Sunday, 30 March 2014

साहित्य के साथ ऐसा मत किया करें ( चोरी चोरी ही होती है )

अब किसी का नाम लेना सही नहीं है। और ऐसे लोग हैं भी बहुत कम , अधिकतर लोग जो साहित्य सेवा से जुड़े हैं वे ऐसा नहीं करते। मगर अभी इन दिनों किसी ने मुझे कमेंटस के स्थान पर ये सूचित किया कि हमने आपकी इस रचना को अपनी जगह पर लिख दिया है। वे ये भी लिखते हैं कि मुझे सूचित करना ज़रूरी समझते हैं। मगर उनको मालूम होना चाहिये कि मैंने अपने ब्लॉग पर सपष्ट निर्देश दे रखा है कि मेरी बिना अनुमति किसी रचना या पोस्ट को उपयोग नहीं कर सकते। क्या आप किसी की कोई चीज़ बिना उसकी अनुमति उपयोग कर सकते हैं और करने के बाद सूचित करते हैं कि मुझे पसंद आई थी उठा ली थी। बुरा नहीं माने मैं इसको बेहद आपतिजनक कार्य मानता हूं। आप साहित्य का साथ अनाचार को साहित्य कर्म या साहित्य सेवा कदापि न कहें। बहुत बार फेसबुक पर भी मेरी रचना किसी ने अपनी पोस्ट पर लिखी , मना करने पर कहते हैं कि लिंक से लोग नहीं पढ़ते इसलिये उन्होंने ये किया मेरे लिये कि और लोग पढ़ सकें। भाई आपको मेरी चिंता नहीं करनी है , न ही इस बात की कि लोग पढ़ते हैं या नहीं। मुझे किसी को विवश नहीं करना पढ़ने को। जो चाहे पढ़ सकता है और नहीं पढ़ना चाहता तो वो भी हर किसी का अधिकार है। आप किसी के अधिकार में हस्ताक्षेप क्यों करना चाहते हैं। जो भी ये सब किया करते हैं , जो कर चुके उसको अपनी जगह से मिटा दें और दोबारा ऐसा नहीं किया करें। मुझे इतनी ईमानदारी और नैतिकता की आपेक्षा हर उस व्यक्ति से है जिसको साहित्य से कोई सरोकार है।