Wednesday, 29 August 2012

दो दिल दो जिस्म इक जान ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 

       दो दिल दो जिस्म इक जान ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

       ये लेखक के जीवन का अनुभव होता है कि कभी आस पास के लोग उसकी कहानी के किरदार बन जाते हैं कभी कोई काल्पनिक किरदार वास्तविक ज़िंदगी में मिल जाता है। लेखक दो चाहने वालों की कहानी लिखते लिखते अपनी पिछली कहानी के किरदार की अधूरी चाहत को पूरी करने की अपनी इच्छा को भूला नहीं है। जाने क्यों उसको लगा कि काश उस कहानी का नायक नई इस कहानी की नायिका से मिल जाता और दोनों को अपनी अपनी तलाश हासिल हो जाती। इतनी दूर रहते अपनी अपनी बेड़ियों में जकड़े सामाजिक बंधन में अनचाही कैद में रहते कैसे मिलते भला। सोशल मीडिया पर उनकी दोस्ती करवाई यही सोचकर कि शायद जैसा लेखक सोचता है दोनों अच्छे दोस्त बनकर इक दूजे का दुःख दर्द परेशानी समझ थोड़ी ख़ुशी और राहत का अनुभव कर सकेंगे।
 
   बात शुरू हुई थी इक कहानी के दो लोगों से शायद नसीब को उस कहानी के बहाने सच्ची इक कहानी की शुरुआत करनी थी। सागर को वर्षा की मानसिक दशा अपने जैसी लगी थी जाने क्यों मन चाहा उसकी निराशा को भगाकर उसके आंचल को आशा के फूलों से भर दे। वर्षा के जीवन साथी का निधन हो चुका था और उसको कोई भी व्यक्ति साथ और मार्गदर्शन को मिला नहीं था जिस से मन की चिंता की बात कह सके। कुछ ही दिन में वर्षा को सागर में अपने सपनों का हमराही दिखाई देने लगा था। सागर को जीवन में कोई दोस्त नहीं मिला था मगर जाने क्यों वर्षा से बात करने के बाद महसूस हुआ यही मेरी ज़िंदगी की तलाश है। वर्षा को समझ आ गया था कि सागर को किसी अपने की चाहत है। दुनिया की नज़र में और सामाजिक बंधनों में बंधे दोनों किसी रिश्ते में नहीं बंध सकते थे ये बात जान कर भी दोनों अपने अपने दिल पर काबू नहीं रख पा रहे थे। कोई जैसे उनको इक दूसरे की तरफ खींच रहा था मगर मन में दुविधा थी कि दोनों नहीं समझ पा रहे थे दूसरे की भावना क्या है। कहीं वो मुझे गलत ही नहीं समझ ले और दोस्ती का भी रिश्ता टूट नहीं जाए। 

     इक दिन वर्षा ने सागर की निजी ज़िंदगी को लेकर पूछ ही लिया और जान लिया कि वास्तव में हम दोनों एक जैसे अकेले अकेले हैं कहने को बाक़ी सब हैं। सागर कोई बात कहने के बाद संकोच करते सवाल करता वर्षा आपको कोई बात अच्छी नहीं लगे तो कह देना मन में कोई नज़रज़गी मत रखना। वर्षा ने कहा आपको मुझसे कुछ भी कहने का अधिकार है और हम किसी छोटी सी बात से अपने साथ को कभी छोड़ नहीं सकते हैं। आज आपको बताती हूं मुझसे किसी ने पहले कोई दोस्ती वाला रिश्ता बनाना चाहा तो मैंने उसको हमेशा रोक दिया और साफ साफ कह दिया कि अकेली होने से हर किसी से दोस्ती नहीं करती महिला , जब वास्तव में कोई अच्छा लगता है तभी उस से खुलकर बात करती है औरत। आपको पसंद करती और भरोसा है तभी आप से दिल की बात कहना चाहती हूं। 

    समझ कर भी अभी सागर को झिझक थी क्योंकि उसके और वर्षा के सामाजिक स्टेटस में अंतर था। मगर जब वर्षा ने इशारे इशारे में जैसे भी चाहोगी मुझे मंज़ूर है बिना सागर वर्षा का कोई वजूद नहीं है। वर्षा किसी बदली की तरह बरस जाने को व्याकुल थी। चाहती थी सागर अपनी बाहें फैलाकर उसको अपने आप में शामिल कर ले और दो दिल दो जिस्म इक जान हो जाएं। 

                2 पन्ना -              दोस्ती से आगे इक दूजे का सदा सदा का साथ 

  सागर वर्षा नियमित बात करते रहे। कभी वर्षा कहती मिलने को मगर सागर संकोच वश और सामाजिक हालात को समझ उसको कहता कि शायद कभी मुमकिन हो मुझे भी लगता है लेकिन अभी नहीं मिलना हो सकता है। वर्षा चाहती थी रिश्ता आधा अधूरा नहीं हो अगर है तो पूरी तरह से हो। सागर वर्षा की मन की बात और जीवन साथी की ज़रूरत समझने लगा था और इक दिन उसने कहा क्या तुम मुझसे पति पत्नी की तरह संबंध बनाना चाहोगी , कुछ ही पल में वर्षा ने हां बोल कर कहा था मुझे ये पता था इक दिन आप खुद ये मुझे कहोगे मैं इंतज़ार कर रही थी। सागर ने कहा अच्छा होता ये पहले खुलकर खुद बोलती तो वर्षा ने कहा मुझे संकोच था कहीं आपको ये नहीं लगे कि मैं खराब महिला आपको अपने प्यार में फंसाना चाहती हूं मुझे ख़ुशी है खुद आपने मुझे अपनाया है दिल से और अब जन्म जन्म तक वर्षा सिर्फ और सिर्फ आपकी है हो गई है और रहेगी। 

