Saturday, 17 October 2020

शब्दों को निरर्थक बना दिया ( देवी देवताओं से देशभक्ति तक ) डॉ लोक सेतिया

     शब्दों को निरर्थक बना दिया ( देवी देवताओं से देशभक्ति तक ) 

                                                 डॉ लोक सेतिया 

  क्या वास्तव में इन अच्छे अच्छे संदेशों का कोई अर्थ है। रोज़ राम राम जी कभी कोई देवी देवता कभी भगवान तो कभी देशभक्ति वाले संदेश। कभी महिलाओं कभी बच्चों कभी पेड़ पशुओं नदियों सभी से प्यार की बात कभी माता पिता कभी दोस्त कभी भाई बहन के या पत्नी पति से मुहब्बत करने वालों राधा मीरा की बातें। धर्म को लेकर महान आदर्शवादी संदेश तक आदान प्रदान किये जाते हैं। ये सब अगर हम जीवन में समझते हैं मानते हैं उनपर चलते हैं तो समाज को किसी उपदेश की ज़रूरत ही नहीं होती मगर हमने इतने अच्छे विचारों को किसी स्लोगन की तरह उपयोग किया है जो खुद नहीं समझते सबको संदेश देते हैं जानते हैं उन पर भी कोई असर नहीं होने वाला है। दूसरे शब्दों में हम केवल आडंबर करते हैं जय माता दी कहते हैं मां के मंदिर जाते हैं मगर घर में अपनी मां बहन बेटी या समाज में अन्य महिलाओं के लिए कोई अच्छी पावन भावना नहीं रखते हैं। महिलाओं को वस्तु समझते हैं इंसान नहीं उनको बराबर तो क्या उनका शोषण करने पर गर्व अनुभव करते हैं शर्मिंदा नहीं होते हैं। सबसे हैरानी की बात है हमने कभी इन शब्दों का अर्थ समझने का काम नहीं किया है। सत सरी अकाल कहते हैं जिसका अर्थ है सत्य ही ईश्वर है मगर हर दिन हर घड़ी झूठ बोलते हैं झूठ की जय जयकार करते हैं। 

धार्मिक किताबों से लेकर प्रतीकों और मूर्तियों से लेकर धर्मस्थल या नदी और अलग अलग धर्म की जगह जाने को हमने चिंतन मनन करने नहीं केवल दिल को झूठी तसल्ली देना का माध्यम बना लिया है। इन सब से हमारे जीवन में रत्ती भर भी बदलाव होता नहीं है। क्या हमने सोचा है जो ख़ुदा है भगवान है विधाता है अल्लाह है वाहेगुरु है उसको अपने गुणगान की चाहत हो सकती है वो कुछ चढ़ावा पाकर खुश हो सकता है। अगर ऐसा है तो फिर वो आम इंसान जैसा है ईश्वर नहीं हो सकता क्योंकि जिसने सभी को सब कुछ दिया उसको कोई क्या दे सकता है उसे क्या ज़रूरत है। मगर हम दाता बनकर घोषणा करवाते हैं कितने खोखले हैं हम लोग। वास्तव में इंसान को किसी धार्मिक आयोजन की नहीं इंसानियत की राह चलने और इंसान को इंसान समझने की आपस में बैर नफरत करना छोड़कर प्यार हमदर्दी की ज़रूरत है। वास्तविक सच्चाई और अच्छाई के मार्ग को भुलाकर हमने दिखावे और आडंबर को अपना लिया है। बेशक ऐसा कर के हम खुद को औरों की नज़र में धार्मिक होने का काम कर भी सकते हैं लेकिन क्या ईश्वर भगवान देवी देवता विधाता की नज़र में हम सच्चे उपासक हो जाएंगे , कभी भी नहीं क्योंकि उसको सब मालूम है हम कैसे हैं क्या करते हैं और क्या होने का दम भरते हैं। झूठ किसी भी धर्म के भगवान देवी देवता को मंज़ूर नहीं हो सकता है। हमने भगवान की भक्ति भगवान को लेकर नहीं दुनिया को लेकर दिखावे की करनी शुरू कर दी है। 

   यही कारण है समाज में मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बढ़ते गए हैं आयोजन उपदेशक कितने गुरु बनाते गए हैं लेकिन उनकी किसी बात से सीखा कुछ भी नहीं है। जब धर्म की बात करने वाले खुद लोभी लालची और सोने चांदी के आभूषण पहनने से विशाल भवन और बड़े बड़े आश्रम ज़मीन जायदाद धन जुटाने को लगे हैं तब त्याग की संतोष की बात लोभ लालच छोड़ने की बात किसे समझ आएगी। लगता है हम सभी अपने वास्तविक मार्ग से भटक गए हैं और हैरानी इस बात की है कि हम भटके हुए लोग मार्गदर्शन की बात करते हैं। इक भजन से अंत करते हैं। प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस विध पाऊं तोहे , प्रभु कहे तू मन को पा ले पा जाएगा मोहे। सुना होगा ये भजन अब समझना भी अगर समझना चाहते हैं।


3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सटीक

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

उपयोगी पोस्ट।

Sanjaytanha said...

बढिया लेख प्रश्न उठाता... पोल खोलता...सब चाहते हैं सन्देश में आदर्श की बात की जाए बस अमल में कोई दूसरा लाए ख़ुद नहीं..मेरे पास भी कई लोग क्या क्या भेजते हैं जबकि वो ख़ुद ड्रिंक करते हैं ड्यूटी ठीक से नहीं करते और जब रिप्लाई न करो तो कहते हैं कि msg का रिप्लाई भी नही करते बड़े आदमी हो गए हो