Saturday, 16 March 2019

आदर्श आचार संहिता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      आदर्श आचार संहिता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     मैं जनता की भलाई को ध्यान रखते हुए निर्वाचन आयोग से इक निवेदन इक विनती करना चाहता हूं। बस बहुत लागू कर के देख चुके अब आदर्श आचार संहिता को तुरंत वापस ले ले। न तो मुझे कोई चुनाव लड़ना है न ही राजनीति से कोई मतलब है मुझे फिर भी तमाम कारण हैं जिन पर विचार करने के बाद समझ आया है कि इस से जिनको मुश्किल होनी चाहिए ऐसा समझते हैं उनको नहीं वास्तव में बाकि जनता को मुश्किल होती है। सबसे पहली बात अपने चुनाव आचार संहिता बनाते समय आम जनता की कोई सलाह ली ही नहीं। जबकि इसका असर पड़ता जनता जनार्दन पर ही है। राजनैतिक दलों से मशवरा करने का क्या औचित्य है ये उस तरह की बात है जैसे खेल के नियम खिलाडियों से राय से बनाये जाएं। राजनीति का मतलब राजनेताओं से नहीं बाकी सभी लोगों से अधिक होता है क्या जनता बस खेल की तमाशाई है तालियां बजाने भर को। सब को मालूम है ऐसी किसी संहिता का पालन होता नहीं है और इसको मानकर चुनाव जीतना क्या लड़ना भी संभव नहीं है। जब शुरुआत पर्चा दाखिल करते समय ही बात झूठा शपथ पत्र देने से की जाती है तो आगे भगवान ही मालिक है। जनता पर इसका कितना खराब असर होता है इसकी व्याख्या करना ज़रूरी है तभी आयोग को भूलसुधार करने की बात समझाई जा सकती है।

    इस देश में अधिकारी आदी हैं कोई काम बिना ऊपरी आदेश नहीं करने की आदत के। खुद ब खुद अगर उचित कार्य करने की रिवायत होती तो विनती करने को अर्ज़ी देने दफ्तर जाकर कतार में खड़े होने की नौबत नहीं आती। खुला दरबार लगाने की परंपरा का अर्थ भी शासक का दाता बनकर अनुकंपा करना है जबकि वास्तव में लोग जाते हैं उचित कार्य नहीं किये जाने की शिकायत लेकर। सत्ता को शिकायत सुनना पसंद नहीं है और अधिकारी अगर रिश्वत लेने का लालच नहीं हो तो कोई काम करने की ज़हमत उठाते ही तभी हैं जब कोई सत्ताधारी दल का नेता सिफारिश करता है। चुनाव से पहले इस सब को रोकने से क्या मतलब यही है कि आपको बाकी पांच साल तक उचित काम भी मनमानी पूर्वक करने की खुली छूट मिली हुई है। जैसे उपवास के दिन खाने पीने पर कोई रोक या ऐतिहात की बात हो। नेता अपने ख़ास लोगों और धनवान चंदा देने वालों के सभी काम हमेशा करने को तत्पर रहते हैं यही अकेला अवसर जनता के लिए था वोट मांगने आने वाले नेताओं से अपने काम करवाने की बात करने का उसे भी आयोग ने छीन लिया। नेताओं की मंशा कभी नागरिक के उचित काम बिना फायदा उठाये करने की होती नहीं है इस तरह उनको बहाना मिल गया है नहीं करने का।

     चुनाव होने के बाद नेताओं को सरकार बनाने गिराने से अधिक महत्व किसी बात का नहीं होता है। आम नागरिक से मिलने को फुर्सत नहीं होती न ही मिलना चाहते हैं। आम जनता से मुलाक़ात कभी संभव हो तब भी टरकाने को सौ ढंग हैं अर्ज़ी ले लेना विभाग को आगे भेजने की बात कहना या फिर दिखावे को भेज भी देते हैं लेकिन वास्तव में काम किस का करना है हिदायत देने पर ही होता है वर्ना अर्ज़ियां रद्दी की टोकरी में चली जाती हैं। आम जनता के लिए हिदायत चुनाव के वक़्त दी जाती थी उसी को बंद करवा दिया आपने। क्या संविधान उचित काम चुनाव के दिन नहीं करने को कहता है , नेताओं को सिफारिश से रोकना है तो हमेशा को बंद करना चाहिए। सब जानते हैं नेताओं की सिफारिश बिना काम जायज़ ढंग से होते ही नहीं ये कुछ दिन की पाबंदी नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज पर जाने की चुटकुले जैसी बात है।

   दूसरा नियम चुनवों में खर्च पर सीमा को लेकर है हर बार जो हमुमान जी की पूंछ की तरह बढ़ता जाता है। सीमा में खर्च का शपथ देना कोई चुनावी उपहास जैसा है। पांच साल नेता हज़ार तरह से कल्याण राशि के नाम पर कोई और तरीका अपना कर देश के खज़ाने और जनता से चंदा रिश्वत किसी रूप में वसूल कर लूट का व्यवसाय करते हैं और पता चलता है उनके कुछ हज़ार करोड़ों बन चुके हैं ऐसा जादू का करिश्मा अन्य कोई नहीं जनता देश में। देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा इन पास है अगर इनको सीमा से कम नहीं बल्कि ऐसा नियम होता कि आपको दो करोड़ से अधिक खर्च करना लाज़मी है अन्यथा आपका चुनाव रद्द हो जाएगा तब जितना काला सफ़ेद धन इनकी तिजोरी में सड़ता है उसको हवा लगती और देश की अर्थव्यवस्था में इतना पैसा आने से कितने लोगों को थोड़ा हिस्सा मिल जाता। वैसे भी कोई शरीफ और ईमानदार आदमी चुनाव लड़ने की बात सोच भी नहीं सकता है।  चुनाव  लड़ने जीतने को गुंडागर्दी बदमाशी अपराधी होना ज़रूरी शर्त जैसा है आधा सदन इनकी बदौलत है।
          आखिर में सार की बात समझने को कई ढंग हो सकते हैं मगर कई बातें सुनने को अच्छी लगती हैं वास्तव में अच्छी साबित नहीं होती हैं। कितने राज्य शरब बंदी लागू करते हैं मगर शराब बिकनी बंद नहीं होती। शराब के दाम कई गुणा बढ़ जाते हैं और शराब माफिया घर घर बोतल पहुंचाता है। अभी कितने लाख करोड़ हर दल चुनाव पर खर्च करने को लिए बैठा है सब जानते हैं। उनको खर्च करना है जाने किस किस ढंग से कोई रास्ता तलाश कर के या फिर खर्च करने का नाम और तरीका बदल कर। आयोग आचार सहिंता की भूल को सुधार सकता है या बेशक इसका स्वादिष्ट अचार डाल कर सबको खाने खिलाने की बात कर मालामाल हो सकता है। जैसे हर सरकारी विभाग आयकर विभाग अकेले नहीं कई तरह से कुछ फीसदी जुर्माना या कर वसूल कर अनुंचित उचित का अंतर खत्म कर देता है। हर उम्मीदवार से खर्च का बीस तीस फीसदी लेकर छूट दे सकता है। मिल बांट कर खाना अच्छी बात है , न खुद खाऊंगा न किसी को खाने दूंगा का सच कौन नहीं जानता है आपको भी अभी की सी ए जी की रिपोर्ट को देख जान लिया होगा। सत्ता की भूख से बढ़कर कोई हवस नहीं दुनिया में। गागर में सागर भरने जैसे बात कही है थोड़े लिखे को बहुत समझना।

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