Monday, 3 November 2014

दो आज़ाद पंछी गगन के ( कहानी ) डा लोक सेतिया

महानगर के बस अड्डे पर अचानक प्रेम व प्रीति की मुलाकात हो गई। सालों बाद इस प्रकार कॉलेज का पुराना सहपाठी कभी कोई ऐसे मिल जाये तो यूं लगता है मानो गुज़रा हुआ ज़माना वापस लौट आया है। इत्तेफाक से दोनों को अपनी अपनी कंपनी के काम से एक ही नगर को जाना था। दो दिन के लंबे सफर में तो अजनबी सहयात्री भी अपने से लगने लगते हैं , ऐसे में पुराना सहपाठी मिल जाये तो मन झूमने लगता है। प्रेम और प्रीति दोनों को भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा था। प्रेम ने बुकिंग विंडो पर जाकर दोनों की टिकट बुक करवा ली थी और बस में साथ साथ बैठ कर कॉलेज के दिनों की बातें करने लगे थे। कुछ ही पल में ऐसे घुल मिल कर बातें कर रहे थे जैसे वो कभी बिछुड़े ही नहीं थे। बातों बातों में दोनों ने इक दूजे से विवाह और जीवन साथी के बारे भी पूछा था जिसका जवाब दोनों ने ही इस प्रकार संक्षिप्त सा दिया था मानो उनको इस विषय पर बात करनी ही नहीं हो। मगर शायद दोनों को ही ये बात समझ आ गई थी कि मेरी तरह उसको भी ज़िंदगी की सच्ची खुशी हासिल नहीं हुई है और उसके सपने भी मेरी तरह टूट कर बिखर चुके हैं। दोनों जिधर ज़िंदगी ले जा रही थी जाते जा रहे हैं। कुछ ही घंटो में वे इक दूजे से इतना बेतकल्लुफ हो बात करने लगे थे जितना कॉलेज में चार साल साथ पढ़ते भी नहीं हो पाये थे। प्रीति को तब प्रेम की बातें अजीब लगती थी जब वो बहस में अपनी बात पर अड़ जाता था कि पैसा ही सब कुछ नहीं होता , और हमें सुंदरता को महत्व नहीं देकर व्यक्ति के सवभाव को देखना चाहिये। सुंदरता हमेशा नहीं रहती है , मधुर व्यवहार हमेशा साथ रहता है और सच्चा मित्र सुख दुःख दोनों में साथ देता है , जो वक़्त और ज़रूरत को दोस्त बनाता है वो दोस्ती का अर्थ नहीं जनता। प्रेम मानता था कि दोस्त बहुत मुश्किल से मिलता है हर किसी को दोस्त नहीं समझा जा सकता। जिसके बहुत दोस्त होते हैं वास्तव में उसका कोई दोस्त नहीं होता है। प्रीति का विचार था कि किसी को भी सीधा सरल नहीं होना चाहिये जैसा समय हो खुद को उसी तरह बदल लेना चाहिये। खुश रहने के लिये पैसा और दोस्त जितने भी बन सकें बनाना चाहिये। प्रेम की भावुकतापूर्ण बातें प्रीति को पसंद नहीं आती थी , उसको रमेश की बातें अच्छी लगती थी जो रोज़ नये नये दोस्तों के साथ कर्यक्रम बनाने और मौज मस्ती से जीने में यकीन रखता था। प्यार मुहब्बत को रमेश किस्से कहानियों की बातें समझता था और कहता था कि असली जीवन में ये सब फ़िज़ूल की बातें हैं। इसके बावजूद प्रीति के दिलोदिमाग पर रमेश ही छाया रहता था , उसको मालूम था कि प्रेम क्यों उसको चोरी चोरी अजीब सी नज़रों से देखता रहता है , जैसे कुछ कहना चाहती हों उसकी नज़रें प्रीति से। उसकी सहेली आशा कहती थी प्रेम तुमको बेहद चाहता है उसे अपना दोस्त बना लो मगर प्रीति को प्रेम का ऐसे उसको तिरछी नज़रों से तकना बिल्कुल पसंद नहीं था , वो सोचती रहती थी काश कभी रमेश उसको ऐसी नज़रों से देखे। उसने प्रेम को कभी कोई अहमियत नहीं दी थी , एक बार जब कॉलेज के वार्षिक समारोह में प्रेम ने कोई नाटक प्रस्तुत करना था और उससे पूछा था नायिका का किरदार निभाने के बारे तब प्रीति ने जैसे उसको डांट ही दिया