Thursday, 16 July 2020

बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

        
    हमारी सरकार भी आशिक़ की महबूबा जैसी है हमको कितनी अच्छी लगी थी जब दिल आया था उसको अपनी बनाया था। अब उसको अपने बनने संवरने से ही फुर्सत नहीं मिलती हम दर्द ए दिल की बात कहते हैं सुनती ही नहीं है। मिलने की कोई सूरत नहीं है खत लिखते हैं पढ़ती नहीं महबूबा जवाब का इंतज़ार करते रहते हैं हम। दूर के ढोल सुहावने होते हैं अब समझ आने लगा है उसके पास सौ बहाने हैं हज़ार काम हैं करने को हमारी तरह खाली तो नहीं है। इक दिन बड़े नखरे से अदा से कहने लगी ये सब्सिडी छोड़ क्यों नहीं देते और सभी ने छोड़ दिया जो भी सरकार ने जब मांगा दे दिया या देना लाज़मी था। कोई उस से नहीं कह सकता तुम भी छोड़ दो कितने फज़ूल खर्चे करती फिरती हो मगर कह नहीं सकते अपनी सरकार है महबूबा है शान से रहती है अच्छा है। शायद कभी कहेगी बस अब कोई कर नहीं देना बहुत दे दिया कब तक अपना पेट काटकर सरकारी खज़ाना भरते रहोगे कुछ लोगों पर बर्बाद करने को , मगर ये झूठा सपना नहीं सच होगा कभी भी। आजकल पहचानती नहीं है ये महबूबा हमको हमसे आधार कार्ड मांगती है खुद जिसका कोई आधार नहीं था अब खुद को संसार मानती है। ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया , हमने सोचा था कि बारिश में बरसेगी अच्छे दिनों की शराब , आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया। यही आशिक़ी का रोना है दूर रहना मुश्किल लगता था करीब आकर जीना मुहाल हो गया है , कमाल होना था मगर क्या कमाल हो गया है धोती फाड़कर जैसे रुमाल हो गया है। जो कबाड़ी था मालामाल हो गया है बाकी हर बंदा कंगाल हो गया है।

   चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। उस मोड़ से शुरू करें हम फिर से ज़िंदगी , हर शय जहां हसीन थी हम तुम थे अजबनी। हर कोई पछताता है काश उस से कभी मुलाकात नहीं होती कोई बात नहीं होती ये बेमौसम की बरसात नहीं होती। अपनी चांदनी रात की मुलाकात नहीं होती हुस्न-ओ -इश्क़ की करामात नहीं होती। तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान ए झूठ जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता। ये न थी हमारी किस्मत के दीदार ए यार होता , कोई रूह चैन पाती किसी दिल को करार होता। मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम कोई लौटा दे मुझे ऐसी सरकार से पहले के वही दिन जैसे भी थे इन अच्छे दिनों से बेहतर थे। कोई पुल टूट गया बह गया पहली बरसात में , नर्म लहज़े भली बातें मुहज़्ज़ब लहज़े पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं। लोग सरकार को दोष देने लगे मगर सरकार नदी पर बने पुल के ढहने बहने का इल्ज़ाम गांव के लोगों पर लगा रही है उन्होंने लॉक डाउन का पालन नहीं किया घर बैठे रहते तो ये दिखाई कैसे देता। नेताओं की बात और है उनको चुनाव लड़ना है कोरोना बढ़ता है उनकी बला से सरकार बनी रहनी चाहिए। आठ साल में बना पुल महीने भर भी काम नहीं आया सरकार बनाने गिराने की बात और है उनका खेल ख़त्म नहीं होता है कोशिशें नाकाम भी होती रहती हैं इरादे कायम रहते हैं।

        इक और राज्य की पुलिस ने सरकारी ज़मीन पर खेती करने वाले किसान पर जमकर लाठी चलाई उस की पत्नी तक को नहीं बख्शा बच्चे बिलखते रहे कानून का बेहरम नंगा नाच चलता रहा। ऐसे पुलिस वालों को सज़ा तबादला करना जांच करना और क्या फांसी चढ़ाओगे। पुलिस वाले पर ज़ुल्म करने वाले को मुठभेड़ में कत्ल का इंसाफ आम मुजरिम और गुनहगार पुलिस दोनों पर न्याय कानून अलग अलग। पुलिस कानून को पालन करवाती है मनवाती है खुद नहीं पालन करती मनवाती कभी। साहब बीवी और ग़ुलाम कमाल की फ़िल्म थी मगर कहानी बदल गई है। फिल्म में नायिका की बात मन में रहती है नायक साहब की बीवी की उलझन सुलझाता रहता है खुद अपनी उलझन नहीं सुलझा पाता है। चौदवीं का चंद की कहानी जुड़ गई है नायक दोस्ती निभाते निभाते अपनी बीवी से रिश्ता नहीं निभा सकता नायिका वही है गीत और है बदले बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं। बीवी घर बैठी गुरुदत्त की फिल्मों में अपनी दास्तां तलाश कर रही है। पिया रंगून नहीं दिल्ली जा बैठे हैं उनकी मन की बात रेडियो पर गूंजती है। शुरुआत खूबसूरत थी चौदवीं का चांद हो या आफ़ताब हो जो भी हो तुम ख़ुदा की कसम लाजवाब हो। हमको गुलामी करनी है आज़ादी से घबराते हैं और सरकार की दाढ़ी बढ़ती गई है उनको देख कर सोचते हैं ये क्या सूरत बना रखी है। मगर कोई देवदास नहीं हैं साहब साहब हैं वो चाहते हैं रोनी उदास शक्ल बनाकर दिखाना पर लगती नहीं उनकी अंदर की भावना छुपती नहीं छिपाने से। समस्या इतनी ही है कि देश की सरकार और राज्यों की पुलिस दोनों से कायदे की कथा नहीं लिखी जा रही है इधर उधर की कितनी फ़िल्मी कहानियां मिलाकर पैरोडी गीत और गंभीर विषय को कॉमेडी बना देते हैं। प्यार और सरकार दोनों बिना ऐतबार नाम को रह जाते हैं। शादी को छोड़ दिया ऐतबार को तोड़ दिया तकरार ही बची है।


1 comment:

Sanjaytanha said...

...सब्सिडी छोड़ क्यो नही देते...आधार कार्ड मांगती है.... घर बैठे रहते तो पुल का टूटना दिखाई नहीं देता...kmaalllll...दाढ़ी बढ़ती गई है👌👍