Wednesday, 5 October 2016

मुहाफिज़ गरीबों के ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

             देखो तुम नाराज़ मत हो , जो हम कर रहे उसका बुरा नहीं मानो , ऐसा करना ज़रूरी है। टीवी का एंकर उस गरीब महिला को बहला रहा है , जो आग बबूला हो गई थी जब कैमरा मैन ने उसकी कमीज़ को फाड़ दिया था। वो समझ रहा है , तुम्हारी भूख और गरीबी पूरी तरह दिखाई देगी तभी देखने वालों पर असर होगा। तुम्हारी कमीज़ को इसीलिये फाड़ा गया है ताकि दर्शकों की नज़रें तुम पर ठहरें , नंगा बदन देखने को , तुम्हारे लिये सहानुभूति पैदा करना ही हमारा मकसद है आज। तुम्हें नहीं मालूम हमारे कैमरे की नज़र पड़ते ही छोटी से छोटी चीज़ बड़ी लगने लगती है। लाखों लोग तरसते हैं कि कभी मीडिया उन पर मेहरबान हो और उनका चेहरा टीवी पर आये और वो आम से ख़ास होकर फोकस में आयें ताकि सेलिब्रिटी बन सकें। तुम्हें मुफ्त में ये अवसर मिल रहा है , बस्ती की सीधी साधी भोली औरत को एंकर चुप करवा रहे हैं , सामने देखो सभी को तुम्हारी छिपी सुंदरता भा रही है। बेचारी महिला अपमानित महसूस करती करती मान गई है कि उसकी और बाकी गरीबों की भलाई हो रही है टीवी शो से , शायद यहां से निकलते ही उनको सब कुछ मिलेगा जो अभी तक सिर्फ सरकारी वादों घोषणाओं में ही था। एंकर खुद एक कठपुतली है उस के हाथों की जिसका टीवी चैनेल से अनुबंध है हर रविवार कोई चर्चा शो आयोजित करने का। सप्ताह भर उसको चिंता रहती है नया विषय तलाश करने की। काफी दिन से अख़बार और समाचार चैनेल वाले इस सदाबहार विषय को भुला बैठे हैं और फालतू की बहस में पूरा दिन उलझे रहते हैं , जैसे देश में भूख - गरीबी जैसी कोई समस्या बाकी ही नहीं रही , और सरकारी आंकड़े सच हैं। कुछ नया और दूसरों से अलग और सब से पहले की चाह में ये विषय आज की बहस का चुना है। प्रभावशाली बनाने को कुछ गरीब लोग बस्ती से पकड़ लाये हैं खुशहाली का सपना दिखला कर और शो के बाद भरपेट खाना खिलाने का वादा करके। कार्यक्रम शुरू होने से दो घंटे पहले उनको लाकर फोटोजनक रूप दिया गया है , कुर्ता पायजामा उतार धोती बनियान पहनाई गई है , किसी की सलवार कमीज़ बदल घाघरा चोली पहनने को कहा गया है। भूख से मुरझाये चेहरों को मेकअप से चमकाया गया है कैमरे की खातिर , इस पर इतना पैसा खर्च किया गया है जितने से वो सप्ताह भर भोजन कर सकते थे। मगर करें क्या मीडिया का कैमरा खाली पेट को नहीं देख सकता , मनहूस मुरझाया चेहरा उसको अच्छा नहीं लगता। बताया गया है यहां सब वास्तविक है , कुछ भी नकली नहीं है।
                  टीवी चैनेल के पास कुछ खास गिने चुने लोग हैं जो बुद्धिजीवी कहलाते हैं और हर विषय पर बहस कर सकते हैं। ज़रूरत हो तो एंकर ही तय करता है किस को किस पक्ष की बात कहनी है , और उनके विचार उसी पक्ष में बदल भी जाते हैं , मज़बूरी है उनकी दाल रोटी इसी तरह चलती है। उनका भी एक ग्रुप सा है , अपनी सुविधा से तय करते हैं आज किस को बुलाना है विषय का विशेषज्ञ समझ कर। जब टीवी पर उलझते हैं तब ऐसा प्रतीत होता है जैसे जन्म जन्म के विरोधी हैं , इक दूजे की जान के दुश्मन , लेकिन रिकार्डिंग खत्म होते ही  सभी गले मिल बधाई दे रहे होते हैं प्रभावशाली ढंग से बहस करने की। नतीजा तुरन्त उनको हज़ारों रूपये का चैक मिल जाता है टीवी चैनेल से , उनका वास्तविक सरोकार इसी से ही होता है। गरबों की चिंता , पर्यावरण की बातें , सांप्रदायिक सदभावना जैसी बातें सिर्फ मिलने वाली राशि की खातिर होती हैं।
