Saturday, 14 January 2017

बिकाऊ माल अर्थात ब्रांड होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                 " कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊं , बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। "
आज महत्व ब्रांड होने का है , ब्रांड होना ऊंचे दाम बिकना है। लोग अपने नेता को ब्रांड बता रहे हैं , उनकी शान बढ़ा रहे हैं। सच गांधी जी कोई ब्रांड नहीं थे , शुक्र है उनको लाख प्रयास कर के भी कोई बाज़ार में बिकता ब्रांड नहीं बना पाया। कभी वो लोग महान समझे जाते थे जिनकी कोई कीमत नहीं लगा सकता था , जो किसी भी दाम बिकने को तैयार नहीं होते थे। अब तो माना जाता है सब बिकते हैं सब को खरीदा जा सकता है बस मोल अपना अपना है। गरीब दो रोटी में बिक जाता है , मज़बूरी इक मां को दो हज़ार में बच्चा बेचने को विवश कर देती है , और गरीब की गरीबी और जनता की बदहाली की बातें कहकर कोई राजनीति करते हुए ब्रांड बन जाता है। कोई दूसरा ब्रांड योग और आयुर्वेद से लेकर हर शुद्ध वस्तु को बेच मालामाल हो जाता है , जबकि उसके पास आयुर्वेद की कोई शिक्षा ही नहीं है। वो अपने विज्ञापनों में कहता है " मेरा विश्वास है जो योग करेगा और दो घूंट रोज़ पियेगा वो रोगों के कुचक्र में ही नहीं फंसेगा। " आपको मालूम है इसका अर्थ , विश्वास है भगवान है , मगर विश्वास है ऐसा करने से रोग नहीं होंगे , में अंतर है। विज्ञान मात्र विश्वास पर नहीं चलता , आयुर्वेद भी इक चिकित्सया शास्त्र है कोई धर्मकथा नहीं। मुझे नहीं पता इस तरह किसी बात को बेचने को क्या कहा जाये , मगर इतना जनता हूं ऐसा कर किसी ने न आयुर्वेद न ही योग की भलाई की है। फिर भी अगर आप सवाल करें तो आपको बताना ज़रूरी है विज्ञान तथ्य और प्रमाण पर आधारित होता है। किसी भी दावे को परखा जाता है ये जांच कर के कि उसके उपयोग से कितनों को क्या लाभ हुआ। किसी की दुकान गली गली खुल गई इतना काफी है उसके व्योपार की सफलता के लिये , मगर कितने प्रतिशत रोग कम हुए या लोग तंदरुस्त हुए पहले से ये कौन बतायेगा।  स्वास्थ्य विभाग और डब्ल्यू एच ओ नहीं मानता देश में रोग या रोगी कम हुए।
      असली सवाल बाकी है , क्या बिकना और ब्रांड होना गर्व की बात है। उनके नाम से मुनाफा होता है उनके दल वालों को लगता है , फिर तो उनकी तस्वीर हर जगह लगवा दो , कुछ आधुनिक संत अपनी तस्वीर अपने अनुयायियों को कुछ हज़ार में अपने हाथ से आशिर्वाद के साथ देते हैं , चोखा धंधा है। कुछ अभिनेता भी अपनी फोटो किसी के साथ भी करवाते हैं पैसे लेकर , उनकी कमाई होती है इसी तरह। कभी लोग बाज़ारी होना अपमान समझते थे , आज बाज़ार बताता है आपका मोल कितना है। इक और दल के नेता का उपहास किया जाता है कि उसका खरीदार कोई नहीं , यहां कल क्या हो जाये क्या पता। कल वही सत्ता पर काबिज़ हो जाये तो लोग जनता क्या मीडिया तक उसका गुणगान करेंगे , उसके फोटो भी विज्ञापन में दिखाई देंगे नित नई योजना की घोषणा के साथ। अब समय आ गया ही शेयर बाज़ार में राजनीति के शेयर भी दर्ज हों और उनका भाव भी बढ़ता गिरता नज़र आता रहे। जब यही सब से बड़ा कारोबार है जिस में आकर सभी अरबपति बन जाते हैं तो इसको खुले बाज़ार की अर्थव्यवस्था में शामिल करना ज़रूरी है। कब तक आम आदमी दूर से तमाशा देखता रहेगा , सभी को सत्ता की भागीदारी की इजाज़त मिलनी चाहिए। जो चाहे जिस राजनितिक दल के शेयर खरीद सके और जब वो दल सत्ता में आये तब अपने शेयर मनचाहे भाव पर बेच सके। सरकार इसको गरीबी की योजना में शामिल कर सकती है। अजीत जोगी और जूदेव जैसे महात्मा पहले ही राजनीति में धन के महत्व पर प्रवचन दे चुके हैं। आज इंसान भी इक वस्तु बन चुका है और उसकी कीमत लगाई जाती है , विधायक और सांसद भी बिकते खरीदे जाते हैं ये भी अब राज़ की बात नहीं है। बड़े बड़े उद्योगपति हर दल को चंदा देने की तरह हर दल के शेयर खरीदा करेंगे और जिस दिन उनके पास इतना धन होगा की बहुमत संख्या के विधायक खरीद सकें सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं। जो अभी तक परदे के पीछे होता आया चोरी से अब कानूनी तौर पर खुलेआम होगा। इधर इक दलाल बता रहा है कि राजनीति में ईमानदारी की कीमत माइनस में आ गई है और बेईमानी को मुंह मांगी कीमत मिलने लगी है। आप कुछ शेयर बेईमानी के खरीद कर और कुछ हेरा फेरी दल के भी साथ फ्री पाकर शुरुआत तो करो , इसमें सभी ब्रांड उपलब्ध हैं , लाल , भगवा , नीला  , हरा , अब तो काला भी शामिल हो चुका है , बहुरंगी तो है ही।
             ऊपर स्वर्ग लोक में बहस चल रही है , एक अंग्रेज़ की आत्मा भारतीय आत्मा से कह रही है , तुम क्या समझते थे हम देश को लूट रहे हैं , हमें बाहर निकाल दिया था। क्या शिक्षा दी थी तुमने चरित्र निर्माण की , आज हर बात को बेचा जा रहा खरीदा जा रहा , मूल्य आदर्श भी तोले जा रहे सत्ता के तराज़ू पर।  और  देख लिया झूठ का पलड़ा भारी है सब उधर झुके हुए हैं , सच की कद्र कुछ नहीं उसकी कीमत दो कौड़ी भी नहीं है। तुम सत्य अहिंसा की पुजारी थे , तुम्हारी समाधि पर फूल चढ़ाने वाले तुम्हारी सोच को कत्ल करते हैं। खुद विदेशी कम्पनियों को बुलाते हैं , स्वदेशी की बात कोई नहीं करता। गांव में देश बसता है तुम मानते थे , अब गांव भी गांव जैसे नहीं हैं , चरखा आज मिलता ही नहीं कहीं। आपको पता है लोग मन्नत मांगते हैं बहुत सालों से मांगते आये हैं और मन्नत पूरी होने पर चरखा लोहड़ी में जलाया करते थे , आज चरखा नहीं मिलता बस इक मॉडल छोटा सा बिकता है रस्म निभाने को। 2 अक्टूबर 3 0 जनवरी को रस्म निभाते हैं नेता। सत्तर साल हो गये हैं अभी तक देश के अंतिम आदमी के आंसू कोई पौंछता  क्या देखता तक नहीं है।

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