Monday, 26 October 2020

ऊंची शान झूठी पहचान ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

     ऊंची शान झूठी पहचान ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    जगमग रौशनियां क्या खूबसूरत नज़ारे रंग बिरंगे फव्वारे धरती पर चांद सितारे देखने आते हैं कितनी दूर से लोग कितने सारे। सबको भाते हैं दिलकश लाजवाब चमचमाते महल जैसे धार्मिक स्थल वाह-वाह भगवान को तमाशा  लिया बना रे। ईश्वर के दर्शन की प्यास नहीं सपनों सी दुनिया का देखने का लुत्फ़ उठाते हैं भजन फ़िल्मी धुन पर झूमते नाचते गाते हैं। गुरूजी कैसी कैसी लीला रचाते हैं कभी राधा कभी मीरा कभी कान्हा बन जाते है कभी किसी रूप में सजते संवरते हैं हाथी घोड़ा पालकी रथ पर सवारी निकलती है कभी आकाश में विमान से पुष्प बरसाते हैं। ईश्वर खुदा अल्लाह वाहेगुरु जीसस सभी एक हैं लेकिन ये कौन हैं जो इनको अलग अलग समझते हैं समझाते हैं उल्टी गंगा को बहाते हैं खुदा के बंदों को क्या सबक पढ़ाते हैं। क्या भगवान धन दौलत शान ओ शौकत दिखलाते हैं ये सब देखकर मन में कितने सवाल आते हैं धर्म की किताब कभी पढ़ी भी है पढ़कर समझी भी या बस कहने को सर झुकाते हैं। भगवान ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु जीसस जिन लोगों ने दुनिया बनाने वाले विधाता की कल्पना की होगी चिंतन मनन किया होगा उन्होंने ये कदापि नहीं सोचा होगा कि कभी धर्म आस्तिकता को लेकर मानवता को छोड़कर ऐसे आडंबर की बात हर कोई हर तरफ करता मिलेगा। 
 
   हमने संसद बनाई उसको मंदिर कहा जनकल्याण की देश समाज की भलाई संविधान की भावना को महत्व देने को मगर उसका बदला रंग ढंग सत्ता हासिल करने का साधन और अपराधी बाहुबली लुटेरे सत्ता के लोभी नेताओं घोटालेबाज़ों की अय्याशी का अड्डा बन गया है। जनता की सेवा करने को शानदार दफ्तर और बड़ी बड़ी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इमारतें नहीं उस में नियुक्त अधिकारी कर्मचारी वर्ग की निष्ठा और समर्पण ईमानदारी से कर्तव्य पालन होना ज़रूरी है। जिन महान लोगों को हमने आदर्श घोषित किया उनकी ऊंची मूर्तियां शानदार समाधिस्थल की नहीं उनके दिखलाये मार्ग पर चलकर उच्च नैतिक मापदंड कायम रखने की ज़रूरत है। आपने मंदिर को बड़ा करने का काम किया है भगवान से मंदिर का कद बड़ा लगने लगा है। कोई सच समझने समझाने वाला सामने नहीं आता है जो धर्म क्या है ईश्वर की उपसना इंसान और इंसानियत की बात की अवधारणा को स्पष्ट करता। 
 
  जिस समाज में करोड़ों लोग भूखे नंगे बदहाल जीवन जीने को विवश हैं उस में वास्तविक धर्म दीन दुःखी लोगों की सहायता उनको जीने को बुनियादी सुविधाएं शिक्षा रोज़गार स्वस्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना होना चाहिए। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे  बड़े विशाल और सोने चांदी के गहनों से जड़ित सिंघासन ईश्वर की उपासना को आवश्यक कदापि नहीं हैं। हम इन पर जितना धन खर्च करते हैं उतना मानव कल्याण को सोचकर जिनको वास्तव में ज़रूरत है उनकी सहायता करते तो यकीनन देश में कोई भूखा नंगा बदहाल नहीं रहता। आपने  कभी किसी किताब में आकार को लेकर अवश्य पढ़ा होगा अमुक दैत्याकार था अर्थात बड़ा आकार दैत्य का होता है। कितने मंदिर में भगवान देवी देवता किसी शिला या पत्थर की पिंडी की देवी अथवा कोई पांव के निशान या  आंखें आदि अर्चना करने को होते हैं और कितने विश्वास से उनके दर्शन लोग करते हैं। उपासना ईबादत नाम सिमरण जैसे कार्य करने को बड़े बड़े धार्मिक स्थल या मूर्तियों की ज़रूरत होती नहीं है। वास्तविक ध्यान समाधि शांत मन से एकांत में ही संभव है शोर शराबा भीड़ कभी ईश्वर परमात्मा के चिंतन के लिए उचित नहीं हो सकते हैं।  ईश्वर भगवान खुदा में भरोसा आडंबर पूर्वक दिखाने की नहीं अंतर्मन से महसूस करने की बात है। 
 
  हमने हर चीज़ को वास्तविक मकसद छोड़कर भव्यता और दिखावे को शानो शौकत का अवसर समझ लिया है। बचपन से बड़े होने जीने से जीवन के अंत तक हमने जीवन शैली को वास्तविक ज़रूरत से अधिक निरर्थक आडंबरों से भरकर खुद अपने लिए कितनी दुश्वारियां खड़ी कर ली हैं। हमारी कितनी समस्याएं खुद हमने पैदा की हैं इसी तरह बेकार बेमकसद के रंग ढंग रीति रिवाज़ और पुरानी दकियानूसी चीज़ों अंधविश्वास को बढ़ावा देकर। आधुनिक युग और इक्कीसवीं सदी में हम अभी भी गलत कुरीतियों का बोझ ढोने को बाध्य हैं। प्यार करने को ताजमहल बनवाना ज़रूरी नहीं है ये समझना चाहते हैं तो ग़ज़ल फिल्म में साहिर लुधियानवी जी की नज़्म अवश्य पढ़ना और ईश्वर अल्लाह खुदा वाहेगुरु को जानना है तो नानक कबीर को पढ़ना समझना। ईश्वर को पाना है तो आपको खुद अपने भीतर झांकना होगा बाहर कहीं खोजने की ज़रूरत नहीं है। मेरी इक ग़ज़ल शायद आपको पसंद आएगी पेश है आखिर में। 
 

 ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं 
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।

 (  खुदा , ईश्वर , परमात्मा , इक ओंकार , यीसु ) 
 

           साहिर लुधियानवी की नज़्म यूट्यूब के सौजन्य से आभार सहित।




 
      
 

                        

2 comments:

Sanjaytanha said...

बहुत बढ़िया लेख👌👍 4 पंक्तियाँ याद आ गईं अपनी

चोरों पर सरदारी है।
कुर्सी की लाचारी है।
जनता में बेकारी है।
ख़ूब तरक़्क़ी जारी है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सार्थक आलेख।
अच्छा व्यंग्य।।