Sunday, 10 January 2021

हम क्या हैं क्या से क्या बन गए ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

     हम क्या हैं क्या से क्या बन गए ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

इक कल था जो बीत गया इक कल है जो आना है , मगर जो आज है वही तय करेगा हमने खोना है या पाना है भविष्य खुद अपना और देश ही नहीं दुनिया का अच्छा या बुरा हम सभी ने बनाना है। शिक्षा की बात होती बहुत है मगर वास्तव में हमको पढ़ना समझना छोड़ दिया है शिक्षा सिर्फ किताबी जानकारी तक सिमित है और मकसद उस से आजीविका पाना रह गया है। चिंतन मनन और विचारशीलता या तर्कसंगत ढंग से आंकलन की बात नहीं रही है। सच से घबराते हैं झूठ को गले लगाते हैं अपनी सुविधा को देख कर बात कहते हैं मुकर भी जाते हैं। खुद को जानकर और हौंसलों वाले बतलाते हैं मगर कायर हैं ज़रा सा कठिनाई का दौर हो डर जाते हैं शोर मचाते हैं। ज़िंदगी के तूफानों से कभी नहीं टकराते हैं झूठी कहानियां बनाते हैं किसको सुनाते हैं हम सूखे पत्ते हैं ज़रा हवा चलती है बिखर जाते हैं। धर्म क्या है ईमान क्या है हमने जाना ही नहीं धर्म और ईश्वर पहने हुए मुखौटे हैं जिनके पीछे असली चेहरे छिपाते हैं पाप अधर्म की कमाई खाते हैं मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाते हैं सबक पढ़ते हैं भूलते नहीं भुलाते हैं। खुद अपने आप को धोखा देते हैं अच्छे बनते नहीं बस कहलाते हैं। हम सच के तराने गाते हैं सच कहते हैं बार बार दोहराते हैं झूठी कसमें खुदा ईश्वर गीता कुरान की खाते हुए नहीं घबराते हैं। आज़ाद होने की बातों का मतलब क्या है जाने किस किस के गुलाम हो जाते हैं इंसान भी नहीं जो लोग उनको भगवान बताते हैं। 

टीवी पर किसी बहस किसी शो में जिन बातों को अच्छा बताया जाता है मनोरंजन के नाम पर क्या क्या दिखाया जाता है। बेहूदा बातों घटिया चुटकलों से हंसाया जाता है जैसे भी हो पैसा कमाया जाता है दर्शक को ऐसे भटकाया जाता है जो किसी मंज़िल को नहीं जाता वही रास्ता दिखाया जाता है। बिग्ग बॉस करोड़पति जैसे खेल को लाजवाब जो बताते हैं कैसे नायक समझे जाते हैं पैसे की खातिर बेचते हैं जाने क्या क्या शोहरत की बुलंदी पर खड़े बड़े कहलाते छोटे नज़र आते हैं। देश समाज को देते नहीं कुछ भी नाम का फायदा उठाते हैं। उनका अभिनय शानदार दिखाई देता है किरदार फिल्मों में जो निभाते हैं असली ज़िंदगी में कौन क्या जाने आंख मिलाते हैं सच्चाई से या नज़रें चुराते हैं। देशभक्ति वाले गीत सभी लोग गाते हैं जो तिरंगा ऊंचा फहराते हैं देश सेवा की कसम भी खाते हैं लोग जो उनको चुनते हैं सरकार बनाते हैं उनके दुःख दर्द समझ भी आते हैं। जहां करोड़ों लोग भूखे नंगे बेघर हैं सत्ता वाले मौज मनाते हैं। अपनी महिमा के गीत गाते हैं रोज़ इश्तिहार भी छपवाते हैं। कौन उनको खरा सच कहता है देशसेवा नहीं अय्याशी है सफ़ेद हाथी की तरह बोझ बनकर क्या मसीहा होने का दावा गुनाह होता है। वास्तव में ये खुद को बड़ा महान समझने वाले अंतर्मन से खोखले होते हैं उनका मकसद सभी को खुद से छोटा साबित कर अपने भीतर के झूठे अहम को संतुष्ट करना है। ऐसी ख़ुशी जो किसी को परेशान कर हासिल होती है स्कूल कॉलेज के बच्चों की मानसिक बिमारी होती है जिसको माता पिता शिक्षक अनदेखा कर वहशी समाज का निर्माण करते हैं। अपने दल के नेता की मनमानी या सत्ता का गलत उपयोग देख कर खामोश रहने वाले देश समाज के दुश्मन ही होते हैं। 
 
ख़ुशी की तलाश करते करते ग़म को साथी बना रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य संस्थाएं हमारे देश को नाखुश लोगों की कतार में देखते हैं। क्योंकि हमने वास्तविक ख़ुशी को छोड़कर बाहरी भौतिक चीज़ों को हासिल करने की चूहा दौड़ को अपना लिया है। मानसिक तनाव हीन भावना और बाकी लोगों से तेज़ बढ़ना चाहते हैं दोस्तों और अच्छे लोगों से अधिक अकेले सोशल मीडिया पर मनचाही बात लिखते कहते हैं वास्तविकता से विपरीत। ये पागलपन है जो बन नहीं पाते होने का दम भरते हैं। रचनात्मकता और सार्थक समाज हितकारी कार्य हमारी पहल नहीं है। कभी कभी सोचते हैं हमने आधुनिकता की चाहत में अपना बहुत कुछ जो बेहद महत्वपूर्ण और मूलयवान था खोया है। ख़ुशी बेचकर दर्द खरीदने का कारोबार किया है। समझना होगा हम क्या हैं क्या से क्या बन गए।

1 comment:

कविता रावत said...

भौतिक सुख सुविधाओं के चक्कर में सत्यानाश हुआ जा रहा है

बहुत अच्छी चिंतनशील प्रस्तुति