Tuesday, 26 June 2018

हम-तुम बंधे इक बंधन में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     हम-तुम बंधे इक बंधन में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     कहते तो इसे विवाह ही हैं मगर यही सब से बड़ी जंग भी है। दो देशों में आपसी कारोबार शुद्ध अपने फायदे की सोच से किया जाता है। पहले पहले सब ठीक लगता है फिर बाद में घाटा नफा समझ आने पर शिकायत होती है जो बताया था क्वालिटी वो नहीं है। शादी में दुल्हन यही सोचकर ससुराल जाती है कि उसको जाकर सास ससुर ननद के चंगुल से अपने गुलाम को छुड़वाना है तभी अपनी जीत के बाद खुद अपना राज कायम करना है। कभी आंसू को हथियार समझती थी महिलाएं आजकल आंसू गैस साथ रखती है किसी को रुलाने को। अभी तक दुनिया को एक राज़ का पता नहीं चल पाया है कि औरत की ताकत क्या है कमज़ोरी क्या है और उसके कितनी तरह के हथियार हो सकते हैं।  बेलन तो अकारण ही बदनाम है , अभी तक एक टीवी सीरियल को छोड़कर बेलन से कोई मारा नहीं गया है। मगर दुनिया का बड़ा से बड़ा वीर भी पत्नी के साथ जंग में जीत नहीं पाया है आजतक। शासक कोई भी हो पर्दे के पीछे से राज किसी महिला के हाथ होता ही है। महिला का नाज़ुक कोमल दिखाई देना भगवान की इक चालाकी या चाल है पुरुष को जाल में फंसाने को। अपनी दुनिया को बनाये रखने को ही ऊपर वाले ने विवाह रुपी चक्रव्यू की रचना की थी और अभिमन्यू की तरह बाहर निकलने की राह किसी को नहीं समझ आई कभी।
                      मेरे पिता जी बहुत परेशान थे। मैं उनके जेब में एक रूपये का वो सिक्का था जिसको खुद वो ही समझते थे ये खोटा है कभी नहीं चल सकता। फैंकना भी मुश्किल होता है , ज़रा ईमानदार भी थे तो नहीं चाहते थे किसी को देकर ठगी की जाये। इक मुलतानी कविता भी आपको सुना देता हूं समझने को। हिंदी में अनुवाद इस तरह है। इक सूखी नदी से तीन नहरें निकली दो सूखी और एक बहती ही नहीं। जो बहती ही नहीं उस में नहाने तीन पंडित आये , दो अंधे और एक को दिखाई ही नहीं देता। जिसको दिखाई ही नहीं देता उसे नहर में मिली तीन गाय , दो फंडड़ ( जो गर्भधारण नहीं कर सकती ) और एक जो कभी ग़र्भधारण करती ही नहीं। जो सूए ही नहीं उस गाय ने दिए तीन बछड़े , दो लंगड़े और एक उठता ही नहीं। जो उठता नहीं उसकी कीमत तीन रूपये दो खोटे और एक चलता ही नहीं। जो चलता नहीं उसे देखने आये तीन सुनार। ये कविता राजनीति पर है कि चुनाव में क्या हासिल होता है। वापस अपनी बात पर , पिता जी के इक दोस्त ने अपनी बेटी की बात चलाई दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलना चाहते थे। पिता जी ने उनसे कहा मुझे कोई इनकार नहीं है मगर मेरा रुपया मुझे खोटा लगता है किसी को देते हुए डर लगता है कोई धोखा नहीं हो जाये। उस दोस्त के पास भी इक खोटी अठन्नी थी जिस के साथ वो चाहते थे रिश्ता करवाना। मेरे पिता जी को कहा आप चिंता मत करो मुझे खोटा रुपया का आपका सिक्का पसंद है मैंने तो तिजोरी में रखना है।  