था "तुमने ऐसा सोचा भी कैसे कि मैं तुम्हारी नायिका का अभिनय करने को मान जाउंगी"। मगर प्रेम ने तब इतना ही कहा था तुमको मेरी बात बुरी लगी है तो क्षमा चाहता हूं। प्रेम का चेहरा बुझ सा गया था और उसने नाटक का विचार ही छोड़ दिया था। प्रीति को ये समझना ज़रूरी नहीं लगा था कि किसलिये प्रेम ने उसकी जगह किसी और लड़की को अपने साथ नाटक में शामिल होने को नहीं कहा था। प्रीति के उपेक्षापूर्ण व्यवहार से प्रेम चुप चाप रहता था पर कभी कोई शिकायत नहीं करता था। जब भी परीक्षा नज़दीक होती प्रेम खुद उससे पूछता था किसी तरह की कोई ज़रूरत तो नहीं प्रीति को और तब प्रीति उसके नोट्स लिया करती अपनी कई प्रॉब्लम्स हल करवाती थी प्रेम से। मगर प्रीति रमेश के प्रति आकर्षित थी चाहे वो प्रीति को कभी भी विशेष महत्व नहीं देता था आशा ने कितनी बार समझाया था प्रीति को कि ये इकतरफा प्यार तुमको कुछ नहीं देगा , पर दिल पर किसी का बस नहीं होता है , जो आसानी से मिल रहा हो अक्सर हम उसकी कद्र नहीं करते और जो नहीं हासिल हो सके उसको पाने को तरसते रहते हैं। सभी कभी न कभी ऐसी मृगतृष्णा का शिकार हो जाते हैं। मगर प्रीति को वही प्रेम आज बेहद अच्छा लग रहा था और उसके मन में ये सवाल खुद ही आया था कि किसलिये उसने प्रेम से तब उपेक्षा का व्यवहार किया था जबकि उसने कभी कोई खराब हरकत नहीं की थी कोई गल्त बात न बोली थी , उसने तो अपने मन की बात तक भी प्रीति को नहीं कही थी। शायद आशा सही कहती थी कि ये भी उसके प्यार का ही इक रूप था , प्रीति खुद ही मानना नहीं चाहती थी कि वो प्रेम को भी चाह सकती है , आशा शायद उसको खुद से ज़्यादा समझती थी। बीते समय की बातें करते करते दोनों खो गये थे यादों में , और इक ख़ामोशी सी छा गई थी। जाने कब प्रीति प्रेम के कंधे पर सर रख कर गहरी नींद में सो गई थी। तभी इक हिल स्टेशन पर बस पहुंच कर रुकी थी , सभी यात्रियों से कहा गया था कि अब चार घंटे रुकना है यहां ताकि सब उस खूबसूरत जगह को देख सकें। शाम छह बजे तक सबको वहीं आना था आगे का सफर जारी रखने के लिये।
                             आज प्रेम और प्रीति दोनों को लग रहा था अब कुछ दिन खुश रह सकते हैं घर के तनाव भरे माहौल से दूर किसी दोस्त के साथ हंस कर जी सकेंगे। उनको लगता था जैसे उनकी ज़िंदगी में जहां पतझड़ ही पतझड़ थी , कोई खुशबू नहीं किसी फूल की उसमें अचानक बहार आ गई हो चार दिन को ही सही। प्रीति ने कुछ सोच कर प्रेम से कहा था क्यों न हम इस जगह की सैर करने की जगह कहीं चल कर बैठें ताकि अपना हल चाल बता सकें पूछ सकें। थोड़ा आराम भी मिलेगा और हम शायद इक दूसरे को करीब से समझना भी चाहते हैं। प्रेम ने कहा था प्रीति यही ठीक है घूमना तो कभी भी हो सकता है मगर हम जाने फिर कब यूं मिल सकें। वे अपने अपने बैग लेकर कुछ दूर इक पार्क में चले आये थे , प्रेम पास से कुछ खाने को और दो कप काफी ले आया था और प्रीति ने घास पर इक चादर बिछा दी थी ताकि बैंच पर न बैठ कर उसपर आराम से बैठा जा सके। काफी पीते पीते प्रीति ने कहा था प्रेम तुम कॉलेज में जो बातें किया करते थे मुझे तब उनकी समझ नहीं थी मगर अब उसको समझती हूं , जानती हूं तुम्हें किसी दोस्त की तलाश थी , शायद मुझे तुमने हमेशा अपनी मित्र ही समझा मगर मुझे ही नहीं पता था कि तुम मेरे