Friday, 1 September 2017

ग़ज़ल 219 जुर्म हम लोग बस एक करते रहे - डॉ लोक सेतिया " तनहा "

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे - लोक सेतिया "तनहा"

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे
अश्क़ पीते गये आह भरते रहे।

किस को झूठा कहें किस को सच्चा कहें
बात कर के सभी जब मुकरते रहे।

रात तूफान की बन गई ज़िंदगी
बिजलियों की चमक देख डरते रहे।

मुख़्तसर सी हमारी कहानी रही
जो बुने ख्वाब सारे बिखरते रहे।

हर कदम पर नये मोड़ आये मगर
हौंसलों के सफर कब ठहरते रहे।

लोग सब प्यार को जब लगे भूलने
कुछ सितारे ज़मीं पर उतरते रहे।

वो सितमगर सितम रोज़ ढाते रहे
और इल्ज़ाम "तनहा " पे धरते रहे।

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