Thursday, 6 August 2020

हैवानियत शर्मसार नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  हैवानियत शर्मसार नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    समझते हैं अभी भी दुनिया उन्हीं से है जिनको नहीं खबर आना जाना किधर से है। ये लोग जो खुद को भगवान समझते हैं इंसान को भी नहीं इंसान समझते हैं। लगता है इन्हें बड़ा काम किया है इस हाल में जो अपना काम किया है। क्या हवाओं ने कहा हमने चलना नहीं छोड़ा कोरोना के डर से किसी भी अनहोनी से घबरा के ये उनका फ़र्ज़ कुदरत का तरीका है कोई नहीं किसी पर एहसान किया है। सुनते थे जब नज़र आता है कयामत का नज़ारा मिट जाता है अपने होने नहीं होने का अहंकार सारा तब किया करते हैं गुनाहों से तौबा भीतर कोई ज़मीर जगाता है तब ऐसी घड़ी में इंसान बदल जाता है। पर देख कर हैरान हैं बंदे भी खुदा भी अभी भी गलत रास्ते पर कुछ लोग चल रहे हैं बड़े ऊंचे मीनार ज़मींदोज़ सामने पड़े हैं उनकी फ़ितरत है अभी भी अकड़ रहे हैं। अपने ईमान का सौदा हर रोज़ कर रहे हैं कहने को तो ज़िंदा हैं समझो तो मर गए हैं। रिश्वत बेईमानी अपने फ़र्ज़ को नहीं निभाना शराफ़त का लफ़्ज़ सीखा पढ़ा है न है जाना। उनको नहीं मालूम है दिन चार जीना चलना है रहेगा यहीं सब ठौर ठिकाना। इंसान हैं इंसानियत से पहचान नहीं है नहीं जानता बिना बात ही बदनाम नहीं है। काम आएगी ये पाप की दौलत न हराम की कमाई जब ऊपर वाले के घर होगी रसाई। अब तो इंसान बनकर दिखाओ अपने हक़ ईमान की रोज़ी रोटी कमाओ किसी को नहीं लूटो न किसी को सताओ जो गलत काम करते उनके हौंसले न बढ़ाओ शासक हो अफ़्सर हो पुलिस हो या हाकिम चाहे मुंसिफ थोड़ा तो ख़ौफ़ उस खुदा का खाओ। कितने गुनाह किये हैं हिसाब लगाओ अपने दिल पर हाथ रखकर सच सच बताओ भगवान की लाठी की कोई आवाज़ नहीं होती है मुमकिन है बाद में बहुत पछताओ। आदमी बनकर आदमी के साथ बात करो बस कुछ भी नहीं हस्ती तुम्हारी मत इतराओ।

     भगवान ये खुद को आपके भक्त बतलाते हैं आपके नाम पर सोशल मीडिया पर जमकर शोर मचाते हैं। मगर सच से घबराते हैं झूठ के गुण गाते हैं। कारोबार नौकरी राजनीति समाज सेवा जो भी करते हैं अपने मतलब की खातिर उल्लू सबको बनाते हैं हर हथकंडे आज़माते हैं हेरा फेरी लूट जालसाज़ी नैतिक अनैतिक सब तरीके अपनाते हैं खूब पैसा कमाते हैं। मौज मस्ती करते हैं गुलछर्रे उड़ाते हैं झूठ को सच सच को झूठ बनाकर दिखाते हैं मगर सब कुछ करने के बाद भी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाते हैं धर्म की बातें करते हैं धार्मिक भजन कीर्तन गाते हैं नमाज़ पढ़ते हैं मोमबत्ती जलाते हैं। दुनिया को ये आबाद नहीं बर्बाद कर रहे हैं अपनी झोली अपने झूठ अधर्म से भर रहे हैं। कौन इनको सबक सच वाला पढ़ाये भटके हुए हैं कोई राह सच की दिखाए सोई हुई इनकी इंसानियत शराफत को जगाये इंसान हैं इंसान इनको बनाये। जाने कैसे कैसे भगवान हैं इनके ये समझते हैं इनके आगाज़ भी हैं और अंजाम हैं इनके पर इनका कोई शुरुआत का पता न आखिर की खबर है। रहजन है वही जिसको बना लिया रहबर है ये रहजन को मसीहा समझने लगे हैं। मझधार को किनारा बताने लगे हैं ये लोग औरों को रुलाने लगे हैं सब खून के आंसू बहाने लगे हैं मगर ये बेरहम हंसने मुस्कुराने लगे हैं। अपने झूठ को सच बताकर कहते हैं बड़ा सच फरमाने लगे हैं श्मशान को देखो सजाने लगे हैं। खुद पर रहा इनको इख़्तियार नहीं है ये करते हैं गुनाह समझते हैं कर्म हैं करते अपने गुनाह पर शर्मसार नहीं हैं।

   

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