Thursday, 24 March 2016

आज मनाई होली इस तरह ( इक सच - कविता ) 113 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सुबह से शाम हो गई है ,
सोच रहा हूं मैं होली के दिन ,
क्या ऐसे ही होती है होली
जैसे आज मनाई है मैंने।
कभी वो भी बचपन की होली थी ,
जब बक्से से निकाल के देती थी ,
मां हमें चमचमाती हुई पुरानी ,
स्टील और पीतल की सुंदर पिचकारी।
और घोलते थे रंग कितने ही मिला पानी में ,
भरने को दिन भर जाने कितनी बार ,
खेलते थे बड़ों छोटों के साथ मस्ती में ,
मन में भरी रहती थी जाने कैसी उमंग।
फिर होते गये हम बड़े और समझदार ,
बदलता गया ढंग हर त्यौहार मनाने का ,
सोच समझ कर जब लगे खेलने होली ,
नहीं रही मन की उमंग और होता गया ,
हर बरस पहले से फीका कुछ हर त्यौहार।
आज चुप चाप बंद कमरे में अकेले ही ,
खेली दिन भर हमने भी ऐसे कुछ होली ,
जैसे किसी अनजान इक घर में हो खामोश ,
पिया बिना नई नवेली दुल्हन की डोली।
फेसबुक पर कितनी रंग की तस्वीरें ,
कितने सन्देश कितने लाईक कमेंट्स ,
मगर दिल नहीं बहला लाख बहलाने से ,
किसी को नहीं भिगोया न हम ही भीगे ,
ये कैसे दोस्त सच्चे और झूठे जाने कैसे ,
नहीं आई घर बुलाने कोई भी टोली हमजोली।
की बातें फोन पर सभी से कितनी दिन भर ,
ली और दी हर किसी को होली की बधाई ,
बने पकवान भी कुछ मंगवाये बाज़ार से ,
लगी फिर भी फीकी हर तरह की मिठाई।
लेकिन हम सभी को यही बतायेंगे कल ,
बहुत अच्छी हमने ये होली है मनाई ,
नहीं जानते कैसे क्या क्यों बदला है ,
मगर खुशियां होली की हो गई हैं पराई।

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