Saturday, 29 August 2020

तुझे हंसना मना है जुर्म रोना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 तुझे हंसना मना है जुर्म रोना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

तुझे हंसना मना है , जुर्म रोना है 
यहां औरत है क्या बस इक खिलौना है।

नई कोई कहानी लिख नहीं सकते 
तुझे फिर से ज़लीलो-खार होना है। 

समझते लोग खुद को सब फ़रिश्ते हैं 
शराफ़त बोझ तेरा तुझको ढोना है। 

मुहब्बत ढूंढना मत जाके महलों में 
नहीं उसके लिए कोई भी कोना है। 

सरे-बाज़ार बिकना तुझको आखिर है 
तुम्हारी लाश पर चांदी है सोना है। 

बताओ कोख़ हर इक पूछती सब से 
उगाये फूल कांटों का बिछौना है। 

न पूछो हाल "तनहा" क्या हमारा है 
ये आंचल आंसुओं से रोज़ धोना है।