Sunday, 27 January 2019

साहित्य की दुनिया का चेहरा ( खरा सच ) भाग दो - -- डॉ लोक सेतिया

 साहित्य की दुनिया का चेहरा ( खरा सच ) भाग दो - डॉ लोक सेतिया

                                        ( पिछले अंक से आगे )

   एक तरफ वास्तविक लेखक चुपचाप बिना कोई मानदेय या रॉयल्टी पाये सृजन करता है और छापने वाले अख़बार मैगज़ीन वाले बिना कीमत चुकाये या नाम को कुछ देकर उसका शोषण करने के बावजूद भी कहते हैं साहित्य की समाज की भलाई का महान काम करते हैं। एक रचना लेखक के दर्द की भेजी थी लिखने वाले लिख अपनी भी कहानी और नतीजा क्या हुआ जानना चाहोगे। किसी अख़बार ने जो शहीद परिवार फंड की बात किया करता था मेरे लिखे हुए कागज़ के पुर्ज़े कर के अर्थात उसको फाड़कर वापस भेजा था। मैंने तब    उनको खत लिखा था कि ऐसी रिवायत है कि जब किसी के घर कोई मरता है तो चिट्ठी को फाड़कर भेजते हैं सभी को सूचना देने को। उनके वहां भी ज़मीर की मौत हुई होगी या समझ आया था। यकीन करना ये अख़बार कोई घाटे में नहीं चलता है करोड़ों की आमदनी है और बहुत जगह से इक बड़ी संख्या में छपता है। कभी अख़बार लिख कर बिकते थे आजकल बिक कर लिखते हैं। बड़े क्या शहर के हज़ार दो हज़ार संख्या में छपने वाले सांध्य दैनिक भी सत्ताधारी दल का गुणगान करते कई कई अंक निकालते हैं दल से कीमत लेकर। मगर फिर भी सच और लोकतंत्र का सतंभ होने का दावा भी है। कड़वा सच यही है कि बहुत लोग इस काम को करते हैं मगर उनकी कमाई अधिकारियों के लिए बिचौलये बन रिश्वत का धंधा चलाने से होती है। मेरी रचना पढ़कर इक मैगज़ीन के संपादक का फोन आया जो बताने लगे चालीस साल से मैगज़ीन निकलती है और अभी भी कुछ हज़ार घाटे का कारोबार हर महीने है। मैंने पूछा आपको वेतन मिलता है तो पता चला उनका वेतन घर का किराया कार और फोन आदि सुविधाओं का खर्च मिलाकर भुगतान लाखों में है। बाकी जो भी कर्मचारी हैं उनका भी वेतन बाकायदा देते हैं बिजली का बिल और कागज़ की कीमत और छपाई का बिल भी चुकाते हैं और डाक से भेजने का ही नहीं जो मैगज़ीन बेचते हैं उनको भी पैसे मिलते हैं। केवल एक लिखने वाले को ही देना ज़रूरी नहीं है उनको दिलासा देने को खत भेजते हैं जब संभव हुआ भुगतान किया जाएगा। तीन साल में हर महीने छपी रचनाओं का मानदेय बकाया है। सवाल ये है कि जिनके विज्ञापन छापते हैं उनसे एक पेज के लाखों वसूल करते हैं मगर लिखने वाले को दो सौ भी देने में आनाकानी करते हैं। 
