Saturday, 13 July 2013

कविता को क्या होने लगा है आज ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कविता को क्या होने लगा है आज ( कविता  )   डॉ लोक सेतिया

रात कविता सुन रहा था मैं
घर में बैठा
टीवी पर बन दर्शक।

सुना रहा था कोई कवि
कविता व्यंग्यात्मक
देश की दशा पर
बात आई थी
देश में नारी की अस्मत लुटने की।

और टीवी कार्यक्रम में
शामिल सुनने देखने वाले
कह रहे थे
वाह वाह क्या बात है।

कोई झूमता नज़र आ रहा था
जब कह रहा था कवि
बेबसी  भूख विषमता की बात।

मेरे भीतर का कवि रो रहा था
देख कर ऐसी संवेदनहीनता
अपने सभ्य समाज की।

और सोच रहा हूं
क्या इसलिये लिखते हैं
हम कविता  ग़ज़ल
लोगों का मनोरंजन कर
वाह वाह सुनने के लिये।

या चाहते हैं जगाना संवेदना
सभी सुनने वालों
कविता पढ़ने वालों में
समाज में बढ़ रहे
अन्याय अत्याचार आडंबर के लिये।

भला कैसे कोई हंस सकता है
नाच सकता है
गा सकता है मस्ती में
किसी के दुःख दर्द की बात सुन।

कविता में गीत में ग़ज़ल में
क्यों असफल होती लग रही है
आज के दौर की ये नयी कविता
सुनने वाले , पढ़ने वाले में
मानवीय संवेदना के भाव
जागृत करने के
अपने वास्तविक कार्य में। 

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