Sunday, 25 November 2018

न धर्म न देशभक्ति केवल तमाशा ( आडंबर ) डॉ लोक सेतिया

  न धर्म न देशभक्ति केवल तमाशा ( आडंबर ) डॉ लोक सेतिया 

    धार्मिक स्थल बनाना मंदिर मस्जिद गिरजाघर जाना गुरुद्वारे जाकर सीस झुकाना धर्म नहीं है। अगर आपको यही धर्म लगता है तो पढ़ कर बताओ किस धार्मिक किताब में ऐसा लिखा हुआ है या समझाया गया है। मुझे आज तक किसी किताब में मंदिर मस्जिद आदि बनाने और वहां जाने की बात पढ़ने को नहीं मिली है। सदकर्म करना सदमार्ग पर चलना सच बोलना न्याय का पक्ष लेना सबको प्यार करना भाईचारा कायम रखना ज़रूरतमंद की सहायता करना लोगों के दुःख दर्द समझना उनको दूर करना किसी को सहारा देना किसी को शिक्षा या ज्ञान पाने में सहायक होना यहां तक कि किसी डूबते को बचाना किसी को सही राह दिखलाना किसी अंधे अपाहिज को मंज़िल तक पहुंचाना जैसे सभी काम करना धर्म बताया गया है। अपने किसी धार्मिक किताब में देवी देवताओं द्वारा तपस्या करने की बात में कहीं भी नहीं पढ़ा होगा किसी धार्मिक स्थल पर पूजा अर्चना का ज़िक्र तक। नानक की उदासियां किसी गुरूद्वारे की बात नहीं हैं , बुद्ध किसी बड़े धार्मिक स्थल नहीं गये , समाज सुधारक महान लोग भी जगह जगह जाकर उपदेश और ज्ञान की बात करते थे और समाज को तमाम गलत परंपराओं को बंद करने को समझाते रहे। सबसे बड़ी बात किसी भी साधु संत गुरु या मसीहा फरिश्ता को आपस में नफरत करने की बात नहीं की है। कबीर जैसे लोग हर अंधविश्वास पर चोट करते रहे नानक भी और विवेकानंद भी कोई उनमें अंतर नहीं खोज सकता। इन सब को पढ़ो तो सामने जो आता है वो एक ही धर्म है मानवता का धर्म। जब इसको समझ लिया तब आपको आजकल जो नज़र आता है वो केवल आडंबर ही समझ आएगा और आडंबर दिखावा वही करते हैं जो वास्तव में उस पर नहीं चलते हैं। 
      जिनको लगता है सत्ता मिलने पर बाप दादा की कई एकड़ ज़मीन पर समाधि बनाने से वो महान हो जाएंगे या किसी नेता की ऊंची मूर्ति से उसका नाम बड़ा हो जाएगा वही संकीर्ण मानसिकता आडंबर करती है धार्मिक आयोजन या धार्मिक स्थल बनवा अपना नाम लिखवाने की खातिर। भगवान खुदा ईश्वर इनके लिए वास्तविक आस्था की नहीं अपने मकसद हासिल करने को हैं। धर्म की राह चलना कठिन है और धार्मिक लिबास या सवरूप धारण करना आसान है , इधर भगवा वेस धारण करने वाले या अन्य धर्मों का पहनावा धारण करने वाले धर्म के सिवा सब करते हुए दिखाई देते हैं। जिस देश में करोड़ों लोग बेघर हैं भूखे सोते हैं और लोगों को शिक्षा स्वास्थ्य पीने का पानी तक नहीं मिलता और जीवन की बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं हैं आज़ादी के 71 साल बाद उस में गरीबी और अन्याय की असमानता की बात को छोड़ कर धर्म के आडंबर की बात की राजनीति करने वाला हर दल देश और समाज की भलाई की नहीं सत्ता की मलाई की चाहत रखता है। धर्म धर्म नहीं अधर्म बन जाता है जब कोई धर्म को  भी स्वार्थ सिद्ध करने को उपयोग करने लगता है। 
        राजनेता कारोबारी लोग या फिर धर्म का चोला पहने मतलबी लोग जनता को मूर्ख समझते हैं और बातों से बहलाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। इक्कीसवीं सदी में आधुनिक युग में भी अगर हम सही और गलत सच और झूठ असली और नकली का भेद नहीं कर सकते तो फिर हमारा कोई विवेक कोई ज़मीर ही नहीं है और विवेकशून्यता कोई उचित मार्ग नहीं बता सकती है। धर्म को समझने को विवेक पहली ज़रूरत है और ज़मीर बतलाता है उचित अनुचित का अंतर उसी को धर्म कहते हैं।

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