Wednesday, 23 January 2019

मिल गया मिल गया मिल गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   मिल गया मिल गया मिल गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       सही समय पर उसका पता चल गया है। जाने क्यों तमाम लोग चिंतित थे कि वो कहां गायब हो गया। किसी ने पिछले चुनाव के समय उसको खोज कर लाने का वादा किया था। तब समझा जा रहा था किसी और देश में जाकर छुप गया है। तमाम दुनिया को छान मारा फिर भी मिल नहीं सका था और लोग सवाल करने लगे थे इस बार चुनाव में कैसे जवाब देंगे जनाब। मगर मिला भी तो उस जगह जहां सब जानते थे फिर भी किसी को ख्याल ही नहीं आया कि उसका असली ठिकाना तो राजनीतिक दल ही हैं उनसे अधिक काला धन किसी और के पास होना संभव ही नहीं है। चिंता होने लगी थी चुनावी जंग बिना वास्तविक हथियार कैसे लड़ेंगे सभी दल वाले। हिसाब लगाया जा रहा है काला धन पहले किस दल की तिजोरी में अधिक था और अब किस दल के खज़ाने में ज़्यादा है। काले धन का धन्यवाद जो जब उसकी सबसे अधिक ज़रूरत थी खुद ही सामने चला आया है। देखा तो पूछना ही पड़ा कहां खो गया था भाई लोग जाने क्या क्या वहम करने लगे थे कि शायद तुम खत्म ही हो गये हो। हंस दिया काला धन , कहने लगा मुझे पता था ढूंढने वाले सभी लोग हर घर की तलाशी लेंगे मगर खुद अपने घर की कोई तलाशी नहीं लेगा। दल कोई भी हो और कितना भी विरोध आपस में भले हो भाईचारा कायम रखना सबको महत्वपूर्ण लगता है। कोई भी दल सत्ता में हो किसी भी दल को काले धन को लेकर कोई चिंता नहीं रहती है। आम जनता के माथे पर काला धन दाग़ की तरह होता है मगर राजनेताओं के चेहरे पर काले टीके जैसा नज़र लगने से बचाने को लगा प्यार की निशानी जैसा। 
    जिनको भी काला धन मिलने पर हिस्सा पाने की ललक रही उनको भरोसा रखना होगा बस कुछ दिन बाकी हैं। चुनाव आयोग अदालत जांच करने वाले सब ख़ामोशी से काले धन को फिर से नाचता खेलता और सब को नचवाता नज़र आएगा चुनावी जंग उसी से लड़ी जीती हारी जाएगी। कोई भी जीते कोई भी हारे इक यही काला धन है जो विजयी रहेगा और जिसकी जयजयकार हमेशा की तरह होगी ही। काला धन गुनगुना रहा है हम काले हैं तो क्या हुआ दल वाले हैं हम इस दल उस दल दल दल वाले हैं। काला धन सीना चौड़ा कर छाती ठोक खुले आम कह रहा है कोई है माई का लाल जो बिना उसके चुनाव लड़ भी सकता है। ये सभी नेता तो अपने हाथ की उंगलियों पर नाचने वाली कठपुतलियां हैं असली जीत हमेशा मुझ काले धन की हुई है और होती रहेगी। मेरी सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है सरकारी अधिकारी से लेकर जाने माने तमाम लोग मेरे चाहने वाले हैं उनके घर दफ्तर मेरा बसेरा है। कोई लाख कोशिश कर ले काला रंग पक्का होता है जिस पर चढ़ता है उतरता नहीं है। राजनीति काजल की कोठरी है उस में कालिख लगती सभी को है मगर अपनी कालिख को दाग़ कोई नहीं मानता है सब उसको तिलक समझते हैं। 
            हमने काला धन की बात जाकर टीवी चैनल वाले और अख़बार वाले को बताई और कहा आपको यकीन नहीं तो चलो मिलवा देते हैं। अचानक वही अट्टहास फिर सुनाई दिया और देखा जनाब वहां भी चले आये हैं , क्या साक्षात्कार देने को बुलाया है कह दिया। बोला हर दल जो भी विज्ञापन देता है मेरी बदौलत ही तो है मगर यहां आकर काला सफ़ेद का भेद बाकी नहीं रहता है रंगीन होते ही सभी रंग मिलने से चमक बढ़ जाती है। मीडिया वालों के पास काला धन होने की बात कोई नहीं कर सकता है क्योंकि फिर सुनाई कैसे देगी उसकी आवाज़। मीडिया के शोर में बाकी सभी की आवाज़ दब जाती है मार दी जाती है कुचल दी जाती है। जिस देश में हर धार्मिक स्थल दो नंबर के पैसे से दान लेकर या फिर किसी भी ढंग से ज़मीन मुफ्त में या नाम भर की सस्ती कीमत चुकाकर बनते हों उस जगह कोई खुदा कोई भगवान कोई देवी देवता चढ़ावे को काले सफ़ेद धन का होने की चिंता करता होगा। भूल गये नानक को खाने को रोटी किसी भी अमीर के घर से नहीं मिली थी और उन सभी को निचोड़ा तो खून निकला था दूध निकला था इक गरीब मज़दूर की घर की रोटी से ही। अब कोई नानक कोई कबीर जैसा संत है जो सब को खरी खरी सुनाता है। लिखने वाले तक भी आधा अधूरा सच लिखते हैं और इस तरह कि जब मर्ज़ी उसका अर्थ बदल कर समझा सकें। काला धन मिल भी गया है और अब उसका हौसला भी पहले से कई गुणा अधिक बढ़ा हुआ है। देखना आपके आस पास भी होगा खड़ा हुआ मस्ती में झूमता गाता शान से कदम रखता हुआ।

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