Saturday, 10 October 2020

झूठे सपने बेचने से राजा नंगा है कहानी तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

झूठे सपने बेचने से राजा नंगा है कहानी तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

           सपनों के सौदागर होते हैं जो आपको झूठे सपने दिखला कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। आजकल कोई आपको सब बेचने का धंधा करता है आपको करोड़पति बनाने की बात करते खुद महान महानायक का तमगा हासिल कर नाम दौलत शोहरत पाने में सफल है। जालसाज़ी भी करता है मगर सलीके से गैरकानूनी ढंग से किसान होने का दस्तावेज़ हासिल कर उस ज़मीन का मालिक बन जाता है जो किसी गांव की पंचायत की है। राज्य की सरकार साथ देती है पत्नी संसद है जिस दल की सत्ता है सैयां भये कोतवाल फिर डर काहे का। उनकी थाली में सभी पकवान हैं उनको सब खाना है जो किसी पर थाली में छेद करने की बात कहती हैं। थाली गरीब की खाली है जनाब के पास क्या नहीं है घरवाली है सिलसिले वाली है उनकी चाल निराली है लोग कहते मतवाली है। ये कौन लोग हैं जिनको ऐसे लोग भगवान लगते हैं जिनको अपने लिए अधिक से अधिक पाने की हवस है जिनकी भूख पैसे सत्ता से करीबी की बढ़ती जाती है किसी पागलपन की तरह। ये किसी को कुछ देने के काबिल नहीं होते हैं इनका दान धर्म भी मुनाफ़े का धंधा होता है। जिसे देखो वही कहता है ऐसे तथाकथित भगवान के साक्षात दर्शन की चाहत थी। सच क्या है किसे समझना है जिनको खुदा कहते हैं उनका कहना है ईश्वर से उनकी बात होती है ईमेल पर। कभी सभी को ईश्वर की ईमेल बताते तो बड़ा भलाई का काम होता राज़ रखना है तो कोरोना को लेकर ईश्वर से पता करते क्या उसी का किया धरा है ये क्या माजरा है। 
 
     राजा नंगा है कहानी याद है दो ठग किसी राजा के दरबार आये कहा उनके पास ऐसा शानदार कपड़ा है जिस की पोशाक से बढ़कर सुंदर कोई लिबास किसी का नहीं हो सकता है। लेकिन उस की विशेषता है कि जो लोग झूठे हैं उनको वो पोशाक दिखाई नहीं देती है। भरे दरबार में खाली संदूक से कपड़ा निकलने का अभिनय करते हैं जो था ही नहीं और राजा संतरी सभा में उपस्थित सब वाह वाह क्या खूबसूरत है बोलते हैं ताकि खुद को सच बोलने वाले साबित कर सकें। दर्ज़ी उस कपड़े का शाही लिबास सिलने का अभिनय करते हैं और राजा उस पोशाक को पहन नगर में रथ पर निकलते हैं शोभा बढ़ाने को। लोग देखते हैं फूल बरसाते हैं मगर इक मासूम बच्चा बोल देता है अरे राजा तो नंगा है। तमाम लोग देख  भी खामोश थे क्योंकि उनको खुद झूठे साबित होने का भय था। झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो , सरकारी ऐलान हुआ है सच बोलो। घर के अंदर झूठ की इक मंडी है , दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो। राहत इंदौरी जी की ग़ज़ल है। 
 
    सपने देखना और दिखलाना आसान है मुश्किल है सपनों को सच करना। वो अलग बात है निराशा से बाहर निकालने को उम्मीद की बात। लेकिन अपने मतलब की खातिर झूठे सपने दिखला कर मूर्ख बनाना ठगी जालसाज़ी धोखाधड़ी होता है। कहते हैं कोई कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकता है लेकिन सभी को हमेशा के लिए नहीं। हम पढ़ लिखकर भी सच और झूठ को परखते नहीं और वास्तविक नायक और नकली नायक का अंतर नहीं करते हैं तो इस से बढ़कर मूर्खता का कोई सबूत हो नहीं सकता है। जिनको सत्ता की पैसे की चाह है जो इनको पाने को सब करते हैं उनको अगर आपने आदर्श और महान ही नहीं भगवान समझ लिया है तो ये गुलामी की मानसिकता खुद आपको कभी सपनों के आसमान से ज़मीन पर पटकेगी ही। ऐसे जाने कैसे कैसे ख़ुदा बना रखे हैं बिना समझे विचारे कि उनका समाज को योगदान क्या है। धन दौलत सत्ता झूठी शोहरत हासिल करने से समाज को क्या मिला बल्कि समाज से पाया है दिया कुछ भी नहीं। उनके किरदार निभाने को अपने सच समझ लिया रामलीला में राम बनने से कोई भगवान नहीं बन जाता है फिर ये जिनको लोग सदी का महानायक कहते हैं उसने फिल्मों में जो किरदार निभाए हैं जिनसे उनका नाम सफलता से जुड़ा है उन को कोई समाज आदर्श बनाने की बात नहीं सोच सकता है। हिंसा अपराध को बढ़ावा देने से लेकर अपनी बेटी की सहेली से संबंध बनाने जैसे किरदार समाज को क्या सबक सिखलाते हैं। 
 
   जिनको पैसा कमाने को झूठ को सच बताना अर्थात किसी भी चीज़ को बेचने को इश्तिहार विज्ञापन का हिस्सा बनना उचित लगता है बगैर ये विचार किए की उस से पैसा जाने कितने लोगों की मेहनत की कमाई को हथियाने लूटने से अर्जित किया जाता है अनुचित ढंग की आमदनी के भागीदार बनते हैं। उनको अपना आदर्श भगवान कहना ईश्वर के किरदार को नीचे गिराना है। ठीक इसी तरह जनकल्याण की राजनीति करने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी को भूलकर हमने सत्ता के लोभी नेताओं को आदर्श और महान समझने की बड़ी भूल की है। ऐसे स्वार्थी नेताओं ने देश को जिस कगार पर लेकर खड़ा कर दिया है उस से उबारने को कोई वास्तविक नायक कहीं दिखाई नहीं देता है। किसी अभिनेता की तरह सज धज कर डायलॉग बोलने की तरह से अच्छी अच्छी बातें कहने से नहीं सच बोलने और असली देशभक्ति जनता के लिए कुछ अच्छा करने से होनी चाहिए। जब देश की अर्थव्यवस्था बदहाल हो किसी नेता की विलासिता और शानो शौकत जले पर नमक छिड़कने जैसा काम है। जिसने किसी और को हम्माम में रेनकोट पहनने का कटाक्ष किया था शायद खुद अपनी वास्तविकता शानदार पहनावे लिबास से भी ढकने में सफल नहीं है। ये जो पब्लिक है सब जानती है भले बुरे को पहचानती है।