Tuesday, 27 September 2016

सार्थक जीवन या निरर्थक जीवन ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

        बहुत दिन से इक खलबली सी है दिलो-दिमाग़ में खुद अपने ही बारे में , मुझे क्या करना था क्या नहीं करना था , क्या किया अभी तक क्या नहीं किया , सोचता हूं ज़िंदगी के इतने लंबे सफर में मुझे कहां जाना था और मैं कहां पर आ गया हूं , अभी किधर को जाना है। बहुत कठिन है समझ पाना वास्तव में जीवन की सार्थकता क्या है। आज सोचता हूं लोग बहुत कुछ सोचते हैं समझते हैं और मानते भी हैं कि हमने क्या क्या किया है क्या हासिल कर लिया है अपने प्रयास से , लेकिन शायद ये कभी नहीं सोचते कि उन सब की सार्थकता क्या है। जैसे कुछ उदाहरण देखते हैं। कोई समझता है वह देशभक्त है , मगर देशभक्ति की परिभाषा क्या है , क्या आप अपने देश को अपना सर्वस्व अर्पित कर सकते हैं। तन मन धन सभी कुछ। नहीं कर सकते तो फिर कैसे देशभक्त हैं , केवल देशभक्त होने का आडंबर करते हैं। अगर कोई धर्म प्रचारक या साधु महात्मा बना फिरता है तो उसको सोचना होगा कि उसके प्रयास से धर्म का क्या भला हुआ है , क्या उसके समझने से लोग सच्चे इंसान बन गये हैं , लोभ लालच झूठ पाप मोह माया के जाल से मुक्त हुए हैं। लेकिन अगर आप सोचते हैं कि आपके लाखों अनुयाई हैं सैंकड़ों मठ आश्रम हैं धन संपति है तो आपको खुद ही धर्म का ज्ञान तक नहीं है। अगर आप शिक्षक हैं तो क्या आपकी शिक्षा से छात्र ज्ञानवान बने हैं , उनकी अज्ञानता का अंधेरा मिटा है , अगर ऐसा कुछ नहीं तो आपने मात्र किताबों को रटा खुद भी और रटाया है औरों को भी , जिस का कोई अर्थ ही नहीं है। अगर आप चिकित्सक है तो आपकी चिकित्सया क्या सफल रही लोगों को स्वथ्य करने में या कहीं आप रोगों की चिंता अधिक करते हैं रोगियों की काम , और आप रोगमुक्त समाज बनाना ही नहीं चाहते अपने स्वार्थ की खातिर। अगर आप जनसेवक हैं अफ्सर हैं या सरकारी कर्मचारी तो आपने क्या जनता की परेशानियों को दूर किया है या फिर अपने अहंकार और अधिकारों के मद में विपरीत कार्य ही करते रहे हैं , क्या आपने अपना फ़र्ज़ निभाया है देश और समाज के प्रति। अगर आप नेता हैं और आपको सत्ता का अवसर मिला है तो क्या आपने देश की आम जनता की ज़िंदगी को कुछ आसान बनाया है या उसकी मुश्किलें और भी बढ़ाई हैं। देश की वास्तविक दशा क्या सुधरी है सभी के लिये अथवा मात्र आंकड़े ही दिखाते रहे हैं और जो सब से नीचे हैं उनके बारे आपने सोचा तक नहीं समझ भी नहीं सके उनकी भलाई क्या है। अगर आप पत्रकारिता करते हैं तो आपने कितना सच का पक्ष लिया है कितना झूठ को बढ़ावा दिया है , क्या आप वास्तव में जनहित में सच को उजागर करते हैं , निष्पक्ष हैं निडर हैं। लेकिन अगर आप झूठ को सच साबित करते हैं , धन बल और ताकत के मोह जाल में उलझे हुए है और आपका मकसद अधिक पैसा किसी भी तरह कमाना है खुद अपनी प्रगति की खातिर तब आप जो भी करते हैं कम से कम पत्रकारिता तो हर्गिज़ नहीं करते हैं। अब अगर आप लेखक हैं तो आपके लेखन का ध्येय क्या है , खुद अपने लिये नाम शोहरत हासिल करना , ईनाम पुरुस्कार पाना या समाज को सच्चाई की राह दिखलाना बिना निजि स्वार्थ के। अगर इक ऐसे समाज की कल्पना को सार्थक करना आपका मकसद नहीं है जिस में न्याय हो अत्याचार का नाम तक नहीं हो , जिस में मानवता हो हैवानियत का निशान तक नहीं हो , जिस में प्यार हो भाईचारा हो नफरत की कहीं बात तक भी नहीं हो , और आपके लेखन से ऐसा कुछ भी सार्थक नहीं हो सकता तब आपका लिखना किसी काम का नहीं है। कहने को बहुत है मगर केवल बातें करने से क्या होगा , आओ हम सभी सोचें हम जीवन में जो भी करते हैं या आगे करना है वो कितना सार्थक है।  दुनिया किस को क्या समझती है वो महत्व नहीं रखता , महत्वपूर्ण है कि खुद हम क्या समझते हैं , हमारी आत्मा हमारा ज़मीर क्या कहता है।

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