Monday, 28 January 2019

कुछ रह गया कुछ छोड़ दिया ( साहित्य की दुनिया - उपसंहार ) ---- डॉ लोक सेतिया

    कुछ रह गया कुछ छोड़ दिया( साहित्य की दुनिया - उपसंहार ) 

                                                  डॉ लोक सेतिया 

     दो पोस्ट लिख कर भी वास्तव में बात कतरे तक पहुंची और समंदर का ओर छोर समझना रह गया। वह पुरानी कहानी अंधे को हाथी अपने हाथ जिस जगह लगे उसी अनुसार लगा। मगर बात और भी है कुछ को कहना भूल गये लिखने वाले तो कुछ तो जानकर नहीं लिखा और रहने दिया। आपको हमको जो कविता जो ग़ज़ल दर्द भरी मन को छूती लगती है उसके पीछे की कहानी अगर कोई है तो कोई नहीं जनता जिस की बेवफ़ाई का मातम कोई कर रहा है क्या वास्तव में उसका कोई दोष था या उस पर झूठी तोहमत लगा दी किसी ने अपनी कलम के हुनर का गलत इस्तेमाल कर के। अक्सर लिखने वालों ने किसी को नायक साबित करने को दूसरे की बात को ऐसे ढंग से लिखा कि उसकी अच्छाई भी सामने आने नहीं पाये। आशिक़ लोग जब किसी की बेवफ़ाई की बात कहते हैं तो शायद भूल जाते हैं ताली दोनों हाथ से बजती है और जिसको वास्तव में प्यार किया उसकी रुसवाई करना सबसे बड़ी बेवफ़ाई होती है। सवाल महिला पुरुष का भी नहीं जब जो किसी को पाना चाहता है उसकी मर्ज़ी का आदर नहीं करता है। ऐसा नहीं है कि लिखने वालों ने इस पक्ष को लेकर लिखा ही नहीं मगर बहुत कम लिखने वालों ने लिखा और जाने क्यों उसकी बात उतनी चर्चित नहीं हुई। सफर फिल्म में नायक नायिका मुहब्बत करते हैं मगर नायक को पता चलता है उसको खून का कैंसर है और नायिका भले उसके साथ विवाह करना चाहती है वो जिसको चाहता है उसकी भलाई की खातिर अपने प्यार का वास्ता देकर उस से विवाह करने को कहता है जो सह-अभिनेता नायिका को चाहता है। अंजाम भले जो भी हो और वास्तव में अंजाम लेखक अपने मन में तय कर चुका होता है कि कहानी सार्थक है मगर अंजाम अंत में दुःखद ही रखना है। आनंद फिल्म फिर भी बेहतर है जिस में नायक जिसे चाहता है नहीं मिलती तो उस शहर से दूर चला जाता है और अपनी महबूबा की रुसवाई नहीं करता है। दो बदन फिल्म की नायिका इक डॉयलॉग में सच्चे प्यार की परिभाषा बताती है कि जो पा लेने को प्यार समझता है उसको प्यार क्या है समझने को कई जन्म लेने होंगे। अनुभव फिल्म की नायिका का डॉयलॉग शायद ही कोई समझेगा जो अपने पति को कहती है , हम दोनों कुछ पल को मिला करते थे और कॉलेज के ज़माने में जितना समय हमने साथ बिताया उसको एक साथ जोड़ा जाये तो सात घंटे भी नहीं बनेंगे कुल , मगर उन सात घंटों में जितना प्यार मुझे उस से मिला आपसे शादी के बाद सात सालों में भी उतना मिला नहीं , और उसने मुझे कभी छुआ तक नहीं। ख़ामोशी हंसते ज़ख्म सफर मिलन अनुभव जैसी फ़िल्मी कहानियां हम को पसंद नहीं आईं क्योंकि हम भी अपनी मानसिकता को बदलना नहीं चाहते। औरत कविता मेरी इस विषय को लेकर ही है कि क्या किसी महिला के बदन को टुकड़ों में बांटकर देखना चाहत कहला सकता है , तेरी आंखें तेरे होंट तेरा फलां अंग इस तरह सुंदरता की बात करना उचित है या जिसको भी चाहते उसको पूरी तरह से उसकी शख्सियत को प्यार करना चाहिए। शायद महिलाओं को भी इस जाल से निकलना चाहिए और मजाज़ लखनवी जी की ग़ज़ल को समझना और उस से सबक लेना चाहिए। तू इस अंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था। 
