Monday, 27 May 2013

ग़ज़ल 2 0 3 ( उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जब से हैं पर उनके )

उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ,
अभी तक हौसला बाकी , नहीं झुकते हैं सर उनके !
यही बस गुफ़्तगू करनी , अमीरों से गरीबों ने ,
उन्हें भी रौशनी मिलती , अंधेरों में हैं घर उनके !
उन्हें सूली पे चढ़ने का , तो कोई ग़म नहीं था पर ,
यही अफ़सोस था दिल में , अभी बाकी समर उनके !
कहां पूछा किसी ने आज तक साकी से पीने को ,
रहे सबको पिलाते पर , रहे सूखे अधर उनके !
हुई जब शाम रुक जाते , सुबह होते ही चल देते ,
ज़रा कुछ देर बस ठहरे , नहीं रुकते सफ़र उनके !
दिये कुछ आंकड़े सरकार ने , क्या क्या किया हमने ,
बढ़ी गिनती गरीबों की , मिटा डाले सिफ़र उनके !
हमारे ज़ख्म सारे वक़्त ने ऐसे भरे 'तनहा '
चलाये तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके !

Saturday, 25 May 2013

तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) 0 ( डॉ लोक सेतिया )

जुड़ा था सभी कुछ मेरे ही नाम के साथ लेकिन ,
ज़माने में नहीं था कुछ भी कहीं पर भी मेरा ,
बहुत रिश्ते-नाते थे मेरे नाम से वाबस्ता ,
मगर उनमें कोई भी नहीं था मेरा अपना !
रहने को इक घर मिलता रहा उम्र भर मुझे ,
मैं रहता रहा वहां मगर परायों की तरह ,
कहने को जानते थे मुझे शहर के तमाम लोग ,
लेकिन नहीं किसी ने पहचाना कभी मुझे !
जो दोस्त बनाये हुए न कभी मेरे अपने ,
दुश्मन भी मुझसे दुश्मनी निभा नहीं पाये ,
साथ हमसफ़र चल नहीं सके मंज़िल तलक ,
रहबर भी राह मुझको दिखला नहीं पाये !
इख़्तियार मेरा खुद पर भी कहां था ,
अपने खिलाफ़ खुद हमेशा खड़ा रहा ,
अकेला था, नहीं था साया तक भी मेरा साथ ,
बस अपने आप से ही बेगाना बन गया मैं !

Wednesday, 22 May 2013

ग़ज़ल 2 0 2 ( भुला नफरत सभी की हम मुहब्बत याद रखते हैं )

भुला नफरत सभी की , हम मुहब्बत याद रखते हैं ,
सितम जितने हुए भूले , इनायत याद रखते हैं !
तुन्हें भेजे हज़ारों खत मुहब्बत के कभी हमने ,
नहीं कुछ भेज पाये हम , वही खत याद रखते हैं !
हमेशा पास रखते हैं तेरी तस्वीर को लेकिन ,
ज़माने से छिपाने की हिदायत याद रखते हैं !
मुहब्बत में कभी कोई शरारत की नहीं हमने ,
सताया ख्वाब में आकर शिकायत याद रखते हैं !
बनेंगे एक दिन मोती हमारी आंख के आंसू ,
तेरा दामन इन्हें पौंछे ,ये हसरत याद रखते हैं !
किसी को बेवफ़ा कहना हमें अच्छा नहीं लगता ,
निभाई थी कभी उसने भी उल्फ़त याद रखते हैं !
तुम्हारी पास आने दूर जाने की अदा तनहा ,
वो सारी शोखियां सारी नज़ाकत याद रखते हैं !

Saturday, 4 May 2013

ग़ज़ल 2 0 1 ( बहुत ढूंढा जमाने में नहीं तुम सा मिला कोई )

बहुत ढूंढा ज़माने में , नहीं तुम सा मिला कोई ,
तुम्हारे बिन नहीं सुनता , हमारी इल्तिजा कोई !
इबादत छोड़ मत देना ,परेशां हाल हो कर तुम ,
यही रखना भरोसा बस , कहीं होगा ख़ुदा कोई !
हुई वीरान जब महफ़िल , करोगे याद सब उस दिन ,
वही महफ़िल जमाता था ,कहां उठकर गया कोई !
किया करते सभी से बेवफ़ाई जो हमेशा हैं ,
शिकायत क्यों उन्हीं को है , नहीं उनका हुआ कोई !
कभी कह हम नहीं पाये , कभी वो सुन नहीं पाये ,
शुरू कुछ बात जब करते , तभी बस आ गया कोई !
छिपा कर इस जहां से तुम , इन्हें पलकों पे रख लेना ,
तुम्हारे अश्क मोती हैं ,नहीं ये जानता कोई !
खताएं भी हुई होंगी , कई हमसे यहां तनहा ,
सभी इंसान दुनिया में ,नहीं है देवता कोई !