Wednesday, 28 November 2018

दलीलों के बाज़ार में ( दिया कबीरा रोय ) डॉ लोक सेतिया

    दलीलों के बाज़ार में ( दिया कबीरा रोय ) डॉ लोक सेतिया 

     सोशल मीडिया पर संभव है सभी कुछ। आप लिख दो ग़ालिब चचा कह गये हैं कौन पूछेगा जाकर उनसे आपने ऐसा कैसे कह दिया था वो भी उस ज़माने में। चाणक्य नाम से राजनीति पर कुछ भी बकझक लिख दो कोई रोकने टोकने वाला नहीं है। कुतर्क जब तर्क बना लिए जाते हैं तब बेगुनाह अपराधी साबित हो कर सूली चढ़ जाते हैं ऐसा मुझे नहीं पता पहले किसी ने बोला हो या लिखा हो। मुझे ऐसा समझ आया है कितने लोग फांसी पर लटका दिये गये मगर बाद में साबित हुआ गुनहगार सज़ा देने वाले खुद ही थे। आजकल यही किसी नेता को लेकर कहा जा रहा है इस के साथ चाणक्य का नाम जोड़कर कि उन्होंने कहा था जब सारा विपक्ष किसी का विरोध करे तो समझो बाकी सब झूठे और केवल वही सच्चा है। अब ऐसे नासमझ लोगों को कौन बताये कि चाणक्य के युग में लोकशाही नहीं थी पक्ष विपक्ष नहीं था राजपाट था और राजा की हर बात सच मानी जाती थी। राजा नंगा है कहना अपराध था मगर अब लोग चुनते हैं अपना शासक नहीं सेवक और अपनी गलती पर सर धुनते हैं। जिनको लगता है बुराई होना अच्छे होने का सबूत है उनको बदनाम लोगों के नाम याद करवाने होंगे। लालूजी को ही ले लो बदनामी से उनकी शोहरत ऐसी है कि चारा घोटाला अपनी मिसाल खुद है। बदनाम होने से भी नाम होता ही है मगर बदनाम के सामने हाथ जोड़ते हैं डर से आदर से नहीं। लोकशाही में डराने वाला नेता नहीं चाहिए जो गब्बरसिंह की तरह घोषणा करे कि मुझ से मेरे सिवा कोई नहीं बचा सकता है। मगर दलील देने वाले चाहते हैं भयभीत होकर भी उसी को चुनें लोग और यकीन भी करें जिसकी किसी बात का कोई भरोसा नहीं जानते हैं। सिरफिरे आशिक़ कहते हैं तुझे किसी और की होने नहीं दूंगा मेरी नहीं तो किसी की नहीं ऐसे ज़ोर ज़बरदस्ती से कोई प्यार नहीं किया करता। ये लोग बहशीपन को मुहब्बत साबित करना चाहते हैं। देश की जनता कोई बेबस नारी नहीं है जो विवश होकर किसी को वरमाला पहना देगी सवा सौ करोड़ लोग किसी दल या नेता के भरोसे नहीं हैं अपने जीवट से जीते हैं शान से हर हाल में अपना सर उठाकर। चाणक्य या किसी नाम पर कुछ बोलने से आपकी गलत धरना सही साबित नहीं हो सकती है। 
                      बात परंपरा की करते हैं तो लोग मानते हैं कि किसी को गाली देने से अपनी ज़ुबान खराब होती है और बदमाश से घबराते नहीं उसे अहमियत नहीं देते हैं। जनता को ख़ामोशी को कमज़ोरी समझने वाले कहीं के नहीं रहे इतिहास बताता है। हम उस तरह के लोग हैं जो बड़े से बड़े मुजरिम को माफ़ करने का मादा रखते हैं और जिसका हर कोई विरोधी बन गया है उसने किसी का कोई भला नहीं किया होगा अन्यथा हम बुराई में भी अच्छाई देखने वाले लोग सोचते हैं उसने ऐसा बड़ा गुनाह किया तो किया कैसे देखने में तो कितना भला लगता था। शायद चाणक्य की दलील देने वाले इस बात को भूल गये हैं कि अधिक वक़्त नहीं हुआ जब उसी को सर आंखों पर बिठाया था विश्वास किया था चुना भी था तब आपको चाणक्य की कही कोई बात नहीं याद आई थी बताने को कि ऐसी भूल करने का अंजाम क्या होता है। हां आज आपको इक कहावत याद दिलवानी है कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती है। लोग इतने नासमझ भी नहीं हैं कि हर बार मीठा ज़हर खाने की भूल करें। झूठ कितना मीठा लगता हो इक दिन सच के सामने आकर अपना वजूद खो देता है। दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक कर पीता है और हम लोग फिर आसानी से किसी के भी , जी हां उसके ही नहीं किसी और के भी झांसे में नहीं आने वाले हैं। लोग ऐसे सबक को खुद याद रखते हैं किसी चाणक्य या किसी और की कही बात से हर बात नहीं समझी जाती है। इस युग के लोग अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी समझा जाएंगे हर चमकने वाली चीज़ वास्तव में सोना नहीं होती है। आपके पीतल की वास्तविकता सामने है और उस पर चढ़ी परत कभी की उतर चुकी है अब आपकी हर दलील बेअसर है।

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