Saturday, 23 January 2021

पैसा बोलता है राज़ खोलता है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    पैसा बोलता है राज़ खोलता है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

है ये उसकी कहानी सुन लो उसकी ज़ुबानी। पैसा बनाकर आदमी परेशान हो गया है घर का मालिक खुद ऐसा सामान बन गया है चंद रोज़ का ही अब तो महमान बन गया है। अमृत जैसा जीवन विषपान बन गया है। पैसे ने आदमी को क्या क्या नहीं बनाया कभी भगवान बन गया कभी शैतान बन गया है। इंसान अब अजनबी अनजान बन गया है गरीब अमीर होना पहचान बन गया है। ईमान आदमी का बेईमान हो गया है पैसे की आरज़ू में भूल भुलैया में इंसान का हर इक अरमान खो गया है। पैसा ये कह रहा कोई नहीं खुदा है वो इस से मांगता है ये उस से चाहता है दुनिया का राजा भी बन गया भिखारी। बर्बादी का अपनी सामान बन गया है पैसे के लिए पागल नादान बन गया है। पैसा कभी किसी का होता नहीं सगा है जिसको भी देख लो अपनों ने ही ठगा है। पैसा वजूद भी है इसका सबूत भी है इक क़र्ज़ है ज़िंदगी हर सांस पर सूद भी है। पैसे ने खड़ी की हैं इतनी बड़ी ऊंची लंबी दीवारें ये हटती नहीं हटाने से सर हाथ पैर मारें। बदलते रहेंगे मौसम आएंगी जाएंगी कई बहारें कागज़ के फूल खिलते नहीं लगते है प्यारे प्यारे पास जाकर देखा बिखरे सभी नज़ारे। 

दुनिया ने आदमी की कीमत नहीं लगाई है आज दौलत वाला सभी दोस्त यार भाई। जिस दिन रहेगी नहीं कोई कमाई फिर कौन आप कौन हम औकात की लड़ाई। सबने बना लिया है पैसे को घर जवाई करेला रहेगा कड़वा नहीं बनेगा कभी मिठाई खाकर सबके हिस्से की दूध मलाई छाछ भी बची है समझो है की भलाई। पैसे ने जाने कैसी दुनिया है दिखाई जिस तरफ भी जाओ आती नज़र है खाई। अच्छे थे लोग सारे खराब कर दिया है प्यास देकर सामने सराब कर दिया है तिश्नगी को खुद इंतख्वाब कर दिया है। ये क्या किया है नामुराद लोगों को आली जनाब कह बैठे हैं सरे चोर उच्चके बनकर नवाब बैठे हैं। पैसे कभी किसी का वफ़ादार नहीं होता दस्तार नहीं रहती सरदार नहीं रहता मुफ़लिसी में आशिक़ दिलदार नहीं रहता। ऐसा रोग है ज़िंदा बहुत दिन जिसका बीमार नहीं रहता। खण्डर बन जाता है किसी न किसी दिन आखिर हमेशा कोई महल शानदार नहीं रहता बाज़ार का दस्तूर इकसार नहीं रहता घाटे के कारोबार का कोई हिस्सेदार नहीं रहता। 

छोटा है कि बड़ा है सबका ये माजरा है बनकर नाखुदा डुबाता ये ऐसा अजब सिलसिला है। पैसे ने बनाया भी मिटाया भी जहां सारा देखा नहीं जाता जो सामने नज़ारा ज़र्रा था यही चमकता हुआ सितारा जिस पल गगन से टूटकर नीचे गिरा देखेगा जग सारा। बनाया था आदमी ने किसलिए ये पैसा उसको कहां खबर थी होगा किसी दिन ऐसा पैसा आदमी को नचाएगा हंसाएगा रुलाएगा। आदमी पैसे को ढूंढता खुद को खो जायेगा बर्बाद होगा बर्बादी का जश्न भी मनाएगा। हाथ मलेगा हाथ से सब फिसल जाएगा पाकर खोकर समझ नहीं आएगा बस आखिर पैसा पास रह जाएगा इंसान छोड़ दुनिया जाएगा। उस वक़्त पछताएगा क्या साथ जाएगा धरा तिजोरी में पैसा सड़ जाएगा बड़े काम का समझा किसी काम नहीं आएगा। कहने लगा है सुन लो दुनिया के इंसानों इस सच को समझो है झूठ मुझे पहचानो पैसे को खुदा मत समझो ओ नादानों। इंसानियत शराफ़त को सिक्कों में नहीं तोलो पैसे की खातिर झूठ कभी नहीं बोलो। दिल का ख़ज़ाना है बंद प्यार की खिड़की है सोने चांदी हीरे मोती अंबार सब हैं बेकार बस आदमी से आदमी कर ले अभी भी प्यार। पैसा है दुश्मन मुहब्बत है सच्चा प्यार उसके बगैर जीना मरना है बेकार निस्सार जीवन में भर लो रस की धार करोगे कब तक शाम ढलने का इंतज़ार। देखो कहती है इक अलबेली नार यार मिले तो उस पर दुनिया को वारूं सौ बार। दुनिया से अंधेरे मिटाओ रौशनी के दलालो अपनी हवस को रोको ज़मीर को ज़रा बचा लो शराफ़त शर्म इंसानियत खोकर मिला क्या है दौलत को छोड़ मुहब्बत को आज़मा लो। थोड़ा भीतर मन में झांको तन गोरे मन के कालो।

 

 

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर।
कभी दूसरों के ब्लॉग पर भी कमेंट किया करो।
राष्ट्रीय बालिका दिवस की बधाई हो।