Friday, 1 September 2017

खुल गये सभी राज़ ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया

         खुल गये सभी राज़  ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया। 

                  बस एक बात में पूरी कहानी समझा दी , मैंने कभी नहीं पढ़ा तुम्हें क्योंकि मैं नहीं चाहता था तुम्हारी आलोचना करना। उनकी दोस्ती की परिभाषा यही है शायद दोस्त को कभी सही बात बोलकर नाराज़ नहीं करना। मेरी समझ अलग है कि सच्चा दोस्त वही जो आपको खरी बात बोले। आलोचक हैं तो ज़रूरी नहीं आप सब की कमियां ही बताएं , समालोचना भी की जा सकती है। क्या क्या अच्छा है और क्या अगर नहीं होता तो अच्छा होता की तरह सार्थक ढंग भी मुमकिन है। सोचा ही नहीं था पढ़ने से पहले ही कोई तय कर सकता है कि नहीं पढ़ना अच्छा है , पढ़ लिया तो कमियां ही मिलनी हैं। अच्छा किया , जब पहले से पूर्वाग्रहग्रस्त होकर किसी बात को परखोगे तब पढ़ने की ज़रूरत ही क्या थी। इस तरह दोस्त ने मेरे लेखन को बिना देखे बिना पढ़े ही खराब नहीं कहने की बात कहकर खराब बता दिया। अफ़सोस यही कि पढ़कर बताते कि बेकार है तो शायद कुछ सुधार ही कर लेता। मैंने कभी खुद को भला आदमी नहीं समझा , जनता हूं बहुत सारी कमियां हैं मुझ में खूबी कोई नहीं। फिर भी ये गलत लगता है कि कोई मुझे जाने समझे बिना ही निर्णय कर दे कि ये बुरा आदमी है।
                                   आजकल टीवी के खबरी चैनल बहुत चिल्ला चिल्ला कर बहस कर रहे हैं , खुल गए हैं किसी के कितने ही राज़। जबकि ये राज़ कभी राज़ थे ही नहीं , सब को पता था मगर कोई किसी को बताता नहीं था। इक बार फिर से खबर क्या है ये समझते हैं। परिभाषा साफ है हमेशा से ही कि खबर वो सूचना है जो कोई छुपा कर रखना चाहता है , आम लोगों को पता नहीं चलने देना चाहता। अख़बार समाचार चैनल के पत्रकार को उसको खोजना है और सब को बताना है। आप उस बात को दिन भर खबर बताते हैं जो अब किसी से छुपी हुई नहीं है , जिसका चर्चा हर तरफ है। आपको तो शर्मिन्दा होना चाहिए कि ये सब क्यों नहीं पहले पता लगाया और बताया। या फिर आपको मालूम था मगर बताने का साहस नहीं किया या नहीं बताने की कीमत लेते रहे। सब देख कर आंखें बंद रखने वाले देश के प्रधानमंत्री रहे हैं जिन पर कोई आरोप नहीं लगा जबकि उनकी सरकार घोटालों की सरकार थी इतिहास यही बताएगा। बहुत अधिकारी सब गलत होता देख चुप रहते हैं , अपना कर्तव्य नहीं निभाते , मगर उनको निर्दोष नहीं बताया जा सकता। अभी तक देश में यही हुआ है , जो भी करना चाहिए था किया नहीं। किसी शायर का शेर है :-

                 वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,

                 तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं। 

             आज भी सरकार यही करती है देश में भी और हर राज्य में भी। कोई कुछ भी करता रहे आप ने कुछ नहीं किया रोकने को , आपने सभी ने , नेताओं ने आधिकारियों ने , पुलिस प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों ने अपना फ़र्ज़ नहीं निभाया और अपराधी को संरक्षण देते रहे। खबर वालों को खबर थी नहीं अथवा खबर से बेखबर बने रहे , राज़ की बात नहीं है। दान का चर्चा घर घर पहुंचे लूट की दौलत छुपी रहे , क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फितरत छुपी रहे , नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी रहे। राज़ अभी भी नहीं खुला कि सब शामिल थे गुनाह में , केवल गुनाह करने वाला ही नहीं , वो भी जो गुनाह होने देते रहे , वो भी जो देख कर अनदेखा करते रहे। अपने आप को सब शरीफ बताते हैं शराफत की यही नई परिभाषा है। शरीफ लोग घर में छुपकर दरीचों से तमाशा देखते हैं बाहर निकलने की गल्ती नहीं करते। जान है तो जहान है।  
                        
                 

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