Monday, 4 January 2021

मुफ़्त किया बदनाम ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     मुफ़्त किया बदनाम ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

हम कोई आतंकवादी सड़कछाप गुंडे हैं जो जुर्म करने की योजना बनाते पुलिस पकड़ने का काम करे। धंधा करने वाले लोग हैं धंधे बदलते रहते हैं जिस भी चीज़ को बेचने खरीदने में मुनाफा हो करना पड़ता है। कितनी मुश्किल से समझ आया था ये देश खेती किसानी वाला है अब अगर हमने अपनी कठपुतली सरकार से अपना गणित साधने की बात की तो क्या गुनाह किया। इतना हंगामा क्यों क्या किसी ने पहले नहीं किया ऐसा। अमिताभ बच्चन करे तो सब जायज़ सदी का तथाकथित महानायक कहलाता है उनकी धर्मपत्नी जी संसद में थाली में छेद करने की बात कहती हैं। खुद क्या नहीं किया मुंह खुलवाना चाहते हैं तो बताओ। मुलायम आवाज़ में समाजवादी और बेचारे अमर सिंह कुछ भी नहीं बोले भाई भाभी को सोचना चाहिए। लोनावला में ज़मीन कोई तभी खरीद सकता था जब किसान होने का सबूत पेश करे। तब उत्तरप्रदेश सरकार ने इक गांव की पंचायती ज़मीन जालसाज़ी से उनके नाम करवाई और बच्चन साहब ने किसान होने का सबूत पेश किया ज़मीन खरीदी थी। और किस किस ने क्या क्या नहीं किया अपनी दौलत शोहरत का फायदा उठाकर जुर्म किया लज़्ज़त लेकर। 
 
हमारा गुनाह जुर्म बेलज़्ज़त है खाया पिया कुछ नहीं योजना बनाई तैयारी कर रहे थे पकड़े गए। गब्बर सिंह जी कहते बड़ी बेइंसाफी है हम चार यार बिना हथियार लोग करने लगे वार पर वार बचाओ मेरी सरकार कहीं जीत नहीं बन जाए हार। कानून को समझो दिलदार पहले होने तो देते अत्याचार तब मचाते हाहाकार अदालत के फैसले का करते ज़िंदगी भर इंतज़ार। इतने साल चलता रहता अपना धंधा बढ़ता कारोबार। बड़े बेज़ार हैं ज़मींदार सरदार मिल बैठे कितने हक़दार। देश की अदालत कितनी है होशियार होने देती है कानूनी लूटमार क्यों करते हैं हम बेचारों को शर्मसार। होती रही सांसदों विधायकों की खरीदारी सत्ता की बढ़ती गई मनमानी की बिमारी मिटता रहा सब कुछ बारी बारी कौन नहीं है आजकल दरबारी। मीडिया वालों ने कितना खाया बेचा ज़मीर भाव हर बार बढ़ाया हमने मौका नहीं गंवाया क्यों हमें धरती पर ढाया ये दंगल हमको नहीं भाया। 
 
  गोपालदास नीरज का जन्म दिन है। ये हमारी बात कदापि नहीं फिर भी जाने क्यों किसी महफ़िल में उनके गीत की पंक्तियां सुन कुछ शब्द चुभे जैसे हमारी दुर्दशा पर कोई खिलखिला रहा हो। स्वप्न झरे फूल से मीत चुभे शूल से , लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से। चाह तो निकल सकी न पर उम्र निकल गई। और हम लुटे लुटे वक़्त से पिटे पिटे , और हम डरे डरे नीर नैन में भरे। ओढ़ कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे। पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वो गिरी , और हम अंजान से दूर के मकान से , पालकी लिए हुए कहार देखते रहे। हमने अपनी महारानियों को कैसे कैसे फूलों के खिले गुलशन उपहार में देने की योजना बनाई थी बहुमंज़िला महल और हवाई जहाज़ से बहुमूल्य ज़मीन और जितनी ज़मीन उतना आसमान अधिकार पूर्वक अपने स्वामित्व में होने का इरादा था। किसी की बुरी नज़र लग गई है राज़ क्या ऐसे फ़ाश होते हैं। शबनमी आंखों की नमी कौन समझेगा।  
 
     मगरमच्छ क्या करें उनके आंसू भी कोई समझता नहीं है सरकार की संवेदना की तरह झूठे लगते हैं। उनकी भूख़ खत्म नहीं होती तो इस में उनका क्या कसूर है उपरवाले की मर्ज़ी है अमीरों की तिजोरी सरकारी खज़ाने की तरह भरती नहीं कभी भी। अमीर होना कौन नहीं चाहता है गरीब लोग अमीरों से जलते हैं खुद अमीर बन जाएं तो उसी राह पर चलते हैं। हम दुआ करते हैं गरीब और गरीब होते जाएं गरीब नहीं हमारे लिए और अमीर होने की दुआ करते हैं। देख कर हमको ठंडी ठंडी आह भरते हैं। दार्शनिक कहते हैं गरीब हंसते हैं अमीर रो रो कर मरते हैं गरीब होने से कितना डरते हैं।
 
आखिर में जनाब अर्श मलसियानी जी का शेर है। 

चमन में कौन है पुरसाने-हाल शबनम का 

गरीब रोई तो गुंचों को भी हंसी आई। 


 

1 comment:

Sanjaytanha said...

Waahh बहुत बढ़िया कटाक्ष से भरपूर