Saturday, 26 March 2016

मेरा विवेक जगाता है मुझे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरा विवेक जगाता है मुझे ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

आज इक बार फिर
इक कहानी पढ़ते पढ़ते
सोच रहा था
मुझे भी उस कहानी के
किसी पात्र की तरह
अच्छा
बहुत अच्छा बनना है।

सभी मुझे समझते हैं
मैं बहुत अच्छा हूं
सच्चा हूं
मगर खुद अपनी नज़र में
मुझ में कमियां ही कमियां हैं
सोचता रहता हूं
मैं क्यों नहीं बन पाया वैसा
जैसा बनना चाहिए था मुझे।

शायद इस दुनिया में अच्छा
सच्चा बनकर जीना
मुश्किल ही नहीं
असंभव काम भी है
और मैंने किया है उम्र भर
असंभव को संभव करने का प्रयास।

मुझे किसी ने पढ़ाया नहीं
सच्चाई और उसूलों का पाठ
बल्कि हर कोई समझाता रहा
दुनियादारी को सीखने की ज़रूरत।

बस मेरा किताबें पढ़ने का शौक
अच्छी फिल्मों को देखने का जुनून
मुझे समझाता रहा सही और गलत
अच्छे और बुरे का अंतर करना
और मुझ में मेरा ज़मीर
ज़िंदा रहा हर हाल में।

जो काम शायद किसी गुरु की शिक्षा
किसी प्रचारक के उपदेश नहीं कर सके
मेरे विवेक ने खुद किया हर दिन
वही काम मार्गदर्शन देने का मुझे
इसलिए हमेशा की तरह फिर
आज भी मैंने किया है निर्णय
तमाम कठिनाईयों के बावजूद
अकेले उसी राह पर चलते रहने का।

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