Tuesday, 13 September 2016

फिर वही ढंग हिंदी दिवस मनाने का ( बेबाक - बुरी लगे या लगे भली ) डॉ लोक सेतिया

आज इक  मित्र  का  फ़ोन आया  , कल आपके शहर में आ  रहे  हैं  इक कवि सम्मेलन में  जो हिंदी दिवस  के उपलक्ष में स्थानीय कॉलेज में  इक समाचार पत्र आयोजित करवा रहे हैं। मैंने कहा अच्छी बात है आप आ रहे हैं तो मिलना अवश्य। उनको हैरानी हुई ये जानकर  कि मुझे अपने शहर के शायर को बुलाना नहीं याद रहा और पड़ोस के शहर से तमाम लोगों को बुलाया गया है। शायद ये इक प्रश्नचिन्ह है ऐसे हिंदी दिवस मनाने के औचित्य को लेकर। मगर मुझे ज़रा भी अचरज नहीं हुआ क्योंकि ये कोई पहली बार नहीं होने वाला  है। बहुत साल पहले साहित्य अकादमी के लोग राज्य भर में साहित्य चेतना यात्रा निकाल सभी शहरों में घूम रहे थे और फतेहाबाद में जिस दिन आये वो भी 1 4 सितंबर का ही दिन था हिंदी दिवस का। लेकिन साहित्य अकादमी वाले तब किसी स्थानीय लेखक से नहीं मिले थे न ही किसी को सूचित ही किया था। ज़िला प्रशासन को सूचित किया गया था और प्रशासन ने बाल भवन में अपनी आयोजित होने वाली मासिक बैठक की जगह पर मीटिंग से पहले जलपान की व्यवस्था कर दी थी और हिंदी दिवस मनाने की रस्म अदा कर दी गई थी। मुझे याद है मैंने साहित्य अकादमी को इस बारे इक पत्र लिखा था जो बेशक निदेशक जी को पसंद नहीं आया था और उनको सफाई देनी पड़ी थी कि जो हुआ उसकी ज़िम्मेदारी अकादमी की नहीं थी और बाकी सभी शहरों में प्रशासन ने स्थनीय लेखकों  को आमंत्रित किया था। वास्तव में हमारे प्रशासन की रिवायत यही रही है कि वो खुद कभी नहीं देखता कौन किस काबिल है , लोग जाते हैं उनको बताने कि हम कौन हैं क्या हैं , हमने क्या किया है और हमें पुरस्कार सम्मान दो , अतिथि बनाकर बुलाओ। मुझे राग दरबारी नहीं आता है , नहीं सीखना भी मुझे। ये बात सिर्फ हिंदी दिवस की ही नहीं है , सरकारी हर आयोजन इसी तरह ही किया जाता है। चाहे स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस , इक आडंबर किया जाता है चाहे वो मानव अधिकार की चर्चा ही क्यों न हो। मंच सरकार का आवाज़ भी सरकारी ही होती है , हर बार मालूम पड़ता है यहां कुछ भी नहीं बदला न ही शायद बदलेगा। कोई बदलना चाहता भी नहीं है , यथासिथति चाहते हैं वो जिनको नया कुछ करना भाता ही नहीं।  वही लोग वही बातें फिर से दोहराते रहते हैं।

No comments: