना है नोट बंदी की तरह। मगर योजना का मकसद क्या है उसे बताया जा सकता है , यूं भी ये योजना उसी योजना का विस्तार है। बताने की ज़रूरत नहीं है कि नोटबंदी से न काला धन समाप्त हुआ है न गरीबी ही मिट सकी है। ये पैसे वाले अमीर लोग बेहद धूर्त और काइयां तरह के चालाक अवसरवादी होते हैं , इनको सब तरीके आते हैं अपना काम निकालने के। सरकार समझ चुकी है इन से कुछ हासिल नहीं हो सकता , उनको नाराज़ भी नहीं किया जा सकता ये मज़बूरी भी सब जानते हैं।
                   मगर सरकार को आगामी चुनाव से पहले देश से गरीबी नाम का अभिशाप जो विश्व में सब से बड़े लोकतंत्र के माथे का कलंक है उसको दूर करना ही है। तरीका ढूंढ लिया गया है। आपने स्वेच्छा से सबसिडी छोड़ने की बात सुनी होगी , कुछ कुछ उसी तरह की योजना है। गरीबी का प्रमुख कारण जनसंख्या भी है , इस योजना से एक तीर से दो निशाने लगने की बात सच साबित हो जायेगी। सरकारी अथवा गैरसरकारी सर्वेक्षण से पता चला है कि करोड़ों लोग ज़िंदगी से ऊब चुके हैं और मरना चाहते हैं। उनकी समस्या है कि उनको लगता है ख़ुदकुशी करना अपराध भी है और ऐसा करने वाले को लोग कायर भी कहते हैं। सरकार पुलिस पशासन खुद बेशक लोगों का जीना दुश्वार करते रहें , जो ख़ुदकुशी करता है उसके जुर्म का दोषी कौन ये तलाश करती रहती है ताकि ख़ुदकुशी को विवश करने का इल्ज़ाम लगाया जा सके। जबकि हम विश्वास करते हैं जो तकदीर में लिखा वही होता है , जनता की तकदीर में अच्छे दिन विधाता ने अगर नहीं लिखे तो कोई सरकार कोई प्रधानमंत्री कोई राजनेता क्या कर सकता है। तकदीर का लिखा कोई नहीं मिटा सकता है। आप किसी को दोष मत दो मेहरबानी करके।  चलिए अब मुद्दे की बात की जाये , योजना क्या है आगे बताता हूं  , मगर पहले आप शपथ खाओ इस को राज़ रखोगे जब तक खुद सरकार घोषित नहीं कर देती कि ये अफवाह सच है। सच पर यकीन करें अफवाहों पर ध्यान नहीं दें।
                                तीस फरवरी को जीवन मुक्ति योजना शुरू की जानी प्रस्तावित है जिस में सब से पहले जनता को मौत का अधिकार दिया जायेगा और जो भी ज़िंदा नहीं रह सकता या नहीं रहना चाहता उसको जान देने ख़ुदकुशी करने का हक कानूनन मिल जायेगा। धनवान लोग या सनकी लोग कोई बड़ा समारोह या पार्टी भी आयोजित कर शान से मौत को गले लगा सकेंगे। मगर सरकार केवल गरीबों की सहायता हर तरह से इस काम में करेगी क्योंकि ऐसा करने से गरीबों की संख्या के साथ देश की आबादी की जनसंख्या भी कम होगी। जो गरीब भी ख़ुदकुशी करने की अर्ज़ी देगा उसको उसकी मर्ज़ी  की मौत देने का प्रबंध निशुल्क किया जायेगा और किसलिए मरना चाहते जैसा सवाल पूछकर परेशान नहीं किया जायेगा। ख़ुदकुशी के बाद उसको इक शहीद समझा जायेगा और उसके परिजनों को खूब मुआवज़ा दिया जायेगा जिस से उनकी गरीबी खत्म हो सके। ऐसा करने से बहुत लोग ख़ुदकुशी करने को आकर्षित होंगे और सरकार इसको बढ़ावा देना चाहती है। जो लोग नोटबंदी में मारे गये उनको भी इस योजना में शामिल कर सभी लाभ देगी सरकार। अच्छे शहर और खुले में शौच की तरह ही कोशिश की जायेगी गांव - गांव तक ये सुविधा पहुंचाने की। जीवन मुक्ति योजना में सुसाइड सेंटर खोलने में जो भी शामिल होंगे उनको अनुदान मिला करेगा , हर पुरानी योजना की तरह मगर इस में झूठे नाम गलत आंकड़े नहीं चलेंगे। हर मौत का पंचनामा किया जायेगा और ख़ुदकुशी के सबूत रखने होंगे , जो इस योजना में अनुचित करेगा उसकी सज़ा खुद उसी सेंटर में सूली पर टांग कर दी जाया करेगी। 
           सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि कुकरमुत्ते की तरह फ़ैल रहे हैं कोचिंग सेंटर। रिहायशी इलाकों  में खोलने  पर अदालती आदेशों की पालना विभाग नहीं करते जिस से महिलाओं बज़ुर्ग लोगों और निवासियों को परेशानी होती है। अभी भी सरकार हर दिन नये नाम से ऐसे लूट के सेंटर खुलवा  रही है। हर योजना ठेकेदार या बिचोलिये असफल करते रहे हैं , उनको शिक्षा स्वास्थ्य या रोज़गार  की जानकारी होती है या नहीं कोई नहीं देखता। मगर मुझे इस योजना का सलाहकार पूरी जांच के बाद बनाया गया है। ख़ुदकुशी को लेकर मेरा चिंतन और शोध मेरे पूरे लेखन में दिखाई देता है। कहानियों कविताओं और व्यंग्य में बहुत जगह ऐसा विवरण मिलता है। मेरी ग़ज़लों में अनगिनित शेर ही इस विषय पर नहीं अपितु इक ग़ज़ल तो लिखी ही इसी को लेकर गई है। बाकी शेर बाद में , पहले मेरी ये पूरी ग़ज़ल पढ़ें :-
ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ,
ज़िंदगी तुझसे डर गया कोई।
तेज़ झौंकों में रेत से घर सा ,
ग़म का मारा बिखर गया कोई।
न मिला कोई दर तो मज़बूरन ,
मौत के द्वार पर गया कोई।
खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर ,
फिर से खुद ही संवर गया कोई।
"ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है" ,
उस पे इल्ज़ाम धर गया कोई।
और गहराई शाम-ए-तनहाई ,
मुझ को तन्हा यूं कर गया कोई।
है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक" ,
जीते जी कब से मर गया कोई।
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    बहुत बार पहले ऐसा भी हुआ है , किसी  की मौत पर लोग जमा हुए मोमबत्तियां जलाईं , आंदोलन किया , नारे भी लगाये। सरकार ने तब बहुत बातें कही कोई फंड भी बनाया , मगर उस फंड से किया कुछ भी नहीं गया। लेकिन इस योजना को कोई भुला नहीं सकेगा , इतिहास में लिखा जायेगा कि जब सालों तक देश  की सरकारें गरीबी नहीं मिटा सकीं तब गरीबों को मरने का हक दिया गया। और तमाम अनाम गरीबों ने देश से गरीबी का कलंक धोने को अपनी जानें कुर्बान कर दीं। ये उन्हीं गरीबों  की शहादत है की देश खुशहाल हुआ।
अंत में उन्हीं गरीबों  आत्माओं के नाम मेरी कुछ ग़ज़लों के  कुछ शेर पेश हैं :-
                           ( निर्भया के नाम चार शेर सब से पहले )
बहाने अश्क जब बिसमिल आए , सभी कहने लगे पागल आए।
हुई इंसाफ  की बातें फिर भी ,  ले के खाली सभी आंचल आए।
किसी  की मौत का पसरा मातम , वहां सब लोग खुद चल चल आए।
नहीं सरकार के आंसू निकले , निभाने रस्म बस दो पल आए।
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                ख़ुदकुशी पर कुछ और शेर :-
मौत तो दरअसल एक सौगात है , पर सभी ने इसे हादिसा कह दिया।
सत्ता का खेल क्या है उनसे मिले तो जाना , लाशें खरीद कर जो शमशान बेचते हैं।
अब लोग खुद ही अपने दुश्मन बने हुए हैं , अपनी ही मौत का खुद सामान बेचते हैं।
ख़ुदकुशी का इरादा किया जब कभी , यूं लगा है किसी ने पुकारा हमें।
हैं  कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर , ज़हर भी जो पिलाते हैं कहकर दवा।
हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां , इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा।
           अंत में देश के रहनुमाओं से इक बात :-
                              सब को जीने के  कुछ अधिकार दे दो ,
                              मरने  की फिर सज़ा सौ बार दे दो।
माना ये दवा बेहद कड़वी है , मगर इक बार पीनी होगी और तमाम समस्याओं से निजात मिल जाएगी।
अभी तलक  की सभी सरकारों  की नाकामियों और उनके अपकर्मों पर इस से पर्दा पड़ जाएगा।
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां कहलाएगा।  
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Friday, 3 February 2017

