Friday, 7 July 2017

मेरे लिए लिखना कितना ज़रूरी है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  मेरे लिए लिखना कितना ज़रूरी है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       जो दवा के नाम पे ज़हर दे , उसी चारागर की तलाश है।

कल मुझसे सवाल किया किसी ने मैं क्यों बर्बाद करता रहता अपना इतना वक़्त ये बेकार की बातें लिखने पर। मैंने कहा ये मेरा काम है मुझे ख़ुशी मिलती ऐसा कर के बल्कि मैं लाख चाहूं बिना लिखे नहीं जी सकता। टीवी पर खबर आ रही थी सोशल मीडिया के नशे की , लत पड़ गई है लोगों को व्हाट्सएप्प आदि की। मुझे भी उस में शामिल समझते लोग जो सच नहीं है। चालीस साल पहले इक काम शुरू किया था देश समाज की वास्तविकता को उजागर करने का काम करना। वही करता चला आ रहा हूं , माध्यम बदलते रहे हैं। कभी किसी विभाग को खत लिखता था , फिर अख़बार में पाठकों के कालम में चिट्ठियां रोज़ लिखने लगा। कई पाठक लिखते थे अपना नाम छपा पढ़ने को , मैं लिखता था हर दिन इक लड़ाई लड़ने को। रिश्वतखोरी हो या कारोबारी लूट अथवा भगवान के नाम पर ठगी सब लिखा और घर फूंक तमाशा देखा। न जाने कैसे अख़बारों में हिंदी की मैगज़ीनों में व्यंग्य कविता ग़ज़ल कहानी आलेख छपने लगे और सब मुझे लेखक समझने लगे। लोग तो ज़रा छपने पर किताब छपवा साहित्यकार होने का तमगा लगवा लेते हैं , मुझे कभी भी ये उतना महत्वपूर्ण नहीं लगा न ही मुझे समझ आया दो तीन सौ किताबें छपवा खुद ही बांटते रहना वो भी उन को जिनको शायद पढ़ना ज़रूरी ही नहीं लगता। आज सुबह जागते ही कल मुझसे किये सवाल का जवाब मुझे समझ आया और मैं सैर पर जाना छोड़ लिखने बैठ गया। सब को लगता है काम करने का मतलब है आप की कमाई किस से है , अब जब मुझे लिखने से मिलता नहीं कुछ भी आर्थिक लाभ तो इतना समय देना लिखने को अपना समय बर्बाद करना ही तो है। मुझे लगा कि लोग कितना समय भगवान की पूजा पाठ में खर्च करते हैं , कभी मंदिर जाते हैं कभी उपदेश सुनने को जाते हैं , हज़ारों रूपये खर्च कर हरिद्वार मथुरा काशी मक्का मदीना हरिमंदिर साहब दर्शन को जाते हैं। देवी देवताओं की शरण जाते हैं , अपने अपने गुरु की अर्चना करते हैं। क्यों करते हैं वो ये सब काम जब जानते हैं भगवान मिलते नहीं हैं किसी को। मुझे अभी भी याद है मेरी मां जो भजन गाती थी , तुझे भगवान बनाया है भक्तों ने। बस परस्तिश करने से इबादत करने से आरती करने से जो मिलता है सबको वही सुकून मिलता है मुझे लिखने से। और मैंने कभी नहीं समझना चाहा मेरा लेखन कितना अच्छा है या नहीं है , आप कभी सोचते हैं आपकी इबादत कैसी है। क्या जो लाखों करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाते उनकी आस्था बड़ी और जो चंद पैसे डालते दानपेटी में उनकी छोटी है। अब जो भी है और जैसी भी है मेरी इबादत ठीक है , मैं भगवान की पूजा करना उतना ज़रूरी नहीं मानता जितना सच लिखना क्योंकि मुझे हर धर्म में यही लिखा मिला है सत्य ही ईश्वर है। भगवान क्षमा करें मैंने उनकी तुलना लेखन से की है , पर क्या करूं मेरा सच यही है। मैं उन की तरह नहीं जो जिन नेताओं अधिकारीयों को रिश्वतखोर और कामचोर बताते उन्हीं के सामने हाथ जोड़े खड़े मिलते हैं। 

