Monday, 5 November 2018

आप अपने में सिमटे सभी लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   आप अपने में सिमटे सभी लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     सभी जान पहचान वाले हैं अजनबी कोई नहीं फिर भी अनजान हैं इक दूजे से। जैसे कोई इक गली में रहे मगर घर के भीतर नहीं आता जाता बस बंद खिड़की से बाहर सुनाई देती आवाज़ या खुलते बंद होते दरवाज़े की चौखट पर खड़े होकर गुज़रने वालों से औपचारिक नमस्कार तक का संबंध रखे। मिलना होता भी है तो किसी आयोजन पर और बात होती है तो केवल बात करने को। कभी कोई ऐसा सवाल करता है जिसका अर्थ ही ख़ामोशी रखना अच्छा है या सवाल करने वाले की पसंद का ही जवाब। चुप रहता हूं जब से दुनिया की रिवायत को समझने लगा हूं। व्यर्थ है उनको समझाना कि साहित्य और समाज की बात लिखने का मकसद क्या है। लिखते नहीं आजकल कई पूछते हैं उनको मालूम ही नहीं मैं तो हर दिन लिखता हूं मगर जो उनको लगता है मैं लिखता नहीं कभी वो सब। समय बिताने को वही राजनीति की फालतू बातें अपनी अपनी समझ से समझते हुए। कोई कहता है आजकल तो बहुत पैसा लेते हैं कई कवि और सरकार से भी इनामात पाते हैं। सामाजिक सरोकार की बात कोई नहीं करता है लेखन को भी बाज़ारी चश्मे से देखते हैं जो उनको कैसे कहूं मैं क्या हूं कौन हूं क्या चाहता हूं क्या करता हूं। ऊब जाएंगे सुनकर वास्तविकता को समझना नहीं चाहेंगे। भीड़ में खोये लोग खुद ही को भुला बैठे लोग मिलते हैं मगर मुलाकात नहीं होती है। सामने होकर भी दीदार नहीं होता है शक्ल होती है किरदार नहीं होता है। इधर लोग बात भी मतलब की करते हैं मगर बातों का कोई मतलब नहीं होता है। शिक्षित होने से ज्ञान नहीं हासिल हो जाता है , जीवन का अनुभव किसी सिमित दायरे में रहकर हासिल होता नहीं है पर लोग कुवें को समझते हैं समंदर यही है जिसके मालिक हम हैं। अंतर क्या है पढ़ लिख कर भी विचारशील नहीं बनने और काला अक्षर भैंस बराबर वालों में। नफरत की आग की बात भी करते हैं तो ऐसे जैसे समाज की नहीं उपन्यास की बात हो। आंच अपने तलक पहुंचने तक सब दूर से खड़े तमाशा देखते हैं। कहने को आधुनिक साधनों ने कितना पास ला दिया है मगर भौतिक रूप से , दिल से दिमाग से सोच से पहले से अधिक बढ़ गई हैं दूरियां। समस्याएं अपनी हैं सुलझाएगा कोई और ऐसा समझते हैं। औरों को देखते हैं मगर कमियां तलाश करने को ही किसी की काबलियत को नहीं देखते और खुद अपने आप को आईने में कोई नहीं देखता है। सभी बाहर से शांत लगते हैं मगर हर कोई भीतर किसी तूफान को लिए फिरता हैं। रहते हैं जैसे अभिनय कर रहे हों जीने का जीते नहीं हैं। जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है मनोरंजन को बड़ा महत्वपूर्ण समझते हैं समय बिताने को झूठी खुशियां दिखावे की हंसी लिए रहते हैं मगर चेहरा बुझा बुझा लगता है। बीमार समाज स्वास्थ्य पर बहस करता है।

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