लिये क्या हो। तुमने तब कभी कुछ नहीं कहा था और आज भी जब हम दोनों विवाहित हैं तब तो शायद बिल्कुल ही नहीं कह सकोगे , मगर मुझे आज अपनी भूल का सुधार करना ही है ,ये अवसर दोबारा मिलेगा ऐसी संभावना नहीं नज़र आती कहीं। इन कुछ ही पलों में हम जितना करीब हो गये हैं कॉलेज में चार साल में कहां हो सके थे। प्रेम मुझे कब से इक ऐसे सच्चे दोस्त की ज़रूरत महसूस होती रहती थी जिसको मैं अपना सब कुछ बिना झिझक बता सकूं पूर्ण विश्वास करके , मगर नहीं मिला एक भी , हम चाहे कॉलेज में अधिक करीब नहीं हुए हों तब भी इक दूजे को बहुत भली भांति समझते तो रहे हैं , इसलिये मुझे लगता है अब तुम और मैं चाहे दूर ही रहते हों दोस्ती का रिश्ता निभा सकते हैं। मैं तुम पर पूरा भरोसा करती हूं इसलिये अपनी हर बात तुम्हें बताना चाहती हूं ताकि जब भी मुझे ज़रूरत हो इक सच्चे दोस्त की सलाह मिल सके और तुम भी मुझे अपनी ऐसी ही दोस्त अभी भी समझ सको तो सच मैं भग्यशाली हूंगी तुम्हारी सच्ची दोस्त बन कर। प्रीति की बात सुन कर प्रेम ने कहा था जो तुमने आज कहा है वो शायद मेरा ही सपना है , ये तुमने जब कहा तब तुम भी जानती थी मैं भी यही चाहता रहा हूं और समझती भी हो कि ये कहने का साहस मैं आज भी नहीं कर पाउंगा। अब शायद नियति ने हमें इसलिये ही इस मोड़ पर फिर से मिलवा दिया है ताकि हम आपस में अपने जीवन की हर बात सांझी कर थोड़ा सुकून हासिल कर सकें। प्रीति अब तुम बता सकती हो तुम्हारे जीवन में जो भी कठिनाई हो , क्या तुम्हारी पति से या घर में किसी से कोई समस्या है जो हमेशा चहकने वाली प्रीति यूं गुमसुम हो गई है। प्रीति ने कहा प्रेम आज मुझे तुमसे सब बताना है अपने बारे जो कभी किसी को नहीं बता सकी। प्रेम ऐसा नहीं है कि मेरे पति कोई बुरे इंसान हैं , मगर अक्सर जो हम सोचते हैं वो वैसा मिलता नहीं ज़िंदगी से , मेरे पति को मेरे काम करने से जॉब करने से कोई ऐतराज़ तो नहीं है लेकिन वो मेरी क़ाबलियत को बिल्कुल महत्व नहीं देते। वही पुरानी सोच , औरत मर्द के पांव की जूती है , उसका अपमान करना मर्दानगी है , उसको प्रताड़ित करना पति का अधिकार। पत्नी को सर पर नहीं बिठाना चाहिये , उसको दबा कर रखना चाहिये , वो बस उपयोग की इक वस्तु मात्र है जब मन चाहा जैसे भी इस्तेमाल किया। इक ऐसा जीवन साथी जो भावनाशून्य हो , आदमी नहीं कोई मूरत हो पत्थर की , जो समझता हो औरत को खाना पीना गहने कपड़े मिल रहे तो और क्या चाहिये उसको। प्यार की दो बात के लिये समय नहीं हो जिसके पास , हर शाम थक कर आना घर और खा पी कर सो जाना , कुछ भी न पूछना न ही कुछ भी बताना। लगता है दो अजनबी इक साथ रहते मज़बूरी में। कभी शराब के नशे में प्यार की बात भी ऐसे करना जैसे पत्नी नहीं बाज़ार से खरीदी कोई वस्तु है जिसको चाहे इस्तेमाल किया चाहे रख छोड़ा कहीं। प्रेम लगता है ज़िंदगी की गाड़ी दो बेमेल पहियों पर घिसट कर चल रही है , जाने अनजाने , किधर जाना नहीं मालूम। कोई कारण नहीं कि अलग होने की बात कहें पर साथ रहने को मन चाहे ऐसा भी कुछ नहीं , इक नीरस सा जीवन जैसे कोई बोझ है जिसको ताउम्र ढोना है। प्रेम यही है मेरी ज़िंदगी की कहानी , खुद ही तुम्हें बतानी चाही है क्योंकि कभी कोई और मुझे तुमसा विश्वसनीय मिल ही नहीं सका। प्रेम तुम भी मुझे अपनी हर बात बताना चाहो ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है , फिर भी अगर तुम भी मुझे ऐसे ही अपना सुख दुःख का साथी समझ कर अपने जीवन के बारे अपनी ख़ुशी अपने दर्द के बारे बता सको तो मुझे अच्छा भी लगेगा और ख़ुशी भी होगी। मुझे पता है मेरे पति जैसा व्यवहार तुम किसी भी महिला से नहीं कर सकते , तभी ये सब तुमको बताने से मुझे इक राहत सी मिली है।
