दिसंबर 23, 2018

झूठों पर मेहरबान सरकार मेरी ( कटघरे में ) डॉ लोक सेतिया

    झूठों पर मेहरबान सरकार मेरी ( कटघरे में ) डॉ लोक सेतिया 

    झूठ बोलना पाप है ये बड़ी पुरानी बात है। सच को ठोकर लगाई है झूठ सच का बड़ा भाई है। धर्म की मत पूछना बात जाने कब हो किसके हाथ। कानून मिट्टी का खिलौना है टूटे भी तो काहे को रोना है। झूठ सबसे अधिक वही सुनाते हैं जो सच सच का शोर मचाते हैं। झूठों की बहस करवाते हैं सीधा प्रसारित कराते हैं। किस बात का हल्ला मचाते हैं जब मिल बांट कर खाते हैं। बड़े लोगों की कही बात शानदार मेरी झूठों पर मेहरबान सरकार मेरी। भले अभी तक किसी को सज़ा मिली नहीं थी फिर भी देश में इक कानून है कि गलत बात का विज्ञापन देने वाले को जेल भी भेजा जा सकता था। मगर अब सरकार ने नियम बदला है और झूठे भ्रामक विज्ञापन देने पर जेल नहीं जाना होगा और केवल जुर्माना भर कर छूट जाया करेंगे। आपको लगता है इस में मेरा आपका क्या मतलब है तो समझ लेना ज़रूरी है कि जितने भी झूठे विज्ञापन या ठगी धोखा करने वाले छपते हैं या टीवी पर दिखाई देते हैं उन का असर हम आप पर ही पड़ता है और उनके उत्पाद खरीदने पर विज्ञापन का पैसा भी लागत में हम से वसूला जाता है। बहुत सामान की वास्तविक कीमत से अधिक विज्ञापन की लागत होती है। जिनको आप नायक समझते हैं उनको कंपनी झूठ बोलने के ही करोड़ों रूपये देती हैं। जिन भी चीज़ों का वो विज्ञापन देते हैं उनको वह खुद कभी उपयोग नहीं करते हैं ये आपको समझना कठिन नहीं है। मगर कुछ सवाल हैं जिन पर सोचना चाहिए सभी को। जुर्माना विज्ञापन से हुई आमदनी का छोटा सा हिस्सा होगा वो भी अगर कभी हुआ तब। 
 
                  कोई अभिनेता या नायिका आपको कहती है अमुक आयुर्वेदिक टॉनिक बच्चों को दोगे तो वो बिमार नहीं पड़ेंगे और ताकतवर बन जाएंगे। कभी कभी किसी भी आधार के बिना कोई आंकड़ा भी बता देते हैं कि इस साबुन से इतने फीसदी कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इस तेल की मालिश से चिंता मुक्त हो जाते हैं। इस शीतल पेय पीने के बाद आपमें हौंसला बढ़ जाता है और आप लंबी छलांग लगा सकते हैं। ये सब करोड़ों का नहीं कई अरब करोड़ का धंधा है और केवल इतना ही नहीं विज्ञापन देने वाले कंपनियां सरकार तक के झूठे आधारहीन तथ्य रहित विज्ञापन टीवी अख़बार पर देती हैं और जब कोई सूचना के अधिकार का उपयोग कर पूछता है तब बताया जाता है सरकार के विभाग के पास उसका कोई प्रमाण ही नहीं है और ऐसा विज्ञापन देने वाली कंपनी ने बिना किसी दस्तावेज़ ही जारी कर दिया था। साफ शब्दों में कोई कारोबारी तो क्या खुद सरकार भी आपको धोखे में रखती है तो आप क्या कर सकते हैं। वास्तव में विकसित देशों में झूठा विज्ञापन देने पर कड़े दंड का नियम है और विदेशी कंपनियां भी उन देशों में ऐसा नहीं करती मगर भारत में निडरता से मनमानी करती हैं। सरकार का अर्थ है नागरिक के साथ छल कपट धोखा कोई नहीं कर सके ऐसा विश्वास कायम रखना मगर जब सरकार ही अनुचित कार्य करने वालों का पक्ष लेकर उनको जेल जाने से बचाने की बात करती है तो खोट साफ नज़र आता है। 
 
            आप भूल जाते हैं इन बातों को कुछ दिन बाद कि कैसे जिसको कोई सरकार गंभीर अपराध का दोषी होने के बाद भी किसी की चौखट पर माथा टेकती है पैसे देती है और उसके अनुचित निर्माण को वैध कर देती है नियम बदलकर। और आज वही बलात्कार के संगीन अपराध में सज़ा पाया हुआ इक मुजरिम है। वोट और चंदे के लोभ में अथवा खुद जनता को झूठ से बहलाने को ऐसे विज्ञापनों को बढ़ावा देना दर्शाता है कि राजनेताओं के लिए अपराध रोकना महत्वपूर्ण नहीं है। सर्वोच्च न्यायलय कुछ भी कहता रहे और चुनाव आयोग जो भी विचार रखता हो राजनेताओं को राजनीति से अपराध और अपराधी दोनों को समाप्त करना ही नहीं है। दुष्यंत कुमार के लफ़्ज़ों में :-

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार। 

इस सिरे से उस सिरे तक सब श्रीके-जुर्म हैं ,

आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार। 


 


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