किसी दिन यही कीमती हो जायेगा , कुछ लोग चलन से बाहर हुए सिक्कों को जमा किया करते हैं। पिता जी ने मुझे बताया तो मैंने मना कर दिया कारण थोड़ा अलग था आपको भी मेरे पिता जी की तरह समझ आएगा नहीं। मैंने कहा अपने पहले मन की बात बताई नहीं ( ये 1974 -1975 की बात है तब मोदी जी की मन की बात कोई नहीं करता था ) मैं तो उनकी बेटी को मिलता रहा बहन समझ कर मेरा ज़मीर नहीं मानता उसी से विवाह करूं। पिता जी को इसी बात का डर था ज़मीर पास हो तो बाज़ार में बिकते नहीं लोग। खैर उनके दोस्त बच गये क्योंकि खोटे रूपये की कदर आज तक किसी ने नहीं की और मैं अपनी पत्नी के पर्स का वही सिक्का हूं जिसे पाकर उनको लगता है धोखा हुआ है। डॉक्टर से शादी की और लेखक पल्ले पड़ गया।
        मगर असली काम शोध करना है , दस का दम टीवी शो की तरह सवाल का जवाब जानना है कि कितने प्रतिशत भारतीय शादी को ऐसा लड्डू समझते हैं जिसे खाने वाला पछताता ही है। इस में लव मैरिज भी शामिल है। मुझे मुमताज की रूह ने बताया है कि मुहब्बत बड़ी बेरहम चीज़ होती है जान जाती है तभी मर कर ताजमहल सी कब्रगाह नसीब होती है जीते जी जो मिला मेरे सिवा कोई नहीं जनता है। आधुनिक काल में मुहब्बत भी हिसाब किताब लगाकर करते हैं अपने बराबर की शिक्षा नौकरी जाने क्या क्या। अभी अभी इक पत्नी ने तलाक की अर्ज़ी दी है और पति को लगता है ये तो धोखा है बेवफाई है। चौथी श्रेणी का कर्मचारी है और जब शादी की तो अनपढ़ थी लड़की , उसके पढ़ाया लिखाया और अब वो पति से ऊंचे पद पर है। अब उसे तलाक चाहिए क्योंकि पति उसके काबिल नहीं है , आपकी सहानुभूति से कुछ नहीं होगा बेचारे का घर पत्नी को पढ़ाने में उजड़ता लगता है। आम तौर पर हर लड़का लड़की अपने से बेहतर जीवन साथी चाहते हैं मगर जो मिलता है बाद में सोचते हैं इससे बेहतर होता तो अच्छा था। मगर अधिकतर विवाह बने रहते हैं क्योंकि आज भी हम गुलामी करते शर्मसार नहीं होते हैं और आज भी पिंजरे में तोता पालना सब को पसंद है जो कड़वी मिर्ची खाकर भी जो सिखाते हैं वही दोहराता है। अंत में वॉट्सऐप के दो विडिओ की बात। एक बॉक्स में इक पक्षी बंद है और दूसरा पक्षी उस बॉक्स का कवर हटाता है तो भीतर बंद पक्षी उसी पर झपटता है , भलाई का ज़माना ही नहीं। इक और में बताया गया किसी ने तोता पाला हुआ था जो उसे सुबह उठाया करता था काम पर जाने को। अधिकारी जब लखनऊ में था तो तोता भी लखनवी तहज़ीब से बात करता और अपने आका को जगाता ये बोलकर कि हज़ूर उठिये आपको काम पर जाना है। अधिकारी का तबादला पंजाब में हो गया तो कुछ ही दिन में उसने पंजाबी बोलना सीख लिया वहां के तोतों से या किसी तोती से नज़दीक होकर। आजकल वो अपने मालिक को जगाता है ये कहकर। उठ ओए खोते दे पुत्तर कम ते तेरा पीओ जाऊ। इतनी ही कहानी है सगाई से शादी के थोड़ा बाद की। इस से अधिक लिखना संभव नहीं है माफ़ करें।
                                    

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