Friday, 29 March 2019

सत्य के बाद झूठ पर शोध ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       सत्य के बाद झूठ पर शोध ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  नेताजी की बात सबसे अलग है उन्हें वही करना है जो किसी ने पहले नहीं किया। पढ़ाई लिखाई को लेकर उनकी समझ हमारी समझ से परे है। गांधी जी सत्य पर करते रहे उनको झूठ पर शोध करना ज़रूरी लगा है। सच यूं भी किसी काम का नहीं इक तो सच का स्वाद कड़वा है दूजा सच नंगा होता है। नेता जी सोचते हैं हम्माम में सभी नंगे होते हैं फिर भी कोई घोटालों की बरसात में रैनकोट पहन कैसे बचा रहा कि कोई छींटा भी उनके दामन पर नहीं पड़ा दिखाई दिया। काश उनका ईमानदारी वाला लिबास नेताजी के पास होता तो वो उसी से अपने तन बदन को भीतरी वस्त्र की जगह पहन ऊपर अपना शानदार चमकीला लिबास डालते और इतिहास रचाते। ये नया इतिहास रचाने की उनकी हसरत जो नहीं करवाती वही कम है। चाहते तो थे कि देश का इतिहास उन्हीं से शुरू किया जाना चाहिए और बताया जाना चाहिए जिस तरह अमेरिका की खोज किसी ने की थी भारत भी धरती के नीचे गढ़ा हुआ था सदियों से उन्होंने आकर उसे मुक्त करवाया और सबको बताया ये असली भारत है। सत्यमेव जयते का उद्घोष बदलना चाहते हैं और झूठ को उसका अधिकार दिलवा सिंहासन पर बिठाना चाहते हैं। झूठ की महिमा गाना चाहते हैं सच को दफ़नाना चाहते हैं। धुआं बनकर वो आकाश में छाना चाहते हैं हम सभी मूर्ख हैं पहली अप्रैल हमारे संग मनाना चाहते हैं फिर सत्ता पाना चाहते हैं सबको छोटा बनाना चाहते हैं। बौने लोग पहाड़ पर चढ़कर दिखाना चाहते हैं बाकी लोग चींटियां जैसे लगते हैं समझाना चाहते हैं। कद अपना बढ़ाना चाहते हैं इक कवि की कविता भुलाना चाहते हैं जिसने लिखी थी कविता पहाड़ पर चढ़ने से बौने लोग और भी बौने नज़र आते हैं। 

               झूठ इक कला है उनका बोला हुआ झूठ कितना अच्छा लगता है जो है नहीं हुआ नहीं हो सकेगा नहीं उसी का होना होना है समझाना चाहते हैं। खुद हंसना हंसाना चाहते हैं हर किसी को रुलाना चाहते हैं। आग अपने घर को लगाना चाहते हैं रोज़ कोई खेल तमाशा दिखाना चाहते हैं। झूठ के देवता का बस इक मंदिर मेरे शहर में बना हुआ है क्या किसी को इस की खबर है कुछ पता है हम खबर उन तक पहुंचाना चाहते हैं। हम जानते हैं वही ऐसे मंदिर बनवाना चाहते हैं झूठ का परचम लहराना चाहते हैं। झूठ पर उनके शोध बेहद सफल रहे हैं जिनको नहीं खबर बताना चाहते हैं। झूठ सच का बाप है सच केवल अभिशाप है अपनी कहानी सुनाना चाहते हैं। सच अभी कहीं ज़िंदा तो नहीं बचा हुआ जांच सीबीआई से करवाना चाहते हैं सच की लाश मिल जाये तो उसको सूली चढ़ाना चाहते हैं। सच को कितनी बार कत्ल किया था उन्होंने फिर भी सच का भूत उनको नज़र आता है दिखाई देकर पसीने पसीने करता है कोई ओझा बुलवाना चाहते हैं। सच के भूत की मुक्ति करवाना चाहते हैं उसके निमित तेरहवीं रस्म निभाना चाहते हैं। सच ज़िंदा नहीं है लोग मानते नहीं मगर वो भी ज़िद पर अड़े हैं मनवाना चाहते हैं। झूठ के शानदार दिन लाना चाहते हैं अच्छे दिन की बात नहीं दोहराना चाहते हैं। चुनाव की बेला में झूठ के मंदिर आकर मनचाहा वरदान पाना चाहते हैं सब उनको मेरे शहर बुलाना चाहते हैं झूठ का मंदिर बनवा लिया है उन्हीं से उद्घाटन करवाना चाहते हैं। 

      झूठ के सच्चे पुजारी वही हैं दवा भी हैं और बीमारी वही हैं। झूठ पर दिल जान से बलिहारी वही हैं। झूठ की महिमा किसी आशिक़ से पूछना झूठ बोलकर मिलती है मुहब्बत सभी को। प्यार की रहती है हसरत सभी को , प्यार सच से कोई कभी करता नहीं है , कोई आशिक़ झूठ बोलने से डरता नहीं है। कब कोई साथ जीता है मरता है चांद तारों की बात कोई करता है हर कोई डूबने को समंदर में क्या उतरता है। सच खड़ा किनारे आह भरता है झूठ की कश्ती पर झूमती गाती है रानी तब शुरू होती है प्रेम की कहानी। किसे याद है बूढ़ी नानी की कहानी परियों का डेरा बारिश का पानी कितनी पुरानी ग़ज़ल है सुनानी। जगजीत सिंह की सुनी थी ज़ुबानी सच्ची कहानी , नहीं याद करते अब बातें पुरानी। सच्ची बात कही थी मैंने लोगों ने सूली पे चढ़ाया। मुझको ज़हर का जाम पिलाया फिर भी उनको चैन न आया। ले के जहां भी वक़्त गया है ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है सच का ये ईनाम मिला है। सबसे बेहतर कभी न बनना ,जग के रहबर कभी न बनना। पीर पय्यमबर कभी न बनना , सच्ची बात कही थी मैंने। चुप रहकर भी वक़्त गुज़ारो ,सच कहने पर जां मत वारो , कुछ तो सीखो मुझसे यारो , सच्ची बात कही थी मैंने। ग़ज़ल सच्ची है मुझे अच्छी लगती है मगर क्या करूं सबक याद नहीं हुआ सीखा नहीं कोई सबक सच बोलने की आदत भी जाती नहीं है जान लेगी किसी दिन शायद। उनको झूठ से मुहब्बत बहुत है सच बोलने से अदावत बहुत है हमें झूठ कहना आता नहीं है सच से उनका कोई नाता नहीं है। सच कोई किसी को बताता नहीं है ये यूं भी लोगों को भाता नहीं है। झूठ का शोध उनको मुबारिक सच है तोहमत मंज़ूर हमको लेकिन। झूठ कलयुग का भगवान होगा मगर सच को देखेगा तो हैरान होगा। सच फिर भी सच ही रहेगा झूठ बिना पांव कितना चलेगा।

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