Tuesday, 28 June 2016

नया फैशन सरकार का ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

सरकार का नया विज्ञापन आया है। ईमानदार सरकार का। अब ईमानदारी की सभी की अपनी परिभाषा होती है। मेरे शहर में बड़े अधिकारी की ईमानदारी यही है कि वो जिन से घूस लेता है उनको हर गलत काम खुल कर करने देता है। आप कितनी शिकायत करते रहो वो अपने कान बंद रखता है और आंखें भी। उसको किसी का अवैध कब्ज़ा नज़र आता ही नहीं न ही नियम तोड़ना , आप सड़क पर कब्ज़ा करें या फुटपाथ को रोक गंदगी फैलाते रहें आपको सब की अनुमति है। एक पुलिस अफ्सर नशा मुक्ति की बातें करता है और यह भी जानता है खुद उसका विभाग ही नशे का कारोबार करवा रहा है। जब किसी बस्ती के लोग शिकायत करते हैं और अफ्सर अपने अधीन अधिकारी को धंधा बंद कराने को कहता है और अधिकारी आदत के अनुसार कुछ नहीं करता तब अफ्सर को दिखाना होता है कि वह ईमानदार है। मगर जो पुलिस को बाकयदा हिस्सा देकर नशे का कारोबार करते हैं उनके प्रति अफ्सर भी ईमानदार होते हैं और जब ऐसे नशे की दुकान की शिकायत होती है तब खुद पुलिस के लोग खड़े होकर दूसरी जगह नई दुकान , या खोखा बनवा कारोबार चलाने वाले को अपनी ईमानदारी का सबूत देते हैं। नशे की लत से जब किसी की जान चली जाती है तब पुलिस का सभी अधिकारी खुद दखल देते हैं ताकि उस मौत को स्वाभाविक मृत्यु घोषित किया जा सके , ऐसे में सब चोर चोर मौसेरे भाई बन जाते हैं और डॉक्टर भी हार्ट अटैक से मौत होना घोषित कर देते हैं। सभी ईमानदार हैं , जिसकी खाते हैं उसकी बजाते हैं।
            इक अभिनेता ने इक राज्य में शराब बंदी पर बयान दिया कि वह उस राज्य में नहीं जाया करेंगे। उनका मानना है इस से अवैध ढंग से शराब बेचने वालों का धंधा चलता है और पीने वालों को अच्छी शराब नहीं मिलती है। बात तो ईमानदारी की है , यही होता है , देखा गया है। लेकिन बात सरकार की ईमानदार होने के विज्ञापन की हो रही थी। इक प्रधानमंत्री हुए हैं जिनके नाम के साथ भी ईमानदारी का तमगा लगा हुआ था , उनके काल में इतने घोटाले हुए इतना भ्र्ष्टाचार हुआ फिर भी उनका तमगा कायम रहा। जबकि वास्तव में जब एक कलर्क भी रिश्वत लेता है तब देने वाले को सरकार भ्रष्ट नज़र आती है। किस की चुनरी में दाग नहीं लगा , सभी कहते हैं लागा चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे। अब तो लोग कहते हैं दाग अच्छे हैं। मगर जाने क्यों इस सरकार को चकाचक सफेद पोशाक पहनने का महंगा शौक चर्राया है जो ये विज्ञापन बनवा लिया है। मुझे भी कभी सफ़ेद पैंट - शर्ट पहनने का शौक हुआ करता था और जब भी पहनी बरसात हो जाती थी और कहीं न कहीं से कोई छींटा दागदार कर देता था। अब बरसात का मौसम भी आने को है , खुदा सरकारी पोशाक की लाज रखना। मगर चिंता की कोई बात नहीं है , हर फैशन दो दिन बाद बदल जाता है। मुमकिन है सरकार भी अभी से अगले विज्ञापन को लेकर चर्चा करने लगी हो। क्योंकि हर कुछ दिन बाद सरकार को लगता है उसका विज्ञापन अब ऐतबार के काबिल नहीं रहा और उसको बदल देती है। ये नया फैशन भी सरकार का जल्द ही बदलेगा उम्मीद तो यही है।
                                    नर्म आवाज़ भली बातें मुहज़ब लहज़े ,
                                    पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं।
                                           ( किसी शायर का शेर है )