                                              प्रीति की बात सुनने के बाद प्रेम ने कहा , प्रीति तुम्हारी ही तरह मैंने भी अपनी बात किसी से नहीं की आज तक , लेकिन तुम जानती हो तुमसे नहीं छिपा सकता। अब इसलिये भी बताना चाहता हूं ताकि तुम समझ सको कि तुम अकेली नहीं हो दुनिया में जिसके सपने टूट कर बिखर गये , मैं भी ऐसे लोगों में शामिल हूं और हम जैसे जाने और कितने लोग हैं जो ऐसे ही जीते हैं घुट घुट कर। सच कहूं तो मुझे कभी किसी से कोई भी शिकायत नहीं होती है , बस इतना नहीं समझ पाता कि सब से मुझे तिरस्कार किसलिये मिलता है हमेशा। अपनी पत्नी को मैं इस दुनिया का सब से नकारा और बेवकूफ व्यक्ति लगता हूं। हर दिन मुझे नाकाबिल होने के ताने देती है , आस पास के बाकी सभी पुरुष उसको काबिल और समझदार लगते हैं , वो अपनी किस्मत को कोसती है जो मुझ जैसा पति उसको मिला। वो कहती है वो कितना भी प्रयास कर ले मैं कभी नहीं सुधर सकता। ये बात सच भी है मैं जैसा भी हूं वैसा ही रहना चाहता हूं , बदलना नहीं चाहता। मुझे हमेशा यही एहसास रहता है कि मैं कभी किसी को भी प्यार के काबिल नहीं लग सकता। क्या मुझे शादी करनी ही नहीं चाहिये थी , और विवाह करके मैंने पत्नी का जीवन बर्बाद कर दिया है। मुझे कभी ये बात नहीं समझ आई कि अगर मैं उसको इतना बुरा लगता हूं तो वो मुझे छोड़ किसलिये नहीं देती , इतनी नफरत भरी है उसके मन में मेरे लिये तब भी कैसे मेरे साथ रहती है। मैं खुद उसको छोड़ कहीं नहीं जा सकता क्योंकि समझ नहीं आता कि जाऊं तो कहां , इक दोस्त तक नहीं मिला जिसको समझा सकता अपना हाल। मैंने हमेशा प्रयास किया उसको हर मुमकिन सुख सुविधा देने का , हर कदम साथ देता रहा हूं मगर उसकी हर अपेक्षा हर चाहत को नहीं कर पाया पूरा। कारोबार में बार बार असफल होने से मेरा आत्मविश्वास बिखर चुका है और मैं ज़िंदा हूं क्योंकि जीना है मरने तक। प्रेम की कहानी सुन प्रीति की आह निकल गई , वो बोली प्रेम लगता है तुम्हारी और खुद मेरी ज़िंदगी की बर्बादी का कारण मैं हूं , काश मैंने तभी तुमसे रिश्ता कायम किया होता और तुमको वो सब देती जो मुझे देना चाहिये था , और मुझे जो भी चाहिये था बिना मांगे ही मिल जाता। जाने क्यों प्रीति की बात सुन प्रेम की आंखें भर आई थी , ये देख प्रीति ने कहा था प्रेम अब मैं तुमको कभी रोने नहीं दूंगी , हम अब चाहे कहीं भी रहें इक दूसरे का साथ हर ख़ुशी हर दुःख में देते रहेंगे। जो बात आज मैं कहने जा रही हूं वो दुनिया को शायद कभी समझ नहीं आये मगर मेरा विश्वास है कि तुम मेरी भावना को समझोगे। हमारा अपराध क्या है ? हम प्यार के सम्मान के अपनेपन के भूखे हैं तो इसमें गलत क्या है , क्या हमें अपनी ज़िंदगी जीने का हक नहीं है।