      कल किसी की पोस्ट पर लिखा हुआ पढ़ा अमृता और इमरोज़ को लेकर , लिखा था हर औरत में थोड़ी अमृता मिलती है मगर किसी पुरष में इमरोज़ नहीं मिलता। मेरे इक दोस्त को जाने क्या सूझी कि अपना नाम इमरोज़ रख लिया। मगर आपको अमृता की बात समझ आती है इमरोज़ की नहीं उनका रिश्ता उस तरह का था ही नहीं और आपको कोई अमृता इमरोज़ नज़र आये तो शायद आपको ही बदकार बदचलन शब्द याद आने लगें क्योंकि हम खुद जैसे भी हों औरों से चाहते हैं सामाजिक बंधनों का पालन करना। साहिर की बात को भी नहीं समझा अपने अन्यथा उसको इल्ज़ाम देना नहीं चाहते , कोई आशिक़ अपनी महबूबा को मुझे छोड़ कर भी तुम जा सकती हो , तेरे  हाथ में मेरा हाथ है जंजीर नहीं। हमारी समस्या है कि हम जिसको प्यार करते हैं ऐसा मानते हैं या दावा करते हैं उसको आज़ादी नहीं देते उसकी भावनाओं का आदर नहीं करते। तू अगर मेरी नहीं है तो पराई भी नहीं वाला प्यार और चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों जैसा सच्चा इश्क़ कितना अंतर है। छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए। ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो अपमान रचेता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे , संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे। 
                         आपको वही लोग भाते हैं जो सफल हुए मगर जो असफल रहे उनकी कहानी कोई लिखता भी नहीं है। जावेद अख्तर को जानते हैं मगर उनके वालिद जाँनिसार अख्तर को शायद नहीं जो साहिर के समय के उनके दोस्त थे और कहते हैं साहिर की रचनाओं को ठीक किया करते थे। मगर उनके बारे बताया जाता है कि साहिर की महफ़िल में किसी सोफे के कोने पर सिकुड़े हुए बैठे रहते थे। उनकी शायरी को पढोगे तो पता चलेगा कितना लाजवाब लिखते थे। सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है , ये ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है। जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं , देखना ये है कि अब आग किधर लगती है। कोई और शायर थे जो बॉम्बे से असफल निराश वापस जाते हुए अपना कालम सारा बेच गये चंद रुपयों में मज़बूरी में जिनको बेचकर कोई हसरत जयपुरी शोहरत की बुलंदी पर जा पहुंचा। ऐसे जाने कितने किस्से हैं जो खो गये वक़्त की आंधी उनको कहां ले गई पता नहीं चला। 
         आखिर में इक और विषय की बात करना चाहता हूं , हर सभा में कोई उपदेशक कहता मिलता है कि बच्चे बुरे हैं और माता पिता अच्छे जो उनके लिए क्या कुछ नहीं करते। सोचो जो आज माता पिता हैं कभी वो भी बच्चे थे और तब उनको लेकर भी यही बात कही जाती होगी। बच्चे भी खराब हो सकते है और माता पिता भी ऐसे होते हैं जो अपने बच्चों के साथ सही नहीं करते हैं। अपने बच्चों को आज़ादी नहीं देना अपने आधीन रखने को जैसे चाहे करना ये भी इसी दुनिया में होता है। बच्चे को अच्छा बनाना बुराई की तरफ भेजना दोनों काम करते हैं माता पिता। जो चोर रिश्वतखोर अपराधी मतलबी देश को समाज को नर्क बनाते हैं उनकी संतान को भलाई का सबक कैसे समझ आएगा। मगर इक चलन बन गया कि जैसे भी हों माता पिता पूजनीय हैं जैसे जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है ये सच लिखना नहीं है और साहित्य को सच हर तरफ का पूरा लिखना चाहिए आधा सच झूठ से भी खराब होता है।

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