Sunday, 26 June 2016

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे ( ग़ज़ल 215 ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे ,
अश्क़ पीते गये आह भरते रहे।
किस को झूठा कहें किस को सच्चा कहें ,
बात कर के सभी जब मुकरते रहे।
रात तूफान की बन गई ज़िंदगी ,
बिजलियों की चमक देख डरते रहे।
मुख़्तसर सी हमारी कहानी रही ,
जो बुने ख्वाब सारे बिखरते रहे।
हर कदम पर नये मोड़ आये मगर ,
हौंसलों के सफर कब ठहरते रहे।
लोग सब प्यार को जब लगे भूलने ,
दो सितारे ज़मीं पर उतरते रहे।
कुछ सितमगर सितम रोज़ ढाते रहे ,
और इल्ज़ाम "तनहा " पे धरते रहे।

Sunday, 12 June 2016

फिर से इक बार ( कविता ) 120 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हमारी आंखों पर
बंधी हुई थी कोई पट्टी
और हम कोल्हू के बैल बन कर
रात दिन चलते गये चलते गये
पहुंचे नहीं कहीं भी
थे चले जहां से ,
रहे बस वहीं ही।
सोच रहे हैं अब
उतार फैंकें इस पट्टी को
और चल पड़ें
नई राह बनाने को जीवन की
ताकि बर्बाद न होने पायें
बाकी बचे पल जीवन के
शायद अभी भी
अवसर है हमारे पास
कुछ फूल खिलाने का
कुछ दीप जलाने का
कोई साज़ बजाने का
कोई गीत गुनगुनाने का।

Wednesday, 8 June 2016

रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

बहुत शोर करते हैं वो जब भी उनको लगता है कोई उन्हें मनमानी नहीं करने देता। बस तभी उनको विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की याद आती है। किसी और को भी आज़ादी है कुछ कहने की ये नहीं सोचते वो कभी भी। टीवी और सिनेमा का जितना दुरूपयोग इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया जा रहा है उतना शायद ही सही मकसद से हुआ हो। क्या ये भी अभिव्यक्ति की आज़ादी ही है कि जब आपकी फिल्म को जैसा आपने बनाया उसी तरह अनुमति नहीं मिलने पर आप निजि आरोप लगाने लग जाओ अथवा बिना जाने समझे किसी का समर्थन करने लगो। इक अभिनेता का ब्यान देखा जिसमें उनका कहना था , मुझे इस बारे जानकारी तो नहीं है मगर सिनेमा पर कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए। अर्थात इनको सब करने की छूट होनी चाहिए , वास्तव में यही तो है , इनसे कोई नहीं पूछता आपने क्या किया। सही या गलत। क्या दिखा रहे हैं मनोरंजन के नाम पर। महिलाओं के प्रति बढ़ती दूषित मानसिकता का प्रमुख कारण आप हैं। फिल्म ही नहीं समाज में कहीं भी किसी भी मंच पर आप औरत को मात्र इक वस्तु की तरह देखते हैं दिखाना चाहते हैं। कभी फुर्सत मिले तो सोचना आपने कैसे आदर्श प्रस्तुत किये हैं। ज़रा पुरानी फिल्मों को देखना जिन में समाज की समस्याओं पर सार्थक कहानियों की फ़िल्में बनी थीं , और फिर देखना आज की बनी फिल्में और उनका संगीत। शायद समझ आये आप कितना नीचे गिर चुके हैं। जब सफलता और बॉक्स ऑफिस सफलता ही एक मात्र ध्येय हो तब और क्या हो सकता है। फिल्म उद्योग धनवान हुआ होगा पैसे से मगर विचारों से नहीं , शायद कंगाल हो चुका है।
          वास्तव में सब कुछ पाने की भूख ने इनको विवेकशून्य कर दिया है और सही या गलत की समझ ही बाकी नहीं रही है इनको। इनको फिल्मों में अभिनय ही नहीं करना विज्ञापन भी करने हैं पैसे के लिए और विज्ञापन झूठे हैं या लोगों को नुकसान देते हैं , अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं या भर्मित करते हैं , इनको क्या मतलब। इस के बावजूद ये महान लोग हैं , कुछ भी बेचते हैं वो भी जो नहीं बिकता तो अच्छा था। अब तो इनको राजनिति भी करनी है भले राजनिति की समझ भी नहीं हो। इनको तो सांसद बनना है ताकि इक तमगे की तरह नाम के साथ ये शब्द भी जुड़ सके।
                                   रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ,
                                   इक नया कीर्तिमान हैं बना रहे।
                                   सुन रहे बहरे बड़े ध्यान से ,
                                   गीत मधुर गूंगे जब हैं गा रहे।
                                   