तमाम उम्र हम दोनों किसी और के अनुसार कैसे जी सकते हैं , और ऐसा करने के बाद भी हम दोनों से हमारे विवाहित जीवनसाथी खुश नहीं होने वाले न ही खुद हमको कभी कोई ख़ुशी देने वाले हैं , ये बात मैं भी जानती हूं और तुम भी प्रेम। शायद जीवन भर हमें ऐसे ही घुट घुट कर जीना होगा। अब जब किस्मत ने हमें एक सप्ताह के लिये साथ रहने का अवसर दिया है तो क्यों न हम इसको वैसे बितायें जैसा हम कॉलेज के दिनों में दोस्ती कर के बिता सकते थे। तुम्हारी इक तम्मना मैं पूरी कर सकूं और तुम भी मेरी इक आरज़ू और चाहत को पूरा कर सको। हम अगले सात दिन के लिये भूल जायें कि हमारी किसी से शादी हो चुकी है , मैं केवल प्रीति हूं किसी की पत्नी नहीं और तुम सिर्फ प्रेम हो किसी के पति नहीं। मेरी ये बात सुनकर कोई और मुझे बदचलन समझे मगर तुम मेरी भावना को समझना , हम दोनों तपती गर्मी में झुलसते रहे कुम्लाहे मुरझाये से पौधे हैं जिनको आने वाले सात दिनों की बरसात नया जीवन दे सकती है। मुझे पता है प्रेम तुम ये बात कभी नहीं कह सकते , मैं खुद लाज शर्म को छोड़ कर जाने कैसे ये कह रही हूं ताकि जो सच्चा प्यार मुझे नहीं मिला कभी मेरी ही भूल से उसको पा सकूं और शायद अपनी भूल का प्रायश्चित भी कर पाऊं। तुम तब भी बोले थे जब कोई बंधन नहीं था तो अब तो कभी नहीं बोलते लेकिन मुझे लगता है तुमने जितना प्यार मुझसे किया शायद कोई किसी से नहीं कर सकता। मैंने भी इक सपना देखा है कि काश कभी कोई मुझे भी मुहब्बत से प्यार से सम्मान से , मेरी इच्छाओं का आदर करते हुए अपना बनाये। एक पवत्र प्रेम न कि शारीरिक आकर्षण या केवल वासना , प्रेम क्या ऐसा मुमकिन है अब ये सात दिन हम इक दूजे के होकर जियें। जैसे सदा सदा से हम इक दूसरे के हैं और बाकी दुनिया से अपना कोई नाता नहीं है। प्रेम प्रीति की बातें सुनते सुनते जैसे किसी सपनों की दुनिया में खो गया था , बोला था प्रीति क्या ये सच है या मेरा सपना , कॉलेज के दिनों मैंने हमेशा यही ख्वाब देखा था कि इक दिन तुम खुद मेरे पास आओगी और अपने प्यार का इज़हार करोगी। अब दुनिया क्या सोचती है इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है , मेरी ज़िंदगी मेरी है और तुम्हें भी अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का पूरा अधिकार है। इसलिये तुम्हारा ये प्रस्ताव मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है। अगले सात दिन हम प्रेमी प्रेमिका बन कर ही जियेंगे ताकि इन दिनों का खुशनुमा एहसास उम्र भर हमें जीने की ऊर्जा प्रदान करता रहे। कहते हैं न ज़िंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है , चाहे थोड़ी भी हो ये उम्र बड़ी होती है। प्रेम ने पूछा था प्रीति मैंने कभी तुमको कोई उपहार देने को सोचा था मगर नहीं दिया ये सोच कर कि तुम स्वीकार न करोगी , क्या आज मैं कुछ देना चाहूं तो तुमको मंज़ूर होगा। "ज़रूर "प्रीति बोली थी आओ बाज़ार चलें हमें बस का समय होने से पहले वापस भी आना है। प्रीति ने प्रेम की पसंद की ड्रेस , चूड़ियां , बिंदी , लिपस्टिक ले ली थी , इक मंगल सूत्र को देख रुक गया तो प्रीति ने कहा था ले लो मुझे पसंद है। वक़्त गुज़रते पता ही नहीं चला था और जब तक बस स्टैंड पर पहुँचते उनकी बस निकल चुकी थी। लेकिन उनको बस छूटने का कोई अफ़सोस नहीं था , दूसरी कोई बस भी नहीं मिल सकती थी और उन्होंने तब वहीं किसी होटल में वो रात इक साथ गुज़ारने का तय कर लिया था। प्रेम ने पूछा