Friday, 9 November 2018

मुझे दे दो अपने गहने ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     मुझे दे दो अपने गहने  ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 सरकार और रिज़र्व बैंक का आपसी मामला है। सरकार समझा रही है जो धन तिजोरी में रखा हुआ है उसकी चाबी तुम मुझे सौंप दो मेरा धंधा मंदा चल रहा है। रिज़र्व बैंक नियम बताता है कि जो सुरक्षित रखना है उस पर आपकी नज़र नहीं होनी चाहिए उस से ज़्यादा जितना अपने मांगा दिया है मगर आपकी हालत और बिगड़ी है अब बचा हुआ देना अनुचित होगा। स्वायतता की बात सरकार को खलती है। कहानी को कहानी से समझ सकते हैं। पति पत्नी सात जन्मों का बंधन होता है और पत्नी मायके से लाई हो या विवाह में उपहार मिले हों ससुराल वालों से दोनों सोने के गहनों पर अधिकार उसी का होता है। हर महिला उसको जान से बढ़कर प्यार करती है और कोई भी मुसीबत आने पर यही उसका सहारा होता है। पति से झगड़ा हो या नाते रिश्ते निभाने हों पत्नी घर खर्च से थोड़ा बचा कर रखती है। दो साल पहले सरकार ने सभी महिलाओं की बचत को पल भर में बर्बाद कर दिया साथ में हर पत्नी को बदनाम भी किया अपने पति से झूठ बोलती हैं ऐसा साबित कर। क्या गुनाह किया था उन्होंने न ही रिज़र्व बैंक की गलती है जो नियमानुसार सुरक्षित धन सरकार को देने में घबरा रही है पत्नी की तरह और पति धौंस दिखा रहा है कानून बदलने की। 
         चार साल से मनमानी की है और देश के धन को फज़ूल के कार्यों पर उड़ाया है मगर अभी भी स्वीकार नहीं  करना चाहते कि नातजुर्बाकारी के कारण मूलधन ही बचा नहीं मुनाफा ख़ाक होता मगर बही खाते में कमाई दिखानी है। नाम गरीबों का बदनाम है जो बीवी को मार पीट कर उसकी कमाई से शराब पीकर ऐश किया करते हैं। नेताओं के देश का धन अपने घूमने फिरने देश विदेश में सरकारी साधनों से निजि कार्य दान धर्म अपने लिए शोहरत हासिल करने पर खर्च करने को अय्याशी से भी खराब अमानत में खयानत समझना होगा। कोई कारोबार के लिए गहने बेचना चाहता है कोई घर बनाने को कोई मज़बूरी में बेटी की शादी पर घर गहने सब बेचने पर विवश हो जाता है मगर सरकार को चुनाव से पहले अपने चेहरे को चमकदार बनाकर दिखाना है। अब अगर नहीं जीते चुनाव हर गये तो आने वाली सरकार सोचेगी क्या करना है। जी हां ऐसे लोग होते हैं जो अपने स्वार्थ को देखते हैं और अपने मतलब को भविष्य तक दांव पर लगा देते हैं। रिज़र्व बैंक या द्रोपती खुद को जुए में दांव पर लगने से इनकार नहीं कर सकती। सवाल आपके पद और संस्था का नहीं है सरकार के पति की तरह मालिक होने का है। पति कहता है मेरा है चाहे जैसे खर्च करूं बर्बाद होगा तो भी मेरा है तुम कौन होती हो रोकने वाली। कोई उसको याद दिलाए कि आप भी किराएदार हो मालिक नहीं और आपका भी अनुबंध खत्म होने को है।

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