Saturday, 26 March 2016

मेरा विवेक जगाता है मुझे ( कविता ) 114 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

आज इक बार फिर ,
इक कहानी पढ़ते पढ़ते ,
सोच रहा था ,
मुझे भी उस कहानी के ,
किसी पात्र की तरह ,
अच्छा ,
बहुत अच्छा बनना है।
सभी मुझे समझते हैं ,
मैं बहुत अच्छा हूं ,
सच्चा हूं ,
मगर खुद अपनी नज़र में ,
मुझ में कमियां ही कमियां हैं ,
सोचता रहता हूं ,
मैं क्यों नहीं बन पाया वैसा ,
जैसा बनना चाहिए था मुझे।
शायद इस दुनिया में अच्छा ,
सच्चा बनकर जीना ,
मुश्किल ही नहीं ,
असंभव काम भी है ,
और मैंने किया है उम्र भर ,
असंभव को संभव करने का प्रयास।
मुझे किसी ने पढ़ाया नहीं ,
सच्चाई और उसूलों का पाठ ,
बल्कि हर कोई समझाता रहा ,
दुनियादारी को सीखने की ज़रूरत।
बस मेरा किताबें पढ़ने का शौक ,
अच्छी फिल्मों को देखने का जुनून ,
मुझे समझाता रहा सही और गलत ,
अच्छे और बुरे का अंतर करना ,
और मुझ में मेरा ज़मीर ,
ज़िंदा रहा हर हाल में।
जो काम शायद किसी गुरु की शिक्षा ,
किसी प्रचारक के उपदेश नहीं कर सके ,
मेरे विवेक ने खुद किया हर दिन ,
वही काम मार्गदर्शन देने का मुझे ,
इसलिए हमेशा की तरह फिर ,
आज भी मैंने किया है निर्णय ,
तमाम कठिनाईयों के बावजूद ,
अकेले उसी राह पर चलते रहने का।

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