था प्रीति क्या दो कमरे लेने हैं , प्रीत ने कहा था नहीं अब जब तक यहां हैं एक ही कमरे में रहेंगे। होटल के कमरे में आकर दोनों ने इक दूजे से उपहार में मिले कपड़े पहने थे , और इक दूजे को प्यार भरी नज़रों से निहारते रहे थे। प्रीति ने आज प्रेम को पति मान अपना श्रृंगार किया था और ये सोच खुद ही शरमा रही थी , फिर प्रेम के करीब जाकर बोली थी मेरा मंगलसूत्र कहां है प्रेम जी। प्रेम को लगा था मानो आज सारी दुनिया उसके कदम चूमने लगी है और उसने मंगलसूत्र प्रीति के गले में पहना दिया था। प्रीति ने झुक कर प्रेम के पांव छू लिये थे और पत्नी की तरह अपने हाथों को अपनी मांग पर फेरा था जैसे पति का आशिर्वाद लिया हो। ये प्यार वालों का अपना बंधन था जिसमें किसी तीसरे की कोई ज़रूरत नहीं थी , उन्होंने खुद को पति पत्नी मान लिया था। प्रेम जब सोफे पर सोने लगा तब प्रीति ने कहा था प्रेम दुनिया की नज़र में मेरा पति कोई भी हो मेरे लिये तुम ही मेरे पति हो सब कुछ हो , मैं आज खुद को तन मन से तुम्हें समर्पित करती हूं , मुझे अपना लो अपनी आगोश में ले लो , आज की रात अपनी सुहागरात है। मुझे अपना प्यार तुम पर बरसाना है और तुम भी मेरी जन्म जन्म की प्यास बुझा दो। ऐसे वो दोनों सुध बुध खो इक दूजे में समा गये थे , प्यार के सच्चे रिश्ते के लिये दुनिया के सब रिश्तों को भुलाकर।
     अगली सुबह उनको उठते ही जाना था बाकी सफर पूरा करने ताकि जिस काम को जाने को निकले थे वो पूरा कर सकें और अगले छह दिन साथ गुज़ार सकें ऐसे ही। टैक्सी मिल गई थी और सफर पूरा करने के बाद उन्होंने उस शहर में भी एक ही कमरा लिया था होटल में। सफर की थकान मिटाने को वो जल्दी ही सो गये थे।
   जब अगली सुबह जागे तो सुबह का अख़बार पढ़कर दंग रह गये थे , खबर छपी थी कि जिस बस में वो यात्रा कर रहे थे वो उसी रात खाई में गिर गई थी और उसमें जितने मुसाफिर थे सब मर गये थे। टूरिस्ट कंपनी ने उनका नाम भी दे रखा था मरने वालों की लिस्ट में। उनको समझ नहीं आ रहा था कि इस खबर का सन्देश क्या है। क्या वे अपने अपने घर सूचित कर दें कि हम ज़िंदा हैं या इस खबर को अपने लिये इक उपहार समझ जिस प्यार के रिश्ते को सात दिन को अपनाया था उसको उम्र भर का नाता मान लें। क्या अपने परिवार वालों को सच सच बता दें कि हम उस बस में नहीं थे और इक साथ पुराने सहपाठी के साथ थे दो दिन दो रात इक साथ। मुमकिन है तब वो कहते इससे तो अच्छा होता तुम मर ही जाते। काफी विचार विमर्श के बाद उन्होंने इसे तकदीर का फैसला समझने का निर्णय लिया है , और तय किया है कहीं और जाकर अपनी प्यार की नई दुनिया बसा लेंगे। अपना जीवन जीने का हक सभी को है , प्रेम प्रीति भी अपने सपने साकार करना चाहते हैं। घुट घुट कर मरने से अच्छा है दुनिया की नज़र में मर कर भी प्यार की दुनिया बसा कर ख़ुशी से जीना। ये सोच कर दोनों को लगा था वे अब किसी बंद पिंजरे के पंछी नहीं हैं , खुले गगन के दो आज़ाद पंछी हैं। "पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में , आज मैं आज़ाद हूं दुनिया के चमन में "। प्रीति गुनगुना रही थी , उन दोनों के मन मयूर नाच रहे थे।
                                   ( इक सत्य घटना पर आधारित है ये कहानी )

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