Thursday, 23 August 2018

कौन कितना गरीब है , गरीब कितना अमीर है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      कौन कितना गरीब है , गरीब कितना अमीर है ( व्यंग्य )

                                       डॉ लोक सेतिया 

     सच कोई नहीं जनता सच सभी जानते हैं। राज़ कुछ भी नहीं है राज़ हर बात में छुपा है। सवाल में जवाब है और हर जवाब खुद इक सवाल है। इक ने कहा था दिल्ली से एक रुपया जाता है चलते चलते घिस कर पंद्रह पैसे गांव तक पहुंचता है। तब सभी ने मान लिया सरकार है झूठ थोड़ा बोलती है , किसी को पंद्रह पैसे दिखाई नहीं दिए किसी को रुपया नज़र नहीं आया। इतने सालों बाद रूपये की कीमत कुछ भी नहीं है अब भिखारी भी दस पांच रूपये दे दो चाय पीनी है रोटी खानी है। दस रूपये में चाय मिल जाये इतना कम है , चाय वाला सत्ता में है क्या शान है क्या विदेशी सैर है क्या पोशाक है , फिर भी कहता है गरीब है उसका अपना कुछ भी नहीं है। अब उसी ने बताया है कि सौ पैसे पहुंचते हैं। असलियत कोई नहीं जानता जुमले दोनों खूब हैं अच्छे दिन की तरह। वास्तव में रुपया सौ पैसे नीचे पहुंचता तो बीच वालों की हालत खराब हो गई होती सब सरकारी लोग भुखमरी से मर जाते भला वेतन से जी सकता है कोई। इक अर्थ शास्त्री से सवाल किया आप तो बजट बनाते हैं आप ही बताओ गरीब कौन है। 
                 हाथ उठाकर बोले रुको , आमदनी कम होना गरीबी की निशानी नहीं है। आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया मतलब घाटे में जो भी हो असली गरीब वही है। सरकार का बजट हमेशा घाटे का रहता है तो देश में सबसे गरीब सरकार खुद है। गरीबों में पहला नाम यही लिख लो। बजट का मतलब होता है सरकार को अपने ताम झाम पर शानोशौकत पर शाही ठाठबाठ पर कितना धन चाहिए और किस किस तरह से जनता से वसूल किया जा सकता है। ये वही है जो खुद कुछ भी नहीं कमाता है उसके अधीन जो जो भी है सब घाटे में होता है जबकि उसी काम को करते हुए लोग खूब आमदनी करते हैं। डाकू लोग कमाई नहीं करते औरों की कमाई पर अपना अधिकार समझते हैं मगर उनको कानून अपराधी मानता है।  सरकार के पास यही लूटने का अधिकार है जिसे बजट बनाते समय उपयोग करती है। आपको सरकार को देने को कितना कमाना है सरकार बताती है कैसे कमाना है कभी नहीं बताती है। सरकारी सच यही है कि जितना लेती है उसका एक चौथाई भी जनता को वापस नहीं करती है। हर साल इक रेखा बना कर दिखलाते हैं रुपया आएगा किस किस तरह से और खर्च किस किस जगह किया जायेगा। 75 पैसे तो सरकारी कर्मचारी अधिकारी नेता पुलिस और देश की रक्षा पर खर्च होता है 25 पैसे जनता की खातिर होते हैं मगर अक्सर वो भी पूरे खर्च नहीं होते हैं। मार्च महीने में हर विभाग में इक लूट मची होती है बकाया बजट खत्म करना है और अगली बार बढ़वाना भी है। 
                   सर्वेक्षण की बात मत पूछो , गरीब कौन है सरकार ने पहचान करने को कहा है। मामला उतना सरल नहीं है , हर रेखा छोटी लगती है अगर सामने उससे बड़ी रेखा बना दी जाये। बचपन से हम यही करते आये हैं कैसे बिना मिटाये किसी रेखा को छोटी कर सकते हैं , उसके सामने बड़ी रेखा बनाकर आसानी से किया जा सकता है ये काम जो असंभव लगता है। हर अमीर अपने से अमीर से गरीब है , पुराने लोग अपनी अमीरी को नज़र नहीं लगने देते थे और करोड़पति अपने बेटे का नाम गरीबदास रख लेते थे और जो फटीचर होते उनके बेटे का नाम अमीर चंद होता था। अमीर चंद गरीब और गरीब दास रईस क्या कमाल है। सरकारी फार्म भरना है ताकि साबित किया जा सके किसे अनुदान की ज़रूरत है। दौलतराम बही खाता दिखलाता है , कोठी कार बंगला दुकानें सब हैं मगर रोने लगे मंदे की मार ने बेहाल किया हुआ है। सरकारी कर और बैंकों का क़र्ज़ भरते भरते जान निकल जायेगी। काश हज़ारों करोड़ का क़र्ज़ होता तो विदेश भाग जाते। समय पर राजनीति में चले जाते तो कम से कम अपने जेब से तो इक पाई खर्च नहीं करना पड़ता। हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा होता। कारोबार में रात दिन सब करने के बाद भी तिजोरी भरती ही नहीं सच बताएं तो बेहद गरीब हैं , सरकार कोई मदद करे तो बच सकते हैं। गरीबों में नाम लिख लो जी। 
              सरकारी कर्मचारी से हाल पूछा तो बिफर उठे। तबादला ऐसी सीट पर कर दिया है कि गुज़ारा ही नहीं होता , नाम भर को ऊपरी कमाई है और डर बना रहता है। दफ्तर की दराज से मिले पैसे किस के हैं कैसे बताएं और कहां रखते छुपाकर। मलाईदार सीट पर नेताओं के ख़ास लोग हैं और हर दिन उन्हीं को और पैसा मिलता है किसी तरह से खर्च करने को। विभाग पुलिस का और रोज़ मनोरंजन नाच गाना तमाशे करवाते हैं एनजीओ की आड़ में घर भरते हैं। सरकार खुद किसी अपराधी के चरण में सर झुकाती है और उसके अनुचित अवैध निर्माण को इक नियम बनाकर वैध कर देती है। मगर वो बाबा लोग कहते हैं उनके नाम कुछ भी नहीं है। गरीबी में ऐसी शान क्या बात है। पता होता तो सरकारी नौकरी नहीं उपदेश देने या योग सिखाने का काम करते नहीं तो चाय की दुकान ही खोल लेते। ज़माना बदल गया है सब खुद को गरीब साबित करना चाहते हैं। सबको भीख चाहिए , भिखारी सारी दुनिया दाता एक राम नहीं आजकल दाता सरकार है जो वास्तव में सबसे बड़ी भिखारी है। उसको भीख विश्व बैंक आई एम एफ और जाने किस किस से चाहिए , जबकि उनका गणित और भी उल्टा है उनकी शर्तों में देश आज़ाद होकर भी गुलाम है। कहने को बड़ों की बातों को याद करते हैं मगर जो शिक्षा बड़े बजुर्ग सिखाते मर गये उस पर अमल कोई नहीं करता है। जितनी चादर उतने पैर फैलाओ और इज़्ज़त से जीना है तो उधार लेकर मत शान दिखाओ। गरीबी की रेखा तुम ही समझाओ , नीचे हैं लोग कुछ तुम ही नीचे चली जाओ।

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