Thursday, 29 March 2018

शोर की ख़ामोशी , रौशनियों के अंधेरे - डॉ लोक सेतिया

   शोर की ख़ामोशी , रौशनियों के अंधेरे -  डॉ लोक सेतिया 

    कोई अजनबी बाहर से आये तो ये सब देख कर समझेगा कि लोग बेहद खुश हैं जो इतना संगीत का शोर है नाच गाना और मंच से बहुत अच्छी लगती बातें सुनाई दे रही हैं। बीच बीच में मंच संचालक निवेदन करता रहता है अमुक के लिए ज़ोरदार तालियां हो जाएं। आपको क्या लग रहा है मैं कुछ सोच कर लिखने बैठा हूं , जी नहीं मैं आपको वही बतला रहा हूं जो मुझे सामने दिखाई और सुनाई दे रहा है। इस बीच पंजाबी भंगड़ा शुरू हो गया है , यहां बहुत कुछ एक साथ हो रहा है। बताया जा रहा है कि ये पुलिस प्रशासन जनता से सम्पर्क कर रहे हैं , मगर जनता कहां है कोई नहीं जनता क्योंकि मंच पर सरकारी अधिकारी और कुर्सियों पर कुछ सत्ता से जुड़े लोग शोभा बढ़ा रहे हैं। जनता है मगर सार्वजनिक पार्क में सैर करने आई इस सब को इस नज़र से देखती है जैसे ये भी गली से गुज़रती बारात हो चाहे कोई अर्थी निकल रही हो उसको देखती है बिना ख़ुशी बिना ग़म की भावना के। थोड़ी देर बाद यहां सब सामान्य सा हो जायेगा। कुछ भी नहीं बदलेगा , पहले भी ऐसा किया गया था यहीं बाहर सड़क पर पिछले साल इस बार सड़क से पार्क तक का फासला तय हुआ है। अभी नगरपरिषद के लोग केवल सामने दिखाई देती गंदगी को साफ़ कर रहे हैं , जो छुपी हुई है या थोड़ी दुरी पर ढेर लगे हैं गंदगी के उनकी तरफ कोई नहीं देखता है। भंगड़ा हुआ तो कोई अधिकारी भाषण देने लगे हैं , ये वही हैं जो कल तक ही नहीं हर दिन अपने पास फरियाद करने और न्याय की आस लेकर आये नागरिक के साथ गाली गलौच की भाषा में ही बात करते हैं। कोई महिला भी पास हो तब भी इनको शर्म नहीं आती। आज जाने कहां से इतनी अच्छी भाषा सीख कर आये हैं , संचालक ज़ोरदार तालियां कहता है मगर तालियों की आवाज़ सुनाई देती नहीं है। सभाओं में तालियां बजाने को भाड़े पर नेता लाते हैं लोगों को , हर कोई ताली बजाना पसंद नहीं करता है। स्कूल के बच्चे क्या गीत सुना रहे हैं मालूम नहीं , उन्हें तो जो याद करवाया जाता है वही बालदिवस से लेकर सभी दिनों दोहराते हैं। ये सरकारी आयोजनों में मंगवाए जाते हैं बाकी सामान की तरह। इस से अजीब बात क्या हो सकती है कि जिन को कभी देश का भविष्य कहते थे उनको अपने हर आयोजन में इक वस्तु की तरह उपयोग किया जाता है। जी याद आया सर्वोच्च अदालत इस पर आपत्ति जता चुकी है मगर सरकारों और अधिकारीयों के कान पर जूं नहीं रेंगती है। बच्चे गए गीत सुना कर मगर मंच संचालक को तालियां बजवाना याद नहीं रहा। इधर जो महोदय बोल रहे हैं उनकी आवाज़ कानों को खटकती सी लगती है और कोई समझ नहीं पा रहा मतलब तक उनकी बात का। अभी इंतज़ार करने को कहा जा रहा है किसी मशहूर गायक का नाम लेकर। चलो इक मधुर स्वर कोई गायक का रिकॉर्डेड बजाया जा रहा साथ कोई नाच रहा है। गिध्धा हो रहा है , सब कुछ मिला जुला है। ये मनोरंजन भी अपनी तरह का है जो अपने मकसद को नहीं समझा पा रहा। 
        लो बीच में रोक दिया गया नाच गाना किसी ख़ास व्यक्ति के आने पर उनको आदर देने की बात और अब आते ही उन्हें अपनी बात कहनी है। ये सब अभी साथ साथ चल रहा जब मैं लिख रहा हूं , मुझे घर के सामने पार्क में होने वाली हर सभा का आनंद भी मिलता है और यही शोर और कोई काम भी नहीं करने देता। रात को ही पास में कोई जगराता था जिसने रात भर जगाये रखा या फिर सोने नहीं दिया। लेकिन इस बीच तालियों की मांग के साथ किसी का परिचय करवा रहे हैं। मुझे इक बात वास्तव में नहीं समझ आ रही कि इस तरह से पुलिस का आम लोगों से सीधा संवाद कैसे हो सकता है जिस का दावा सरकार और प्रशासन करते हैं। ये आसान रिवायत सी बन गई है जनसम्पर्कं का दिखावा करते हैं मगर जन से कोई वार्तालाप नहीं होता। अभी पहली अप्रैल दो दिन बाद है फिर अभी से मूर्ख बनाने का अभियान क्यों। दमा दम मस्त कलंदर गीत सुनाई दे रहा है , इतनी जल्दी दृश्य बदलता है कि समझना कठिन हो गया है क्या आगे होने वाला है। जिस तरह आजकल शादी में तमाम तरह के पकवान परोसे जाते हैं। स्टाल बदल रहा है और फिर हारमोनियम बज रहा है , मुस्कुराने की वजह तुम हो , कोई गा रहा है मधुर सुर में , ओ पिया रे , पिया जाने ना जाने ना। बस दो मिंट में कुछ और ये क्या हुआ , बहुत कुछ है मगर है कुछ भी नहीं। 
            शायद मंच संचालक को औपचरिकता निभानी है , सब को बताना है कौन कहां से आया हुआ है। इक तमाशा है केवल कोई संजीदा मकसद है ही नहीं , कोई इस पर हंसे कि रोये नहीं पता। शायद सब जानते हैं ये सब किसी मकसद हासिल करने को नहीं है विशेषकर जनसम्पर्क तो कतई नहीं है। जन से कोई मिलता ही नहीं बात करना तो दूर की बात। उपस्थित लोगों से निवेदन किया गया था अपने नाम लिखवा दें वहीं कोई यही काम कर रहा है। बस नाम जान लेने को संवाद नहीं कह सकते हैं। कुछ जलपान की भी बात होगी और कुछ और औपचरिकता स्मृति चिन्ह बांटने की और किसी इक संस्था का आभार जिस ने आयोजन का प्रबंध किया बदले में पैसे लेकर। ये आखिरी तालियां किसी के नाम की , अभी उबाऊ भाषण बाकी हैं। 
         अधूरी बात बाद में पूरी करनी है , घूमर नाच हो रहा है। ये क्या हरियाणा सरकार तो फिल्म पर रोक लगाने की बात करती थी। किसे याद है , तब का मतलब और था आज बिना मकसद है। समय का अभाव है घूमर नाच के बाद मंच संचालक कहते हैं। रुकिए मिलते बाद में। शोर में ख़ामोशी गुम हो गई है और रौशनियों ने आस पास अंधेरों को शायद और बढ़ा दिया है। जारी है कब से यही सब।

   

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