          लिखने वाले भी कम नहीं है जिनको नाम शोहरत हासिल है उनकी रचनाएं सुनकर लगता है जैसे ग़ज़ल कविता को हथियार बनाकर किसी को नफरत का निशाना बना रहे हैं। सच कहने का अधिकार है और सत्ता की खामियां बताना आलोचना करना भी हर लिखने वाले का काम है मगर जब कोई खुलकर किसी को खलनायक बताने की बात करते हुए ये भी ज़ाहिर करता है कि उनको बोलने की आज़ादी नहीं है तब बात हज़म नहीं होती है। देश विदेश जो मर्ज़ी कहते हैं मगर अपने धर्म या वर्ग के नाम पर उनका दमन किया जाता है दहशत है कहकर तालियां और खूब धन पाते हैं। यकीनन ऐसा ग़ज़ल कविता साहित्य के साथ उचित नहीं है और हर किसी को इक सीमा का उलंघन करने की इजाज़त नहीं हो सकती। साहित्य दुर्भावना पैदा करने का माध्यम नहीं है और आपको राजनीति की बात किसी और मंच से करनी चाहिए। साहित्य ग़ज़ल कविता की अपनी मर्यादा है और जिस तरह इधर लोग अपनी ग़ज़ल को भी पूरा नहीं टुकड़ों में बांटकर सुनाते हैं उसे मुशायरे की परंपरा में अनुचित कहते हैं। ग़ज़ल सुनने का शुऊर भी और सुनाने का सलीका भी होना चाहिए , इक मतला और इक शेर पेश है , तालियां बजाकर दाद देंगे तो अच्छा है , सामने पहली कतार में बैठे
आयोजकों का नाम बार बार लेकर उनकी चाटुकारिता करना किसी बड़े शायर की शोभा नहीं देता है। कवि सम्मेलन और मुशायरे के नाम पर चुटकलेबाजी जुमले उछालना और बस किसी तरह मनोरंजन करना देख लगता है साहित्य और अदब की नहीं मसखरे या बहरूपिये हैं जो किसी को खुश कर अपना पेट भरते हैं। 
            टीवी चैनल के मालिक और फ़िल्मकार बिना लिखने वालों के नहीं चलता उनका काम कभी। मगर इक तरफ जो पर्दे के सामने है नायक नायिका अदाकार उनको लाखों करोड़ों और लिखने वाले को कहने भर को थोड़ी बहुत राशि मिलना न्याय की बात नहीं है। अभी कुछ साल तक लिखने वाले से सभी अधिकार कोई खरीद लिया करता था मगर अब कानून बदल गया है फिर भी चलन बदला नहीं है। वास्तव में जैसे हम सोचते हैं कि किसान को अपनी फसल की कीमत उसकी महनत का मोल मिलना चाहिए ठीक उसी तरह हर लेखक की रचना को उपयोग करने से पहले लिखने वाले की मर्ज़ी की कीमत देनी चाहिए। जब तक लिखने वाले को लेखन से पेट भरने को रोटी नहीं मिलती कोई साहित्य और अदब को बढ़ावा देने की बात करता है तो इक झूठ या छल है। खेद की बात है कि देश की हर राज्य की साहित्य अकादमी को खूब बजट मिलता है मगर उसका सार्थक उपयोग साहित्य को बढ़ावा देने को नहीं कुछ अपनों को रेवड़ियां बांटने को किया जाता है। अधिकतर ईनाम पुरुस्कार जिनको मिलते हैं उसके काबिल नहीं होते हैं और जो वास्तव में हकदार हैं उनको कुछ नहीं मिलता क्योंकि उनको इसकी कला आती नहीं है। ऐसे ही एक बहुत अच्छे लेखक को कैंसर रोग होने पर हरियाणा की पंजाबी अकादमी ने नाम भर को सहायता भी विलंब से दी थी जबकि उनसे कम अच्छा लिखने वाले अकादमी के निदेशक बने हुए थे और दोनों एक ही शहर के रहने वाले थे। साहित्य अकादमी के पद ही जब साहित्य को योगदान नहीं अन्य कारण से मिलने लगे तो कुछ भी उम्मीद बचती नहीं है। शायद तभी आजकल पहले जैसे कद के लिखने वाले किसी विधा में नज़र नहीं आते हैं और उनका बोलबाला है जो किसी तरह पहली कतार में बैठने का जुगाड़ करना जानते हैं।
       

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