                     आयुर्वेद और स्वास्थ्य की बात             

            कल रात ही इक विडिओ देखा जो बहुत आचम्भित करने वाला है , कोलेस्ट्रॉल घटाने की दवा को लेकर। तथ्य ये है कि विश्व में कुल जितनी दवा बिकती और लोग खाते हैं उसका बड़ा हिस्सा चालीस प्रतिशत केवल भारत के लोग खा रहे हैं और उस दवा की ज़रूरत है भी कि नहीं बिना जाने ही डॉक्टर लिखते हैं दिल के रोग कम होने की उम्मीद में जबकि कोई पक्के तौर पर नहीं साबित कर सका ये कितना सच है। मुझे 1990  में आज से करीब 27 साल पहले दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के डॉ मल्होत्रा जी ने जांच करवा बताया था तब मेरी आयु चालीस साल थी कि आपका कोलेस्ट्रॉल बहुत बढ़ा हुआ है , ट्रिग्लिसराइड चार सौ आये थे। चाहते तो वो तभी लिख देते दवा मुझे खाने की , मगर उन्होंने कोई गोली तक नहीं लिखी थी। मेरा खान पान पूछा था दिनचर्या समझी थी और साफ बोला था इस तरह तो आप साल भर भी शायद स्वस्थ्य नहीं रह पाओगे। मुझे छह महीने तक उबली सब्ज़ियां खानी पड़ी और रोज़ सुबह तीस से चालीस मिंट की दौड़ कॉलेज के मैदान में लगाई थी और मैं ठीक हो गया था और उसके बीस साल तक बिना किसी दवाई खाये तंदरुस्त रहा हूं। अगर यही अपना कोलेस्ट्रॉल मैंने दवा खाकर घटाया होता तो मुमकिन ही नहीं बल्कि संभावना यही है कि मुझे उस दवा से और कई रोग मिलते और मैं शायद ज़िंदा होता ही नहीं अथवा होता तो तमाम रोगों को लेकर जी रहा होता। तब योग की कोई बात नहीं होती थी और आजकल लोग योग को ही स्वस्थ होने का आधार कार्ड मानते हैं सरकारी कार्ड की ही तरह। मगर मैंने केवल सैर की है कभी योग नहीं अपनाया और मुझे विचार आता है क्या किसी ने इस को लेकर रिसर्च की है कि योग करने वालों और नहीं करने वालों में कितना फर्क हुआ है। मुझे सामने दिखता तो नहीं योग के बढ़ते होने से रोगी कम हुए हों। आज तो हालत और खराब है डॉक्टर्स बिना ज़रूरत बहुत दवाएं लिखते हैं अपनी कमाई की खातिर या फिर निदान नहीं करने की आदत से एक की जगह चार दवाएं लिखना। मगर बीस साल पहले ही डब्ल्यू एच ओ विश्व स्वास्थ्य संघठन ने भारत सरकार को चेतावनी दी थी आगाह किया था कि आपके देश की आबादी को जितनी दवाएं उपयोग करनी चाहियें उस से पचीस गुना अधिक उपयोग की जा रही हैं जो खतरनाक हैं। मगर अपनी सरकारों की चिंता लोग नहीं दवा कंपनियां रहती हैं और जनता का स्वास्थ्य तमाम लोगों की कमाई का साधन है। पिछले सप्ताह डॉक्टर्स दिवस पर इक पिक्चर मैसेज मिला डॉक्टर को भगवान बताने वाला , मैंने उन डॉक्टर को जवाब लिखा मुझे बताओ तो सही वो भगवान है कहां। अब उसको जो भी लगा हो मेरा सच यही है। और कोई हैरान हो सकता है मेरी पहली व्यंग्य रचना इसी विषय पर थी। उत्पति डॉक्टर की। इक सवाल था भगवान ने ये प्रजाति बनाई क्यों होगी , आज तो ये और भी सार्थक है।

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