Thursday, 1 December 2016

जनता बोलो ये होना चाहिए या नहीं , मोदी जी पूछते हैं बार बार ( सवाल ) डॉ लोक सेतिया

         गरीब जनता को ही त्याग करने को कहा जाता है  हर बार , कभी किसी राजनेता से किसी ने नहीं कहा त्याग करने को। जनता को समझा रहे हैं इस में तुम्हारी भलाई है , अभी थोड़े से काम चला लो कुछ दिन फिर सब अच्छा हो जायेगा। भाषण में बार बार पूछते हैं सरकार काला धन बंद होना चाहिए या नहीं , फिर उस सवाल को दोहराते हैं , आप तैयार हैं थोड़ा कष्ट झेलने को। जनता को कितना चाहये भला सत्ता तय करती है , दो हज़ार बहुत है ए टी एम से रोज़ निकलवाने को , सप्ताह में चौबीस हज़ार क्या काम हैं। मान लिया जो भी आपने हुक्म दिया पर किसी को कभी तो लगता ऐसा ही परिबंध जनता के सेवक कहलाने वालों पर भी लगाया जाये जिनको हर महीने तमाम तरह से वेतन भत्ते और सुविधाओं के रूप में लाखों नहीं करोड़ों बिना मांगे मिलते हैं। प्रधानमंत्री जी आप बताओ क्या उन पर अंकुश लगाया जाना चाहिए या नहीं , अगर जनता को आदेश देते हैं कि कुल मुद्रा के 1 6 प्रतिशत से काम चला लो तो खुद अपने भी खर्चे इतने न सही एक चौथाई कर काम चला लेने की बात करते। मगर किसी सांसद किसी विधायक किसी मंत्री पर कोई रोक नहीं लगी , आपको ढाई ढाई एकड़ के बंगले चाहिएं , तमाम सुरक्षकर्मी भी जनता के धन से और अपनी मर्ज़ी से निजि स्टाफ भी देश के ख़ज़ाने से। मोदी जी किसी भाषण में ये सवाल भी पूछते तो जनता बार बार दोहराती जी सरकार लोकतंत्र के नाम पर सभी लुटेरों की लूट अब तो बंद हो। कभी तो ये फैसला हो कि देश की आम जनता की आमदनी और मंत्रियों जनप्रितनिधयों पर खर्चे में कोई अनुपात रखा जाये। क्यों नहीं आप सभी पर इक शर्त लगाई जाये कि आपको सभी साधन सुविधाएं तभी मिलेंगी अगर जनता को जितना ज़रूरी उतना मिल सके ऐसा प्रबंध आप कर सकें। अगर आप में काबलियत ही नहीं देश की जनता की हालत को सही करने की तो कब तक मुफ्त में आपका बोझ सहती रहे जनता। आज आपको बताता हूं आपने किया क्या है।
                इक पुरानी कहानी नये ढंग से लिखनी पड़ेगी मुझे। सूरज ने वादा किया था मछलियों से उनको मगरमच्छ से सुरक्षित रखने का , बताया गया कि उसको बस में  करने का उपाय है 8 0 प्रतिशत पानी को सुखाने का।  थोड़ी सी परेशानी होगी कुछ दिन प्यास सतायेगी फिर सब ठीक हो जायेगा , सूरज का शासन था उसको सब करने का अधिकार मिल गया था।  अपनी ताकत की गर्मी से उसने तमाम पानी सुखा दिया और जिस जिस तालाब या नदी नाले के पास पानी था उसको जल्द ही वापस सरकार के समंदर में डालने का हुक्म सुना दिया जिस का पालन नहीं करना अपराध था। धीरे धीरे मछलियां मरती गई लेकिन मगरमच्छ को कुछ नहीं हुआ। आखिर सूरज को लगा मगरमच्छ को भी जीने का अधिकार है , और निर्णय किया गया आधा पानी मगरमच्छ को मिले और आधा सरकार के समंदर में भेंट कर अपने सारे अपकर्मों से मुक्त हो जाये। मछलियां अभी भी मर रही हैं पर मगरमच्छ सरकार की बात मानते हैं या नहीं कोई नहीं जानता।
           सीमा पर भी जैसा दावा किया गया था दुश्मन को समझ आ गई है वैसी बात दिखाई नहीं दे रही। यही तो सत्तर साल से होता आया है हर सरकारी दावा खोखला साबित होता रहा है। हर बार इक नई योजना पुरानी की जगह उसी की तरह और नाम से।  आज तक हर सरकार ने देश की जनता की तकलीफ को बढ़ाया ही है कम नहीं किया है। मोदी जी शायद अगले चुनाव में यही सवाल खुद से करेंगे जो किया नहीं पांच साल तक वो करना चाहिए था कि नहीं।  पर जवाब नहीं मिल सकेगा लगता है , मिल सकेगा फिर कोई नया नारा।

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