                       सभी पैनिलिस्ट आ गये हैं , बहस शुरू हो रही है।आंकड़े बता कर सब को प्रभावित किया जा रहा है , कोई सेलफोन कार ऐ सी के आंकड़े लाया है तो दूसरे के पास भूख से मरने वालों की संख्या में साल दर साल बढ़ोतरी के आंकड़े भी हैं। कोई बता रहा गरीबी की रेखा से नीचे प्रतिशत लोग है तो कोई देश में बढ़ती करोड़पतियों की गिनती बता रहा है। लेकिन कैमरा बार बार वहीं जाकर रुक जाता है जहां उस महिला की कमीज़ को फाड़ दिया था ताकि उसकी गरीबी के साथ सुंदरता भी दर्शक देख सकें। इक पैनेलिस्ट भी ये देख खुद को रोक नहीं पाता और बात बात में इशारा भी करता है कि जिसके पास भगवान की दी ऐसी खूबसूरती हो उसको गरीब कहा ही नहीं जाना चाहिये। उसके पास तो खज़ाना है , सभी बेशर्मी से खिलखिला देते हैं। पूरी चर्चा में कहीं भी किसी के चेहरे पर गरीबी और गरीबों की दुर्दशा पर संवेदना का भाव भूले से भी आया नहीं। टीवी शो की शूटिंग पूरी होने के बाद सभी मेहमान साथ के हाल में डिनर का आंनद ले रहे हैं शाकाहारी मांसाहारी और शराब के जाम का भी लुत्फ़ उठाया जा रहा है। उन गरीबों को सभी भूल गये हैं जो कब से खाना मिलने की आस लगाये हुए थे। गरीबी घबरा गई है अमीरों को करीब देख कर , गरीब बाहर निकल आये हैं , एक भूख से बेताब ने साहस कर वहां खड़े किसी से पूछ ही लिया कि उनको खाने को कब मिलेगा कुछ। बताया गया है बड़े लोग खा रहे हैं , उनके खाने के बाद जो बचेगा तुमको बांट दिया जायेगा। शायद गरीबों के प्रति सहानुभूति बहस में ही खर्च हो गई थी , खाने के वक़्त दिलों में इंसानियत बाकी ही नहीं बची थी। सारे भूखे गरीब इक बैंच पर बैठ इंतज़ार कर रहे थे रोटी मिलने का। बहुत देर बाद एक पैनलिस्ट और एंकर झूमते हुए निकले थे , गरीब हाथ जोड़ खड़े हो गये थे। ये वही पैनलिस्ट थे जो सुंदरता को दौलत बता रहे थे , एंकर से कह रहे थे उसको मेरी कोठी पर आने को कह देना , मुझे उसकी गरीबी पर बहुत तरस आ रहा है। कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। खास लोगों के जाने के बाद बचा हुआ कहना पैक कर गरीबों को दिया जा रहा है , घर जाकर खाने को। अब ऐसी साफ सुथरी जगह उनको खाने की अनुमति भला कैसी दी जा सकती है।  गरीब आज भी अमीरों की गरीबी दूर करने को काम आये हैं  , आखिर इन्हीं के नाम से कार्यक्रम सफल होगा और टीवी वालों को खूब मुनाफा भी होगा विज्ञापनों की आमदनी से।
                                   एंकर उस गरीब महिला से बात कर रहे हैं , उनका विज़िटिंग कार्ड देकर समझ रहे हैं , तुम उनको खुश करोगी तो गरीबी कभी तुम्हारे पास तक नहीं फटकेगी। पैसा घर नाम कार तक सब मिलेगा। अच्छा , गरीब महिला ने पूछा उनको खुश करने को क्या करना होगा मुझे , ये भी बता ही दो। बस उनकी रातें रंगीन करनी होगी , बेहद बेशर्मी से एंकर बताता है। गरीब महिला गुस्से से पूछती है , क्या तुम लोग इसी तरह अमीर बने हो , क्या क्या बेचा है , अपना ज़मीर भी। अपने पूरे कार्यक्रम में क्यों ये नहीं बताया कि तुम सभी की सोच कैसी गिरी हुई है , गरीबी मिटाने का यही उपाय समझ आता है तुमको। इक बात जान लो अगर ऐसे गरीबी मिटानी होती तो हम कब के गरीबी से छुटकारा पा लेते , मगर नहीं हमको तुम जैसे दोगले लोगों की दिखाई रह पर कभी नहीं चलना। आज तुम पर ऐतबार कर धोखे में आ गये थे पर अब देख लिया तुम लोगों का चेहरा उतरी हुई बकाब के बाद। सच तुम बेहद कुरूप हो , हमारी गरीबी कभी इतनी कुरूप नहीं हो सकती।
  ( अख़बार - पत्रिका वाले चाहें तो रचना प्रकाशित कर सकते , ब्लॉग से साभार लिख कर )

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