Saturday, 15 October 2016

क्या हम झूठे लोग हैं ( दोगला समाज ) विचार - डॉ लोक सेतिया

         बार बार देखा है जहां भी कुछ गलत हो रहा हो , कोई देश-समाज के नियम क़ानून या नैतिकता की धज्जियां उड़ा रहा हो , अधिकतर लोग खामोश रहते हैं। तब तक जब तक आग उनके घर तक नहीं पहुंचती। औरों की परेशानी हमें परेशानी लगती ही नहीं। हम सोचते ही नहीं कि जब कोई भी सामजिक या न्यायिक नियमों का उलंघन करता है तो जो व्यक्ति सभ्य है कायदे से चलता है उसका जीना दूभर हो जाता है। कहीं दो नवयुवक असमय दुर्घटना में घायल होकर मर जाते हैं क्योंकि कोई तेज़ गति से गलत साईड से वाहन चला रहा होता है शराब पी कर। आप अगर अपने बेटे को यही शिक्षा दे रहे हैं कि सरकारी नियम पालन करने की ज़रूरत नहीं है अगर विभाग को पता चल भी गया तो कुछ पैसे जुर्माना भर चैन से रह सकते हो। तब आप कितने भी समझदार या शिक्षित हों आप अपने बेटे को सभ्य नागरिक नहीं बना सकते। बड़ा होकर आपका बेटा भले जो भी बन जाये देश का इमानदार नागरिक नहीं बन सकता। मुझे गलत बातों का विरोध करते उम्र बीत गई है और मैंने देखा है जब आप सरकार प्रशासन या किसी भी व्यक्ति की अनुचित बात का विरोध करते हैं तब कोई भी आपका साथ देना नहीं चाहता जब तक खुद उसको कोई नुकसान नहीं हो। देश समाज का नुकसान किसी को अपना लगता ही नहीं। क्या देश आपका नहीं है और समाज भी। आपका कोई एक पैसे का नुकसान करे आप तिलमिला उठते हैं , देश समाज को लूट रहा हो आपको सरोकार नहीं। हां कहने को आप धर्म की सच्चाई की बड़ी बड़ी बातें कर सकते हैं जबकि आचरण में आप उसके विपरीत ही होते हैं। मैं ये सब क्यों करता हूं एक बार फिर से दोहराता हूं। जब डॉक्टर बना और अपनी क्लिनिक शुरू की तभी इक पत्रिका , सरिता , में इक कॉलम पढ़ा था , कुछ सवाल पूछे गये थे , जैसे कि आप पढ़े लिखे हैं अपना काम या नौकरी करते हैं पैसा कमाते हैं घर बनाते हैं शादी करते हैं बच्चे पैदा कर उनको पालते हैं , तब आप अपने देश और समाज के लिये क्या करते हैं। घर बनाना संतान पैदा करना तो पशु पक्षी जानवर भी करते ही हैं , हम इंसान हैं तो कुछ हमें देश समाज के लिये करना चाहिये। उसके बाद लिखा होता था क्या क्या किया जा सकता है। उन्हीं बातों में इक प्रमुख बात थी देश समाज में जहां कहीं भी कुछ गलत अनुचित अनैतिक होता दिखाई दे उसका विरोध करना हर तरह से। बस तभी मन में इक संकल्प लिया था ये सब करने का।
                              बीस साल हो गये ये काम करते करते , भ्र्ष्टाचार , सरकार की मनमानी , अफ्सरों की तानाशाही का और धर्म समाजसेवा की आड़ में अपने स्वार्थ सिद्ध करते लोगों की वास्तविकता को उजागर करते। फिर लगा मेरे प्रयासों से हासिल क्या हुआ जब ये सारी बातें और भी बढ़ती नज़र आती हैं।  निराश होकर इक लंबा पत्र लिखा मैंने विश्वनाथ जी को जो संपादक थे सरिता के , आज ज़िंदा नहीं हैं , मैंने पूछा था आपकी बात मान मैंने यही काम रोज़ किया है मगर आज लगता है जैसे व्यर्थ गया सारा का सारा प्रयास। जल्दी ही उनका पत्र मिला मुझे विस्तार से समझाया था , लिखा हुआ था आपने ऊंचे पहाड़ों से निकलती नदी को देखा है , बहुत तीव्र वेग से बहती है , राह में आने वाले पत्थरों को मिटा देती है , रेत बन जाते हैं कठोर पत्थर और लगता है उनका नामो-निशान मिट गया जैसे। आप कहोगे देखा नदी को रोक नहीं सके रास्ते के वो पत्थर , मगर असलियत ये नहीं है , सच ये है कि रास्ते के अवरोधों से उस नदी का तीव्र वेग जो विनाशकारी हो सकता था , बाढ़ की तरह धरती को काटता , वही अवरोधों के कारण इतना कम हो गया कि सिंचाई के काम आता है वही पानी। ठीक इसी तरह जो लोग सच की डगर चलते हैं बुराई का विरोध करते रहते हैं उनकी कोशिश असफल नहीं होती , काफी हद तक रुकावट से बुराई बढ़ नहीं सकती। अगर हम भी खामोश रहें तब देश और समाज और भी नीचे रसातल में चला जायेगा। बस तभी फिर से अपना प्रयास कभी खत्म नहीं करने की बात तय की थी।
               अफ़सोस ये नहीं होता कि आप अपराध या गैर कानूनी कामों का अनुचित कार्यों का विरोध करते हैं अकेले और कोई आपके साथ नहीं होता है , ये तो पहले से मालूम ही है इस डगर पर कायर लोग साथ नहीं दे सकते , लेकिन अफ़सोस तब होता है जब कुछ लोग मेरे जनहित के प्रयास का विरोध लाज शर्म त्याग करते हैं और जो अनुचित कार्य करता उसके साथ खड़े होते हैं। शायद इक चरित्र बन गया है लोगों का कि उनको लगता है नियम कायदे क़ानून पालन करने को हैं ही नहीं , जिसको जब जैसे सुविधा हो उनकी अवहेलना कर सकता है , आज जिस ने गलत किया जो उसके साथ खड़े हैं चाहते हैं जब वो भी कुछ भी अनुचित करें तब उनको कोई रोकने वाला नहीं हो , सब समर्थन करें उनकी गलत बातों का। कोई इन से सवाल करे क्या आप धार्मिक हैं , सच की राह चलते हैं , क्या आप देशप्रेमी हैं देश के क़ानून संविधान का आदर करते हैं। अथवा झूठे और दोगले लोग हैं जिनके चेहरों पर नकाब है अच्छा होने की जबकि मानसिकता खराब ही है। ऐसे सभी लोगों को मेरा दूर से सलाम है , उनके दोहरे मापदंड मुझे मंज़ूर नहीं हैं।

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