सब दुखों की एक दवा है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    बिजनेस मैनेजमेंट की क्लास में सभी विद्यार्थी अपना अपना शोध प्रस्तुत कर रहे हैं।  प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद  कौन क्या क्या कारोबार करेगा ये पता चल रहा है। इक होनहार छात्र बता रहा है आजकल सफल होने के लिये अपने उत्पाद के शुद्ध स्वदेशी सस्ता और असली साबित करना या ऐसा घोषित करना प्रचार द्वारा बेहद ज़रूरी है। आज हर उत्पाद पर किसी न किसी का दावा है उत्तम क्वालिटी का सस्ते दाम पर और प्रभावी होने का। मगर अभी भी ऐसी इक वस्तु है जो असली है और  प्रभावी भी ये कोई भी दावा कर बेचता नहीं है। ज़हर किसी का भी असली मिलता नहीं है उन्हें जो जीना नहीं चाहते ख़ुदकुशी करने को। ठीक होने के लिए दवा नकली खाकर लोग मर जाते हैं लेकिन नकली ज़हर से मौत भी मिलती नहीं है। आप सोचोगे सरकार भला ज़हर बनाने और बेचने देगी , जबकि सभी जानते हैं ऐसा करती है सरकार टैक्स की खातिर। आप ज़हर बनाते किसी और काम की खातिर मगर बिकता किसी और काम आने को है। आप विष का प्रचार किसी भगवान या सुकरात जैसे सच बोलने वाले का नाम जोड़ कर भी कर सकते हैं। यकीन रखें जिसका आजकल बहुत अधिक शोर है हर चीज़ असली बनाने बेचने का उसको मैं अपना ये नया विचार बताकर भी कमाई कर सकता हूं। क्योंकि उसको आता है ऐसा कारोबार कर धनपति बनना , मेरा आदर्श वही ही है। इस  देश में करोड़ों लोग हैं जो जीवन से तंग आ चुके हैं मगर ख़ुदकुशी करने को शतप्रतिशत गरंटी वाला विष मिलता नहीं है। सब दुखों की एक दवा है क्यों न आज़मा ले , स्लोगन भी मुझे उपयुक्त लगता है।  

Wednesday, 1 February 2017

बजट के पिटारे में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

इंतज़ार की घड़ियां लंबी बहुत थीं , पर जनता ने काट ही लीं। पिया ने वादा किया था इस बार गरीब जनता की बारी है। सब की गरीबी दूर की जाएगी। तीन लाख आमदनी वाले गरीबों से कोई आयकर नहीं लिया जायेगा। पांच लाख की आय वालों को पांच प्रतिशत की छूट दे दी गई है। किस किस को कितनी आमदनी वाले को कितना फायदा हिसाब बताया है। शायद फिर भूल गये उस बदनसीब को जिस की आमदनी है ही नहीं , जगह नहीं तो घर बनाने को कर्ज़ मिलने का क्या करें। जिनकी ज़मीन है उनको कृषि करने को सहयोग की बात की , मगर जो खेतिहर दिहाड़ीदार मज़दूर वो किधर जायें। उनको कैसे इतना मिलेगा कि ज़िंदा रह सकें , मनरेगा की बात लगता भूल गये किनको मिलता काम , ठेकेदार इंसान से नहीं मशीनों से तालाब खुदवाते कम पैसे से। कागज़ पर अंगूठा ही तो लगा दिखवाना है , फोटो भी बना ली जाती हैं। याद आया अब मज़दूरी बैंक के खाते में सीधे मिलेगी , मगर बैंक में खाता कैसे खुलेगा। पैन कार्ड कहां से बनवायें , अब ज़रूरी है। चलो किसी तरह सौ दिन मज़दूरी मिल ही गई तो क्या सब ठीक हो जायेगा।  आज़ादी का मतलब क्या दो वक़्त पेट भरना है , बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य उसका क्या होगा। वो तो आपने निजि कारोबारियों को पूरी छूट दे रखी है लूट की। कोई नियम कायदा ही बना देते डॉक्टर या हॉस्पिटल अथवा प्राइवेट स्कूल कितनी फीस ले सकते। ये दोनों पेशे सेवा का दम भरते हैं उनको लूट की इजाज़त नहीं दी जा सकती। सब बाकी बातों को भूल कर ज़रा इतना तो देखते जो पिछले साल बताया कितना वास्तव में किया है।
                       सब की नहीं इक योजना की मिसाल सामने है।  कहते हैं  पका है  देखने को इक चावल निकाल कर देख लेते हैं सब का पता चल जाता है। पिछले साल आठ लाख तालाब बनाये गये उनकी बात है। काफी तो अधूरे हैं जिनको पूरा बताया गया है। बहुत कुछ लोगों ने अनुदान लेकर अपने खेत में बनाये जो उनकी निजि ज़रूरत को काम आयेंगे।  मगर असली मकसद किसी से पूरा नहीं होगा , जल को संचित करने का ताकि भूमि के नीचे के जल का स्तर ऊंचा हो सके। सब तालाब ज़मीन पर ऊंचे बने हैं जिनमें पानी बाहर से जमा हो ही नहीं सकता , उनको भरने को नीचे से ही पानी निकाल भरा गया है। जिस से ज़मीन के नीचे का जल और नीचे जायेगा। यही हर सरकारी योजना का सच है। राजधानी के दफ्तर में बैठकर यही किया जाता रहा है हमेशा से।
                       आखिर में दो शेर :-
             हक नहीं खैरात देने लगे ,
             इक नई सौगात देने लगे !
             रौशनी का नाम देकर हमें
             फिर अंधेरी रात देने लगे।
             (  डॉ लोक  सेतिया )