Tuesday, 7 June 2016

पापी पेट का सवाल है बाबा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

इक विज्ञापन देख रहा हूं कुछ दिन से टीवी पर , कुछ बच्चे आते हैं इक बूढ़े आदमी के घर , देखते ही वो कहता है , कल ही बोल दिया था मैं इस बार ईद पर ईदी नहीं दे पाऊंगा। बच्चे अपनी अपनी गुल्लक साथ लाये होते हैं , कहते हैं इस बार ईदी वो देंगे , मगर आपको नहीं घर को। तब फ़िल्मी अभिनेता शाहरुख़ खान आते हैं और घर को पेंट करने सजाने का काम करते हैं। इस विज्ञापन में बहुत कुछ छिपा है , लगता है लोग बड़े संवेदनशील हैं किसी की हालत देख खुद चले आये हैं सहायता को। मगर पता चलता है उनको इंसान की भूख की बदहाली की फ़िक्र नहीं है , फ़िक्र है घर की सजावट की रंग रोगन की। क्योंकि वही दिखाई देता है सभी को , आदमी के दुःख कहां देखता है कोई। सरकारी विज्ञापन भी इस से अलग नहीं हैं। गरीबों की रोटी की खातिर रोटी पर और टैक्स बढ़ा देती है। जो भी काम करती है मुनाफे का ही करती है , हर बार उसका खज़ाना और भर जाता है। जब कोई व्यापार करता है तब वो कुछ भी अपने पास से देता नहीं है , जितनी कीमत की वस्तु होती है उस से अधिक ही वसूल करता है , तभी उसका मुनाफा कभी कम नहीं होता। शायद बाबा रामदेव भी यही कहते हैं , वो जो भी कमाई करते हैं समाज सेवा के लिए ही करते हैं। ये समाज सेवा और धर्म शब्द हज़ारों साल से छलते आ रहे हैं लोगों को। भगवान के मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे अगर बांटते तो कब के खाली हो जाते उनके कोष , मगर उनकी दौलत है कि बढ़ती ही जाती है। मतलब साफ़ है छीनते अधिक हैं बांटते कम ही हैं। देने वाला कौन है ? सभी तो खुद और जमा करना चाहते हैं , चाहे जनहित की बात करती सरकार हो या दया धर्म की बात करते खुदा को बेचने वाले लोग। राजनेताओं और सरकारी लोगों के ठाठ बाठ गरीब देश की जनता के दम पर हैं तो इन धर्म के कारोबारियों की ऐश भी उन्हीं से ही है। सभी को आपके दुःख दर्द को बेचना है अपने धंधे की खातिर।

Monday, 6 June 2016

थकान ( कविता ) 119 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जीवन भर चलता रहा
कठिन पत्थरीली राहों पर
मुझे रोक नहीं सके
बदलते हुए मौसम भी
पर मिट नहीं सका
फासला
जन्म और मृत्यु के बीच का ,
चलते चलते थक गया जब कभी
और खोने लगा धैर्य
मेरी नज़रें ढूंढती रहीं
किसी को जो चलता
कुछ कदम तक साथ साथ मेरे
और प्यार भरे बोलों से
भुला देता सारी थकान ,
जाने कहां अंत होगा
धरती - आकाश से लंबे
इस सफर का
और कब मिलेगा
मुझे आराम।