       अगली सुबह वर्षा ने सागर से कहा था मुझे थोड़ा महसूस होता रहा रात भर कि क्या हमने कल जो सोचा चाहा और स्वीकार किया उस को उचित मानते हैं तब सागर ने कहा मन में कोई शंका नहीं रखो अब तुम अकेली हो अपने जीवन को जीने को हक है हमने कोई जिस्म का नहीं मन से आत्मा से अपने आप को इक दूजे को सौंपने की बात की है जो सच्चा प्यार है पहले भी लोग धर्म कथाओं में समाज में ऐसे रिश्ते बनाते रहे हैं। कोई संशय है तो तुम नहीं चाहती तो कोई बात नहीं। तब वर्षा ने कहा था ऐसा नहीं अब आपको अपना सब कुछ मान लिया है बस इक चाहत है भले किसी के सामने नहीं अकेले ही कभी आप मुझे अपनी बनाने की औपचारिक रीति को अवश्य पूरा करो। आपसे अपनी मांग भरवाने  की सिंदूर लगवाने की इच्छा है और आपको पसंद है बिंदी माथे पर लगाना तो जिस दिन कहोगे आपकी हर बात स्वीकार करना मेरा धर्म है। वर्षा ने अपने जन्म दिन पर अपने माथे पर बिंदी लगा ली थी और सागर ने भी उसकी इच्छा मांग भरने की जब भी संभव हुआ करने की बात कही थी। 

                                3  पन्ना -    इक दूजे के होने के बाद 

  दिल से आत्मा से चाहने के बाद भी फासले बहुत थे दूरी मन की नहीं मगर हालात की मज़बूरी थी। कभी मिलते मिलते रह गए कभी हौसला नहीं किया दुनिया से डर कर। आपस में रूठना मनाना कभी किसी बात पर खफ़ा होकर संपर्क नहीं रखना बीच बीच में हुआ मगर दोनों की चाहत बढ़ती गई कम हुई नहीं कभी। वर्षा को कभी निराशा होती तो कहती मुझे लगता है हम कभी मिल नहीं सकेंगे भरोसा डगमगाने लगता तब सागर उसको संभालता और भरोसा कायम रखने को मान जाती वर्षा ऐसे में कहती मुझे आप पर खुद से बढ़कर यकीन है। मुझे तो सब आपकी मर्ज़ी से करना है मेरे लिए आप मेरी नैया के खेवनहार हो मेरे स्वामी भगवान सभी बस आप को मानती हूं। सागर ये सुनकर और अधिक चाहता वर्षा को हर तरह से ख़ुशी देना। जब भी वर्षा का मन जो भी चाहता सागर वही खुद कहता और उसकी कामना को पूर्ण करता रहता। 
  
    आखिर उनकी मुलाकात पहली बार आमने सामने हो गई जब किसी शहर में दोनों ही को आना पड़ा और इक और ने उनकी भावनाओं को समझ मिलवाने का अवसर दिया। शायद जो भी संभव था दोनों ने इक दूजे को ख़ुशी देने को सब करने की कोशिश की और बहुत खूबसूरत पल ज़िंदगी के अनुभव किये मिलकर। फिर भी बार बार मिलने और खुलकर अकेले में साथ रहने की चाहत बाकी है जो कभी न कभी पूरी होगी अब सागर की बात का विश्वास वर्षा को पूर्णतया है। 
 

                        4  पन्ना -  चाहत खुल कर जीने की 

    वर्षा को लगता है लेखक  ने लिखी है कहानी मगर अभी उसकी मन भी भावना रह गई है। सागर ने कितनी बार पूछा मगर वर्षा किसी न किसी कारण खुलकर अपनी भावनाएं उजागर नहीं कर सकी। उसका मन अभी अपने सागर से मिलन और जीवन भर इक साथ खुल कर जीने को करता है। कभी सागर खुद को कैद में बंद पंछी समझता था मगर जब उसने खुद को आज़ाद कर लिया है तो वर्षा को अपनी जंज़ीरें तोड़ने की कोई तरकीब नहीं मिल रही है। सागर से मिलन को वर्षा को बरसना नदी बनकर बहना और मीलों की दूरी तय कर सागर की बाहों में समाना है। चाहकर भी वर्षा अपने सागर को अपने पास आने को नहीं कह सकती है। सागर विश्वास करता है कभी किसी दिन किसी तरह दोनों का ये फ़ासला ख़त्म होना ही है। चाहत दोनों को बराबर है बढ़ती जाती है पल पल हर दिन मुहब्बत में इंतज़ार के पल बड़े लंबे हुआ करते हैं। कहानी का अंजाम अभी कोई नहीं जानता है सागर वर्षा और कहानी का लेखक। मगर सागर को भरोसा है किसी दिन वर्षा और वह इक साथ अवश्य होंगे उनका मिलन जन्म जन्म के लिए होना ही है। वर्षा की भी यही कामना है मगर उसका मन विचलित हो जाता है उस से और इंतज़ार सहा जाता नहीं और वर्षा को नदिया बनकर बहुत दूरी तय करनी है अपने सागर की बाहों में जाकर समाने को बेताब है।

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