Thursday, 1 October 2020

गांधी जी लाल बहादुर जी के आदर्श की बात कौन कर रहे हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     गांधी जी लाल बहादुर जी के आदर्श की बात कौन कर रहे हैं 

                                       ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

          उनकी विचारधारा की धज्जियां उड़ाने के बाद हर साल उनके आदर्श पर भाषण चर्चा उनके फोटो या समाधि पर फूल चढ़ाने का आडंबर करते खुद को देश सेवक जनकल्याण के पैरोकार बताने वाले लोग आत्मचिंतन करते तो उनका नाम भी अपनी ज़ुबान पर लाते संकोच करते। कथनी करनी का इतना विरोधाभास देख कर लगता है कितनी बार उनकी हत्या बार बार होती रहेगी। जाने ये कैसी आज़ादी है जिसमें बड़े बड़े अपराधी सीना ठोककर अपराध करने के बाद निर्दोष करार दिए जाते हैं और जश्न मनाते हैं ये सच जानते हुए भी कि खुद उन्होंने कभी कानून को हाथ में लेकर मनमानी करने को अपनी उपलब्धि और शौर्य घोषित किया था। अदालत में सच को सच नहीं कहा गया और सज़ा से बचने को झूठ का सहारा लेकर अदालत की आंखों में धूल झौंकने का कार्य किया। दो अक्टूबर को गांधी जी के आदर्श की बात कहने से पहले इस पर विचार करना चाहिए। देश में हर तरफ अराजकता और अपराध का आलम है और धर्म की बात कहने वाले राम राज्य का दावा करने वाले जिस बेटी की हत्या बेरहमी से की गई बलात्कार के बाद उसी के परिवार को बंधक बनाने जैसा कार्य कर रहे हैं सुरक्षा के नाम पर इस से अधिक अनुचित आचरण कोई सरकार नहीं कर सकती है। अन्याय और अराजकता ही नहीं पुलिस और न्याय व्यवस्था का अनुचित इस्तेमाल किया जा रहा है। जय जवान जय किसान की बात कौन करे जब किसान के लिए उनकी सहमति जाने बिना ऐसे कानून बनाये जा रहे हैं जो किसानों को मंज़ूर नहीं हैं। गांधी होते तो फिर से दांडी यात्रा करते कोई वापस गांव की ओर जाते न कि विदेशी शासकों की तरह किसानों को बड़ी बड़ी कंपनियों के जाल में फंसाने को उनके लिए भलाई या आज़ादी कहने का छल करते और संसद से सड़क तक सत्ता के विरोध को दमन पूर्वक दबाने की कोशिश होती। 

      शायद अब हमें निर्णय करना चाहिए कि हम और देश की सरकार या तथाकथित बड़े बड़े लोग जो दो ऑक्टूबर को कहेंगे कि आज भी गांधी और लाल बहादुर जी के आदर्श उपयोगी हैं खुद जानते ही नहीं गांधी जी लाल बहादुर जी कौन थे क्या सोचते थे कैसे रहते थे। जैसे कोई डाकू लुटेरा साधु का भेस पहन कर ठगता है। वास्तव में समाज में नैतिकता का पतन इस हद तक हो चुका है कि हम धर्म आदर्श से देशभक्ति को केवल दिखाने को कुछ शब्द बोलने को मानते हैं उनका अर्थ समझने या विचारधारा पर चलने को कभी ज़रूरी नहीं समझते हैं। मरने के बाद उनकी आत्माओं को भी घायल करने की बात की जाती है।

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